साइबर अपराध और बैंक खाता फ्रीजिंग: सुप्रीम कोर्ट में एक समान नियम बनाने की कवायद, सीजेआई की पीठ करेगी सुनवाई
नई दिल्ली: डिजिटल इंडिया के दौर में जहां एक ओर वित्तीय लेनदेन सुगम हुआ है, वहीं साइबर अपराधों की बाढ़ ने आम नागरिक और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इस बीच, साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज और डी-फ्रीज करने की मनमानी प्रक्रिया पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने की मांग करने वाली याचिका को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। यह मामला न केवल जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि उन हजारों निर्दोष लोगों के मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा है जिनके खाते बिना किसी पूर्व सूचना के महीनों तक बंद पड़े रहते हैं।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे सीजेआई की अगुवाई वाली उस पीठ के साथ टैग करने का सुझाव दिया है, जो पहले से ही ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ और इसी तरह के साइबर वित्तीय अपराधों पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही है। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि अब समय आ गया है जब बैंक, पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों के बीच समन्वय के लिए एक पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र विकसित किया जाए।
याचिका की मुख्य मांगें: बिना कारण बताए खाता फ्रीज करने पर रोक
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में मुख्य रूप से तीन प्रार्थनाएं की गई हैं, जिनमें से ‘बी’ और ‘सी’ बेहद महत्वपूर्ण हैं। याचिकाकर्ता की मांग है कि किसी भी बैंक खाते को तब तक फ्रीज न किया जाए जब तक कि जांच एजेंसी के पास इसके लिए कोई लिखित और ठोस ‘कारणयुक्त आदेश’ (Reasoned Order) न हो। वर्तमान में कई मामलों में देखा गया है कि साइबर सेल केवल एक ईमेल या फोन कॉल के जरिए बैंकों को खाता फ्रीज करने का निर्देश दे देती है, और बैंक बिना ग्राहक को सूचित किए उस पर तत्काल कार्रवाई कर देते हैं।
प्रार्थना ‘बी’ में यह भी कहा गया है कि यदि किसी जांच के तहत खाता फ्रीज किया जाता है, तो इसकी सूचना संबंधित खाताधारक को अधिकतम 24 घंटे के भीतर दी जानी चाहिए। अक्सर खाताधारकों को तब पता चलता है कि उनका खाता फ्रीज हो गया है जब वे एटीएम से पैसे निकालने जाते हैं या किसी दुकान पर यूपीआई भुगतान करने की कोशिश करते हैं। सूचना के अभाव में आम आदमी को न केवल आर्थिक तंगी झेलनी पड़ती है, बल्कि उसे कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत करने में भी देरी होती है।
पूरे देश के लिए एक समान एसओपी की आवश्यकता
याचिका की प्रार्थना ‘सी’ सबसे अहम है, जिसमें पूरे देश के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने की मांग की गई है। फिलहाल, अलग-अलग राज्यों की पुलिस और अलग-अलग जांच एजेंसियां (जैसे ईडी, सीबीआई, या स्थानीय साइबर सेल) अपने हिसाब से खातों को फ्रीज करती हैं। इससे प्रक्रिया में एकरूपता की कमी होती है और डी-फ्रीज कराने की प्रक्रिया इतनी जटिल हो जाती है कि आम आदमी के लिए वकील करना और अदालतों के चक्कर काटना अनिवार्य हो जाता है।
एक समान एसओपी होने से यह स्पष्ट होगा कि किस स्थिति में पूरा खाता फ्रीज होगा और किस स्थिति में केवल ‘विवादित राशि’ (Disputed Amount) को ही ब्लॉक किया जाएगा। कई बार ऐसा होता है कि किसी खाते में केवल 5,000 रुपये का संदिग्ध लेनदेन हुआ होता है, लेकिन पुलिस पूरे 5 लाख रुपये के खाते को फ्रीज कर देती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एसओपी आने से जांच एजेंसियों की शक्तियों पर अंकुश लगेगा और वे केवल संदिग्ध राशि तक ही अपनी कार्रवाई सीमित रखने के लिए बाध्य होंगी।
