• January 31, 2026

उत्तर प्रदेश प्रशासन में भूचाल: बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का सनसनीखेज इस्तीफा और निलंबन

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी में उस समय हड़कंप मच गया जब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। यह इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक अधिकारी का सेवा छोड़ना भर नहीं था, बल्कि इसमें उठाए गए गंभीर सवालों और आरोपों ने सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता के बीच एक बड़ी बहस छेड़ दी है। इस घटनाक्रम के तुरंत बाद राज्य सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए अलंकार अग्निहोत्री को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है और उन्हें जांच पूरी होने तक शामली के कलेक्टर कार्यालय से संबद्ध (अटैच) कर दिया गया है। सरकार ने इस पूरे मामले की जांच बरेली के मंडलायुक्त को सौंपी है, जो इस अप्रत्याशित घटना के पीछे के सभी कारणों और आरोपों की पड़ताल करेंगे।

अलंकार अग्निहोत्री, जो वर्ष 2019 बैच के राजपत्रित अधिकारी हैं और जिन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की है, ने अपने सात पन्नों के विस्तृत इस्तीफे में सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे प्रहार किए हैं। उन्होंने राज्यपाल और निर्वाचन आयोग को भेजे गए अपने पत्र में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि वर्तमान में देश और प्रदेश में जनतंत्र या गणतंत्र जैसी व्यवस्थाएं समाप्त हो चुकी हैं और अब केवल ‘भ्रमतंत्र’ का बोलबाला है। उन्होंने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए यह भी कह दिया कि देश में अब ‘देशी’ नहीं बल्कि ‘विदेशी जनता पार्टी’ की सरकार का शासन है। एक कार्यरत प्रशासनिक अधिकारी द्वारा सरकार के विरुद्ध इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करना प्रशासनिक इतिहास में एक दुर्लभ और चौंकाने वाली घटना मानी जा रही है।

इस पूरे प्रकरण की जड़ प्रयागराज के माघ मेले में हुई एक घटना से जुड़ी है। अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे में आरोप लगाया है कि मौनी अमावस्या के स्नान के दौरान ज्योतिष पीठ ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ स्थानीय प्रशासन ने अभद्रता और मारपीट की। उन्होंने पत्र में अत्यंत भावुक और आक्रोशित लहजे में लिखा है कि वृद्ध आचार्यों और बटुक ब्राह्मणों को जमीन पर घसीटा गया और उनकी शिखा (चोटी) पकड़कर प्रताड़ित किया गया। अग्निहोत्री, जो स्वयं ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, ने इसे न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का अपमान बताया बल्कि इसे सीधे तौर पर ब्राह्मण विरोधी विचारधारा का परिणाम करार दिया। उन्होंने कहा कि संतों और ब्राह्मणों की मर्यादा का इस तरह हनन होना एक साधारण ब्राह्मण की आत्मा को कंपा देने वाला है।

इस्तीफे के बाद अलंकार अग्निहोत्री का एक और रूप सामने आया जब वह हाथों में पोस्टर लिए विरोध प्रदर्शन करते दिखे। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों में वह ‘यूजीसी काला कानून वापस लो’ और ‘शंकराचार्य का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान’ जैसे नारों वाले पोस्टर पकड़े नजर आए। उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों और विधेयकों पर भी अपनी कड़ी असहमति दर्ज कराई है। अग्निहोत्री का तर्क है कि सरकार की कुछ नीतियां और हालिया कानून जनहित के विपरीत हैं। उनके इस विरोध ने प्रशासन के भीतर अनुशासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की रेखा पर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब सोमवार शाम अलंकार अग्निहोत्री जिला मजिस्ट्रेट (DM) के आवास पर पहुंचे। वहां से निकलने के बाद उन्होंने जिला प्रशासन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि उन्हें डीएम आवास पर करीब 45 मिनट तक बंधक बनाकर रखा गया। उन्होंने बताया कि जब उन्हें अपनी सुरक्षा का खतरा महसूस हुआ, तो उन्होंने शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को फोन किया, जिसके बाद ही उन्हें वहां से जाने दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ षड्यंत्र रचा जा रहा था ताकि उन्हें रातभर वहीं रोककर रखा जा सके। अग्निहोत्री ने एक और सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि जब वह डीएम अविनाश सिंह के साथ वार्ता कर रहे थे, तब लखनऊ से किसी बड़े अधिकारी का फोन आया था। आरोप है कि डीएम ने फोन का स्पीकर ऑन रखा था और दूसरी तरफ से लखनऊ के अधिकारी ने उनके लिए अपशब्दों और अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया।

इन आरोपों के जवाब में बरेली के जिला प्रशासन ने सफाई पेश की है। एडीएम (प्रशासन) देश दीपक सिंह ने बंधक बनाने की खबरों को पूरी तरह निराधार और बेबुनियाद बताया है। उन्होंने कहा कि वहां बंधक जैसी कोई स्थिति नहीं थी; बल्कि अग्निहोत्री स्वयं चर्चा के लिए आए थे। एडीएम के अनुसार, वहां डीएम सहित तीनों एडीएम मौजूद थे और उन्हें सम्मान के साथ कॉफी भी दी गई थी। अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने अलंकार अग्निहोत्री को सलाह दी थी कि यदि वह किसी मानसिक तनाव या परेशानी में हैं, तो वह कुछ दिनों की छुट्टी ले लें और आराम करें, लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं थे। प्रशासन का मानना है कि अग्निहोत्री द्वारा लगाए गए आरोप केवल सहानुभूति बटोरने या मामले को राजनीतिक रंग देने का प्रयास हैं।

इस घटना के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी के नेता रविदास मेहरोत्रा ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य सरकार जानबूझकर शंकराचार्य और संतों को प्रताड़ित कर रही है। उन्होंने कहा कि संतों को पवित्र स्नान से रोकना और उन्हें धरने पर बैठने के लिए मजबूर करना सरकार की विफलता है। दूसरी ओर, भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वह ऐसे किसी अधिकारी को नहीं जानते। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कई बार लोगों को राजनीति की खुशबू आने लगती है और वे राजनीति में आने के लिए ऐसे बहाने और इस्तीफों का सहारा लेते हैं। वहीं, कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने कानूनों का बचाव करते हुए कहा कि लोकतंत्र में कानून जनता के लिए बनते हैं और यदि कोई कमी होती है तो उस पर भविष्य में विचार किया जा सकता है, लेकिन इस आधार पर विरोध करना उचित नहीं है।

स्थानीय स्तर पर कर्मचारी संगठनों और कुछ सामाजिक समूहों ने अलंकार अग्निहोत्री का समर्थन किया है। कर्मचारी कल्याण सेवा समिति बरेली कॉलेज के अध्यक्ष जितेंद्र मिश्रा ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि यदि एक सिटी मजिस्ट्रेट स्तर का अधिकारी असुरक्षित महसूस कर रहा है या धार्मिक अपमान से आहत होकर इस्तीफा दे रहा है, तो सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने यूजीसी कानून और संतों के सम्मान के विषय पर विचार नहीं किया, तो वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। वर्तमान में अलंकार अग्निहोत्री ने अपना सरकारी बंगला खाली करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और उनके समर्थक उनके आवास पर एकत्र हो रहे हैं। यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक तबादले या निलंबन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म, जाति और नौकरशाही के अंतर्संबंधों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

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