• January 31, 2026

इसरो का ‘मिशन 2026’ शुरू: PSLV-C62 ने अन्वेषा और 14 अन्य उपग्रहों के साथ भरी उड़ान, भारत ने अंतरिक्ष में बनाया अपना ‘साइबरकैफे’

श्रीहरिकोटा: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने आज नए साल 2026 का शानदार आगाज करते हुए अपने सबसे भरोसेमंद रॉकेट पीएसएलवी-सी62 (PSLV-C62) को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के प्रथम लॉन्च पैड से सुबह 10:17 बजे रॉकेट ने नारंगी लपटों के साथ नीले आसमान को चीरते हुए उड़ान भरी। यह मिशन न केवल इसरो की तकनीकी श्रेष्ठता को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक स्मॉल-सैटेलाइट लॉन्च मार्केट में भारत की बादशाहत को भी नए आयाम देता है। इस मिशन के जरिए कुल 15 उपग्रहों को पृथ्वी की सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में स्थापित किया जा रहा है, जिनमें से 7 भारतीय और 8 विदेशी देशों के उपग्रह शामिल हैं।

अन्वेषा: दुश्मन की हर हरकत पर ‘आसमान से नजर’ रखेगा भारत का सीसीटीवी

इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण पेलोड ‘EOS-N1’ है, जिसे ‘अन्वेषा’ नाम दिया गया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित यह उपग्रह भारत की सुरक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला है। अन्वेषा को ‘भारत का सीसीटीवी’ कहा जा रहा है क्योंकि इसमें उन्नत हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग (HRS) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। साधारण उपग्रह कैमरे केवल तीन रंगों (लाल, हरा, नीला) को देख सकते हैं, लेकिन अन्वेषा की हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक हर एक पिक्सेल में सैकड़ों लाइट बैंड्स को रिकॉर्ड करने की क्षमता रखती है।

डिफेंस सेक्टर के लिए यह तकनीक एक ‘सीक्रेट वेपन’ की तरह काम करेगी। इसकी मदद से घने जंगलों या झाड़ियों के पीछे छिपे आतंकियों, जमीन के अंदर बने बंकरों और यहाँ तक कि पानी के नीचे छुपाए गए हथियारों की भी पहचान की जा सकेगी। इसके अलावा, यह तकनीक सीमा पर तैनात सेना को मिट्टी के प्रकार की जानकारी देगी, जिससे टैंकों और भारी वाहनों के मूवमेंट की बेहतर प्लानिंग की जा सकेगी। यह उपग्रह युद्ध की स्थिति में 3D सिमुलेशन तैयार करने के लिए आवश्यक डेटा भी प्रदान करेगा।

अंतरिक्ष में ईंधन भरने की तैयारी: आयुलसैट ने रचा नया इतिहास

पीएसएलवी-सी62 मिशन की एक और बड़ी उपलब्धि ‘आयुलसैट’ (AayulSAT) का प्रक्षेपण है। बंगलूरू स्थित स्पेस स्टार्टअप ‘ऑर्बिटएड एयरोस्पेस’ द्वारा विकसित यह सैटेलाइट भारत का पहला ‘ऑन-ऑर्बिट फ्यूलिंग डेमो’ उपग्रह है। वर्तमान में, जब किसी उपग्रह का ईंधन खत्म हो जाता है, तो वह कचरा बन जाता है। आयुलसैट तकनीक का लक्ष्य अंतरिक्ष में ही उपग्रहों में दोबारा ईंधन भरने (Refueling) की क्षमता का परीक्षण करना है। यदि यह सफल रहता है, तो भविष्य में करोड़ों रुपये की लागत वाले उपग्रहों की उम्र बढ़ाई जा सकेगी और अंतरिक्ष में मलबे (Space Debris) की समस्या को कम करने में बड़ी मदद मिलेगी।

दुनिया का पहला ‘स्पेस साइबरकैफे’ और सबसे हल्की टेलिस्कोप

इसरो ने इस मिशन के जरिए एक अनूठा प्रयोग किया है जिसे ‘स्पेस साइबरकैफे’ कहा जा रहा है। हैदराबाद के स्टार्टअप्स ‘टेकमी2स्पेस’ और ‘ईऑन स्पेस लैब्स’ द्वारा विकसित MOI-1 उपग्रह एक चलता-फिरता एआई-इमेज लैब है। यह अंतरिक्ष में ही डेटा प्रोसेसिंग करने में सक्षम है। इसकी सबसे रोचक विशेषता यह है कि दुनिया भर के उपयोगकर्ता मात्र 2 डॉलर (लगभग 180 रुपये) प्रति मिनट की दर से इसके प्रोसेसर का समय किराए पर ले सकते हैं।

