ऐप-आधारित टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों का देशव्यापी चक्का जाम: अवैध बाइक टैक्सी और पैनिक बटन के भारी खर्च के खिलाफ फूटा गुस्सा
मुंबई/नई दिल्ली। देश की सड़कों पर रफ्तार भरने वाली ऐप-आधारित टैक्सी और ऑटो सेवाओं के पहिए शनिवार को थमे नजर आए। अवैध बाइक टैक्सी सेवाओं के बढ़ते चलन, ओला-उबर जैसी कंपनियों की मनमानी किराया नीतियों और सुरक्षा उपकरणों के नाम पर ड्राइवरों पर थोपे जा रहे भारी-भरकम खर्च के विरोध में ड्राइवरों ने एक दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। महाराष्ट्र कमगार सभा के नेतृत्व में बुलाई गई इस हड़ताल का असर सुबह से ही देश के विभिन्न महानगरों, विशेषकर महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों में देखने को मिला। ड्राइवरों का स्पष्ट कहना है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ही सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह आंदोलन और भी उग्र रूप धारण कर सकता है।
इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य केंद्र महाराष्ट्र रहा, जहां महाराष्ट्र कमगार सभा के प्रमुख डॉ. केशव क्षीरसागर ने मोर्चा संभालते हुए कहा कि यह हड़ताल ड्राइवरों के अस्तित्व की लड़ाई है। उन्होंने बताया कि शनिवार सुबह से ही महाराष्ट्र सहित देश के कई अन्य हिस्सों में ड्राइवरों ने स्वेच्छा से अपने वाहन सड़कों पर नहीं उतारे। डॉ. क्षीरसागर के अनुसार, अधिकांश ऑटो और टैक्सी चालकों ने इस बंद का समर्थन किया है क्योंकि वे लंबे समय से उन समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिन्हें सरकार और ऐप कंपनियां नजरअंदाज कर रही हैं। हालांकि, हड़ताल के दावों के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर स्थिति थोड़ी मिली-जुली रही। ओला, उबर और रैपिडो जैसे प्रमुख ऐप्स पर सुबह के समय कुछ स्थानों पर गाड़ियां बुकिंग के लिए उपलब्ध थीं, जिससे यात्रियों को आंशिक राहत तो मिली, लेकिन ड्राइवरों के बड़े धड़े की अनुपस्थिति के कारण वेटिंग टाइम में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
हड़ताल के पीछे का सबसे प्रमुख कारण अवैध बाइक टैक्सी सेवाओं का बेधड़क संचालन है। ड्राइवरों का आरोप है कि बिना वाणिज्यिक लाइसेंस और परमिट के चल रही ये बाइक टैक्सियां वैध टैक्सी और ऑटो चालकों के पेट पर लात मार रही हैं। लाइसेंसधारी ड्राइवरों को भारी भरकम टैक्स और परमिट शुल्क चुकाना पड़ता है, जबकि अवैध बाइक टैक्सियां कम कीमत पर सवारियां उठाकर उनके व्यापार को सीधा नुकसान पहुंचा रही हैं। इसके अलावा, सुरक्षा के लिहाज से भी ये बाइक टैक्सियां एक बड़ा खतरा बनी हुई हैं। यूनियन का दावा है कि यदि कोई अवैध बाइक टैक्सी दुर्घटना का शिकार होती है, तो कानूनी जटिलताओं के कारण पीड़ित यात्री को बीमा का लाभ नहीं मिल पाता, जो जनता की सुरक्षा के साथ भी एक खिलवाड़ है।
विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु वाहनों में ‘पैनिक बटन’ के इंस्टॉलेशन से जुड़ा है। ड्राइवरों का कहना है कि सुरक्षा के नाम पर उन्हें तकनीकी और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार ने देशभर में लगभग 140 कंपनियों को पैनिक बटन लगाने के लिए अनुमोदित किया था, लेकिन राज्य सरकारों ने उनमें से करीब 70 प्रतिशत कंपनियों को अनधिकृत घोषित कर दिया। इस प्रशासनिक विरोधाभास का खामियाजा गरीब ड्राइवरों को भुगतना पड़ रहा है। जिन ड्राइवरों ने पहले ही पैनिक बटन लगवा लिए थे, उन्हें अब उन डिवाइस को हटाकर नए सिरे से अधिकृत कंपनियों के बटन लगवाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में एक ड्राइवर को लगभग 12,000 रुपये तक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है, जो उनकी मासिक आय का एक बड़ा हिस्सा है।
किराया नीतियों को लेकर भी ड्राइवरों में भारी असंतोष है। उनका आरोप है कि ऐप कंपनियां अपनी मर्जी से कीमतें तय करती हैं, जिसमें ड्राइवरों के कमीशन और बढ़ती ईंधन कीमतों का उचित ध्यान नहीं रखा जाता। साथ ही, खुले परमिट की नीति के कारण सड़कों पर ऑटो और टैक्सियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जिससे प्रति ड्राइवर मिलने वाली सवारियों की संख्या घट गई है। ड्राइवरों की मांग है कि सरकार एक न्यायसंगत किराया ढांचा तैयार करे और पैनिक बटन की अनिवार्यता को बोझ बनाने के बजाय इसे सरल और किफायती बनाए।
शनिवार की इस हड़ताल ने डिजिटल ट्रांसपोर्ट इकोसिस्टम की कमजोरियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है। ड्राइवरों ने चेतावनी दी है कि यह केवल एक दिन का सांकेतिक विरोध है। यदि अवैध बाइक टैक्सियों पर कार्रवाई नहीं हुई और पैनिक बटन के नाम पर हो रही ‘वसूली’ बंद नहीं की गई, तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। फिलहाल, यात्रियों की परेशानी और ड्राइवरों के गुस्से को देखते हुए अब गेंद सरकार और परिवहन विभाग के पाले में है।