यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक का केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने किया स्वागत, बोले- ‘सनातन की एकता के लिए अहम फैसला’
नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के विवादित नए इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के फैसले का राजनीतिक गलियारों में स्वागत शुरू हो गया है। मोदी सरकार 3.0 में कैबिनेट मंत्री गिरिराज सिंह ने शीर्ष अदालत के इस आदेश को भारत की सांस्कृतिक अखंडता और सनातन मूल्यों की जीत बताया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी, 2026 से लागू हुए इन नियमों की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए इनके कार्यान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी। कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्ष 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे, जिससे पिछले कुछ हफ्तों से चल रही प्रशासनिक अनिश्चितता पर फिलहाल विराम लग गया है।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए न्यायपालिका के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपने संदेश में लिखा कि सनातन को बांटने वाले यूजीसी के नियमों पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाया जाना एक सराहनीय कदम है। सिंह ने जोर देकर कहा कि यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन मूल्यों की रक्षा की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का भी धन्यवाद करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार की पहचान ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सनातन की अखंड एकता को बनाए रखने की है। उनके अनुसार, इस रोक से देश के लाखों विद्यार्थियों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों को बड़ी राहत मिली है, जो इन नियमों की अस्पष्टता के कारण संशय में थे।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यूजीसी द्वारा अधिसूचित नए नियम अत्यंत अस्पष्ट हैं और इनमें दुरुपयोग की भारी गुंजाइश दिखती है। मुख्य न्यायाधीश ने सामाजिक न्याय और संवैधानिक लक्ष्यों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि क्या हम एक जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं या हम विपरीत दिशा में जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था उन लोगों के लिए निश्चित रूप से होनी चाहिए जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है, लेकिन नियमों का प्रारूप ऐसा नहीं होना चाहिए जो समाज में नए प्रकार के भेदभाव पैदा करे।
अदालत ने इन नियमों को चुनौती देने वाली विभिन्न रिट याचिकाओं पर विचार करते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को औपचारिक नोटिस जारी किया है। पीठ ने निर्देश दिया है कि मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च, 2026 को होगी, तब तक नए नियम प्रभावी नहीं होंगे। सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने इस बात पर भी जोर दिया कि इन नियमों की भाषा और उनके कानूनी प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए विशेषज्ञों और शिक्षाविदों की एक विशेष समिति बनाई जानी चाहिए। कोर्ट का मानना है कि नियमों में स्पष्टता के अभाव के कारण शैक्षणिक संस्थानों में अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसे रोकना अनिवार्य है।
विवाद की जड़ में यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) विनियम, 2026 की कुछ विशिष्ट धाराएं थीं, जिन्हें लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और कई सामाजिक संगठनों ने विरोध दर्ज कराया था। आलोचकों का तर्क था कि ये नियम न केवल अस्पष्ट हैं, बल्कि इनका क्रियान्वयन एकपक्षीय हो सकता है। गिरिराज सिंह जैसे नेताओं का मानना है कि ऐसे नियम समाज को जातियों में बांटने का काम करते हैं, जो मोदी सरकार के समावेशी विकास के एजेंडे के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद अब सरकार और यूजीसी को 19 मार्च से पहले अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा, जिसमें उन्हें इन नियमों की आवश्यकता और उनकी संवैधानिक वैधता को सिद्ध करना होगा।
शैक्षणिक जगत में भी इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, लेकिन प्रशासनिक दृष्टिकोण से पुराने नियमों की बहाली को एक सुरक्षात्मक कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय इन नियमों के हर पहलू की सूक्ष्म जांच नहीं कर लेता, तब तक इन्हें लागू करना जोखिम भरा हो सकता था। अब सबकी निगाहें 19 मार्च को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि यूजीसी को इन नियमों में संशोधन करने के निर्देश दिए जाते हैं या इन्हें पूरी तरह से निरस्त कर दिया जाएगा।