इसी उपग्रह के भीतर ‘मीरा’ (MIRA) नाम की टेलिस्कोप भी भेजी गई है, जो दुनिया की सबसे हल्की स्पेस टेलिस्कोप है। महज 502 ग्राम वजन वाली यह टेलिस्कोप एक सिंगल फ्यूज्ड सिलिका ब्लॉक से बनी है। इसकी ठोस संरचना इसे लॉन्च के दौरान होने वाले तीव्र कंपन से बचाती है और अंतरिक्ष में उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने में मदद करती है।

वैश्विक राइडशेयर: नेपाल से ब्राजील तक भारत की ‘सैटेलाइट टैक्सी’

इसरो की व्यावसायिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) ने इस मिशन को एक अंतरराष्ट्रीय ‘सैटेलाइट टैक्सी’ के रूप में पेश किया है। इसमें नेपाल का ‘मुनल’ उपग्रह शामिल है जो वहां की टोपोग्राफी का नक्शा तैयार करेगा। स्पेन का ‘केस्ट्रेल’ उपग्रह अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश की तकनीक का परीक्षण करेगा। इनके अलावा ब्राजील का ‘एल्डिबारन-1’ समुद्री बचाव कार्यों के लिए और एक इंडो-मॉरीशस संयुक्त उपग्रह भी इस मिशन का हिस्सा हैं। एक विशेष ‘ऑर्बिटल टेम्पल’ भी भेजा गया है, जिसमें 14,000 लोगों के नाम अंतरिक्ष में हमेशा के लिए संरक्षित किए जाएंगे। भारत के भीतर से ध्रुवा स्पेस के ‘लचित’ और ‘थायबोल्ट-3’ उपग्रह स्वदेशी संचार प्रणालियों को मजबूती प्रदान करेंगे।

हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक की दौड़ में भारत की मजबूत स्थिति

अन्वेषा के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की कतार में और आगे बढ़ गया है जिनके पास उन्नत हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग क्षमताएं हैं। अब तक अमेरिका, चीन, जर्मनी, जापान, इटली और पाकिस्तान जैसे देशों ने इस तकनीक का उपयोग किया है। भारत ने अपनी पहली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट (HySIS) 2018 में लॉन्च की थी। अन्वेषा उसी तकनीक का एक अत्याधुनिक और अपग्रेडेड संस्करण है, जो नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए सूक्ष्म जानकारी प्रदान करेगा। यह पर्यावरण निगरानी, कृषि क्षेत्र में फसलों के स्वास्थ्य की जांच और खनिज संसाधनों की खोज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

पीएसएलवी की 64वीं उड़ान और इसरो का अटूट भरोसा

पीएसएलवी (PSLV) को इसरो का ‘वर्कहॉर्स’ कहा जाता है, जिसने चंद्रयान-1, मंगलयान (MOM) और आदित्य-L1 जैसे ऐतिहासिक मिशनों को उनकी मंजिलों तक पहुँचाया है। आज की यह 64वीं उड़ान इसरो के लिए साख का विषय थी, विशेषकर पिछले मिशन PSLV-C61 (18 मई 2025) के आंशिक रूप से सफल रहने के बाद। पिछले साल तीसरे चरण में आई तकनीकी खामी को पीछे छोड़ते हुए वैज्ञानिकों ने इस बार पीएसएलवी-सी62 को पूरी तरह दोषमुक्त बनाकर लॉन्च किया है।

इसरो का यह सफल प्रक्षेपण भारत को एक विश्वसनीय और लागत प्रभावी स्पेस हब के रूप में फिर से स्थापित करता है। 260 टन वजनी इस रॉकेट की गूंज ने एक बार फिर दुनिया को संदेश दिया है कि भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान अब न केवल चंद्रमा और मंगल तक सीमित है, बल्कि यह स्टार्टअप्स, एआई, और रणनीतिक सुरक्षा के क्षेत्रों में भी अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

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