केंद्र सरकार और आरबीआई का पक्ष: स्वत: संज्ञान मामले से जुड़ाव
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल कौशिक ने पीठ को अवगत कराया कि इसी तरह का एक मुद्दा मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष पहले से ही विचाराधीन है। यह मामला ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ (Digital Arrest) जैसे गंभीर अपराधों से जुड़ा है, जहां अपराधी खुद को कानून प्रवर्तन अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उनके खाते फ्रीज करने की धमकी देते हैं या वास्तव में फ्रीज करवा देते हैं।
एएसजी ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान याचिकाकर्ताओं के मामले में केंद्र सरकार ने सीधे तौर पर बैंक खाते फ्रीज नहीं किए हैं। सरकार का रुख है कि साइबर अपराध एक जटिल अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क है, और इसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक होती है ताकि अपराधियों द्वारा पैसे को दूसरे खातों में ट्रांसफर करने से रोका जा सके। हालांकि, सरकार इस बात पर सहमत नजर आ रही है कि प्रक्रियाओं में सुधार और पारदर्शिता की गुंजाइश है। कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वह सीजेआई सूर्यकांत से निर्देश लेकर इस मामले को उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करे, ताकि दोनों जुड़े हुए मामलों की एक साथ सुनवाई हो सके।
निर्दोष खाताधारकों की परेशानी और जांच एजेंसियों की चुनौतियां
साइबर अपराध की जांच में बैंक खाता फ्रीज करना एक अनिवार्य हथियार है, लेकिन इसकी मार अक्सर उन लोगों पर पड़ती है जिनका अपराध से कोई सीधा लेना-देना नहीं होता। मिसाल के तौर पर, यदि किसी अपराधी ने ठगी का पैसा ‘अ’ के खाते में डाला और ‘अ’ ने अनजाने में वह पैसा ‘ब’ को किसी वैध सेवा के बदले दे दिया, तो पुलिस ‘अ’ और ‘ब’ दोनों के खाते फ्रीज कर देती है। इस ‘चेन रिएक्शन’ की वजह से हजारों ऐसे लोग परेशान हो रहे हैं जिन्होंने केवल अपनी मेहनत की कमाई का लेनदेन किया था।
जांच एजेंसियों के सामने चुनौती यह है कि साइबर ठगी का पैसा पलक झपकते ही दर्जनों खातों में घूम जाता है। यदि वे तत्काल खाता फ्रीज नहीं करते हैं, तो पीड़ित का पैसा कभी वापस नहीं मिल सकता। लेकिन, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस जल्दबाजी में नागरिकों के जीवन के अधिकार और गरिमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। बिना किसी न्यायिक आदेश के किसी की जमा पूंजी को अनिश्चितकाल के लिए रोक देना वित्तीय आपातकाल जैसी स्थिति पैदा करता है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: क्या बदल जाएगी व्यवस्था?
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश कि इस मामले को सीजेआई की पीठ सुनेगी, इस बात का संकेत है कि अदालत इस मुद्दे को एक व्यापक संवैधानिक और प्रशासनिक सुधार के रूप में देख रही है। 16 जनवरी और 6 जनवरी को हुए पिछले आदेशों में अदालत ने केंद्र को याचिका की प्रतियां उपलब्ध कराने को कहा था ताकि सरकार अपनी तैयारी पूरी कर सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट एक सख्त एसओपी लागू करने का आदेश देता है, तो बैंकों को अपने सॉफ्टवेयर अपडेट करने होंगे ताकि वे संदिग्ध राशि और वैध राशि के बीच अंतर कर सकें। साथ ही, पुलिस को भी खाता फ्रीज करने से पहले एक संक्षिप्त लेकिन तर्कसंगत आधार रिकॉर्ड करना होगा। यह डिजिटल इंडिया की सुरक्षा और नागरिकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। अब सभी की निगाहें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ पर टिकी हैं कि वे इस ‘वित्तीय न्याय’ के मुद्दे पर क्या दिशा-निर्देश जारी करते हैं।