वैश्विक टैरिफ वार और आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत की ‘बजट रणनीति’: बड़े सुधारों के साथ दुनिया के सामने मजबूत विकल्प बनने की तैयारी
नई दिल्ली: वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अमेरिका द्वारा घोषित ‘टैरिफ वार’ और संरक्षणवादी नीतियों ने दुनिया भर के बाजारों में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। इस वैश्विक दबाव और कूटनीतिक उथल-पुथल के बीच, भारत खुद को एक स्थिर और मजबूत आर्थिक विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए कमर कस चुका है। सरकारी सूत्रों और आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, एक फरवरी 2026 को पेश होने वाला आम बजट केवल एक वित्तीय लेखा-जोखा नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक सुधारों का एक व्यापक रोडमैप होगा। सरकार की इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य उच्च विकास दर को बनाए रखना, निर्यात की सीमाओं का विस्तार करना और भारत को वैश्विक निवेश का प्रमुख केंद्र बनाना है।
बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की नई आर्थिक दिशा
अमेरिका की नई व्यापार नीतियों और टैरिफ युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) को प्रभावित किया है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती और अवसर दोनों हैं। सरकार का मानना है कि यदि इस समय घरेलू सुधारों की गति तेज की जाती है, तो चीन से बाहर निकलने वाले वैश्विक निवेशक भारत को अपने अगले गंतव्य के रूप में देख सकते हैं। आगामी बजट में इसकी स्पष्ट झलक देखने को मिलेगी, जहाँ सरकार सेवा क्षेत्र, नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और बुनियादी ढांचे जैसे स्तंभों पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करेगी।
इन सुधारों के माध्यम से सरकार न केवल घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षा प्रदान करना चाहती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की भी इच्छुक है। डिजिटल प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान और स्वास्थ्य सेवा जैसे उभरते क्षेत्रों को भविष्य के विकास की रीढ़ माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार इन क्षेत्रों में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को और अधिक सरल बनाने के लिए विधायी और प्रक्रियात्मक बदलावों की घोषणा कर सकती है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और नए बाजारों की रणनीतिक तलाश
अमेरिकी बाजार में संभावित टैरिफ बाधाओं और निर्यात में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भारत ने अपनी व्यापारिक कूटनीति को तेज कर दिया है। नए साल में भारत कई महत्वपूर्ण देशों और समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और द्विपक्षीय निवेश संधियों (BIT) को अंतिम रूप देने की तैयारी में है। रणनीतिक सूत्रों के अनुसार, इसी महीने यूरोपीय संघ (EU) के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बड़ी प्रगति होने की संभावना है। इसके अलावा, मार्च 2026 तक इजरायल के साथ द्विपक्षीय निवेश संधि को अंतिम रूप दिया जा सकता है।
भारत की यह रणनीति स्पष्ट है कि वह किसी एक बाजार पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है। नए बाजारों की तलाश और व्यापार समझौतों में तेजी लाकर सरकार भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोलना चाहती है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा, बल्कि घरेलू स्तर पर विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) को भी भारी प्रोत्साहन मिलेगा।
सेमीकंडक्टर और आत्मनिर्भरता पर सरकार का बड़ा दांव
तकनीकी मोर्चे पर भारत की सबसे बड़ी बाजी सेमीकंडक्टर क्षेत्र में है। वर्तमान में वैश्विक राजनीति में ‘चिप’ की वही भूमिका है जो कभी तेल की हुआ करती थी। सरकार सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए अपनी प्रोत्साहन योजनाओं (PLI) का विस्तार करने की योजना बना रही है। लक्ष्य यह है कि वर्ष 2026 के अंत तक भारत 55 अरब डॉलर के वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में अपनी एक मजबूत और निर्णायक मौजूदगी दर्ज कराए।
चिप निर्माण में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक अनिवार्यता भी है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और रक्षा उपकरणों में सेमीकंडक्टर की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार चाहती है कि भारत इस क्षेत्र में आयात पर अपनी निर्भरता को न्यूनतम करे। बजट में सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के विकास के लिए विशेष फंड और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के लिए अतिरिक्त कर छूट की घोषणा की जा सकती है।
बुनियादी ढांचा और नवीकरणीय ऊर्जा: भविष्य की नींव
सरकार की विकास रणनीति के दो मुख्य स्तंभ बुनियादी ढांचा और नवीकरणीय ऊर्जा हैं। बुनियादी ढांचे को तेज गति प्रदान करने के लिए ‘गति शक्ति’ और ‘नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन’ जैसी योजनाओं को और अधिक वित्तीय आवंटन मिलने की उम्मीद है। सड़कों, रेलवे और बंदरगाहों के आधुनिकिकरण से लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकें।
वहीं, नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट क्षमता का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। आगामी बजट में ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए नए प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं। ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ यह पहल जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत की वैश्विक प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है और भविष्य के ‘ग्रीन जॉब्स’ के सृजन में सहायक होगी।
सुधारों की रफ्तार बढ़ाना क्यों है आज की जरूरत?
पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार ने जीएसटी (GST) और नए श्रम कानूनों जैसे साहसिक कदम उठाए हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण और कृषि सुधारों जैसे क्षेत्रों में राजनीतिक प्रतिरोध के कारण गति धीमी रही है। हालांकि, अब वैश्विक आर्थिक दबाव और कूटनीतिक बदलावों ने सरकार को इस दिशा में फिर से सक्रिय कर दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को वैश्विक मंदी या ट्रेड वार के प्रभावों से बचना है, तो उसे अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को और अधिक चुस्त-दुरुस्त करना होगा।
वैश्विक निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए नियमों में स्पष्टता और स्थिरता अनिवार्य है। सेवा क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा करना और स्वास्थ्य सेवा को किफायती व सुलभ बनाना भी इस बजट की प्राथमिकता होगी। सरकार का यह स्पष्ट संदेश है कि वह कड़े और साहसिक फैसले लेने से पीछे नहीं हटेगी, क्योंकि बदलते अंतरराष्ट्रीय परिवेश में केवल प्रतिस्पर्धी और लचीली अर्थव्यवस्थाएं ही टिक सकती हैं। 2026 का यह बजट भारत की आर्थिक नियति को दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होने जा रहा है।