• February 3, 2026

रणनीतिक सुधार की दिशा में कदम: विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अमेरिका यात्रा और भविष्य की संभावनाएं

भारतीय विदेश नीति के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो न केवल वर्तमान संबंधों की दिशा तय करते हैं, बल्कि आने वाले दशकों के लिए रणनीतिक नींव भी रखते हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की 2 से 5 फरवरी तक होने वाली तीन दिवसीय अमेरिका यात्रा इसी श्रेणी में आती है। यह यात्रा एक ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक कूटनीति की बिसात पर भारत और अमेरिका के बीच कुछ कड़वाहट और तनाव के स्वर उभर रहे हैं। वाशिंगटन के नेतृत्व में होने वाली महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखला पर मंत्रिस्तरीय बैठक में भाग लेने के लिए रवाना हुए जयशंकर का यह दौरा केवल एक बहुपक्षीय भागीदारी नहीं है, बल्कि यह डोनाल्ड ट्रंप के नए प्रशासन के साथ संबंधों को पुनर्स्थापित करने का एक गंभीर कूटनीतिक प्रयास भी है।

विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के निमंत्रण पर वाशिंगटन पहुंच रहे हैं। इस यात्रा का मुख्य एजेंडा महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित और मजबूत बनाना है। आज की दुनिया में, जहां स्वच्छ ऊर्जा और उच्च तकनीक का बोलबाला है, लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे खनिज किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इस मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का उद्देश्य आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती, स्वच्छ ऊर्जा की ओर परिवर्तन और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना है। भारत के लिए यह मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम करना चाहती है और अमेरिका के साथ मिलकर एक वैकल्पिक और विश्वसनीय तंत्र विकसित करने की इच्छुक है।

हालांकि, इस यात्रा के पीछे की असली कहानी उन द्विपक्षीय बैठकों में छिपी है जो जयशंकर और ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच होनी प्रस्तावित हैं। हाल के महीनों में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी में जो गिरावट देखी गई है, उसे दूर करना जयशंकर की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। संबंधों में इस तनाव का सबसे बड़ा कारण आर्थिक नीतियां और व्यापारिक शुल्क रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ को दोगुना कर 50 प्रतिशत तक बढ़ाना और रूसी कच्चे तेल की खरीद पर भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा ने नई दिल्ली में चिंताएं बढ़ा दी थीं। व्यापारिक मोर्चे पर आई इस सख्ती ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन और संरक्षणवाद की एक नई बहस छेड़ दी है, जिसे सुलझाना दोनों देशों के हित में है।

व्यापार के अलावा, कूटनीतिक स्तर पर भी कुछ असहज स्थितियां पैदा हुई हैं। पिछले साल मई में ट्रंप प्रशासन की ओर से भारत-पाकिस्तान संघर्ष को समाप्त करने के दावों और वाशिंगटन की नई आव्रजन नीति ने भारतीय हितों को प्रभावित किया है। विशेष रूप से आव्रजन नीति में बदलाव का सीधा असर भारतीय पेशेवर समुदाय और छात्रों पर पड़ता है, जो दोनों देशों के बीच ‘लिविंग ब्रिज’ का काम करते हैं। इन मुद्दों ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी जहां दोनों रणनीतिक भागीदारों के बीच संवाद की कमी और अविश्वास की झलक मिलने लगी थी। ऐसे में जयशंकर और मार्को रुबियो की मुलाकात एक ‘बर्फ तोड़ने’ (Ice-breaking) वाली कवायद साबित हो सकती है।

जयशंकर की इस यात्रा को भारतीय विदेश नीति की उस परिपक्वता के रूप में देखा जाना चाहिए जहां भारत अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना विवादित मुद्दों पर मेज पर बैठने को तैयार है। मार्को रुबियो, जिन्हें चीन के प्रति सख्त रुख रखने के लिए जाना जाता है, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकते हैं। भारत और अमेरिका दोनों ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर समान चिंताएं रखते हैं। महत्वपूर्ण खनिजों पर केंद्रित यह बैठक केवल तकनीक के बारे में नहीं है, बल्कि यह इस बारे में भी है कि कैसे लोकतांत्रिक देश मिलकर वैश्विक संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं ताकि किसी एक देश का एकाधिकार समाप्त किया जा सके।

इस दौरे के दौरान होने वाली द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा सहयोग और आतंकवाद विरोधी अभियानों पर भी चर्चा होने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के बीच एक साझा धरातल तलाशना जयशंकर के लिए बड़ी चुनौती होगी। भारतीय पक्ष यह तर्क दे सकता है कि भारत पर ऊंचे शुल्क लगाने से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भी लागत बढ़ेगी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होगी। वहीं, रूसी तेल के मुद्दे पर भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों को स्पष्ट रूप से सामने रख सकता है। यह उम्मीद की जा रही है कि जयशंकर अपनी चिर-परिचित तार्किक शैली और स्पष्टवादिता के साथ अमेरिकी नेतृत्व को यह समझाने में सफल होंगे कि एक मजबूत भारत अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए अनिवार्य है।

कुल मिलाकर, 2 से 5 फरवरी की यह यात्रा भारत-अमेरिका संबंधों के एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है। यदि दोनों देश अपनी व्यापारिक शिकायतों को पीछे छोड़कर साझा रणनीतिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो यह न केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिए बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी एक सकारात्मक संकेत होगा। दुनिया की नजरें अब वाशिंगटन पर टिकी हैं, जहां जयशंकर और रुबियो के बीच होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि क्या ये दो बड़े लोकतंत्र अपने मतभेदों को भुलाकर फिर से कंधे से कंधा मिलाकर चल सकते हैं। यह यात्रा केवल गिरावट को रोकने की कोशिश नहीं है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए एक नया रोडमैप तैयार करने का अवसर भी है।

Digiqole Ad

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *