यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद सामान्य वर्ग का आक्रोश बरकरार: क्या भाजपा के लिए ‘कोर वोटर’ बना चुनौती?
नई दिल्ली/लखनऊ: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियों और रोक के आदेश के बाद भी देश के शिक्षित युवा वर्ग, विशेषकर सामान्य श्रेणी के छात्रों में केंद्र सरकार के प्रति नाराजगी कम होने का नाम नहीं ले रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश की सड़कों तक, युवा इन नियमों के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो आने वाले चुनावों में भाजपा को अपने सबसे मजबूत ‘वोट बैंक’ की बेरुखी का सामना करना पड़ सकता है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो सामान्य वर्ग का शिक्षित युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा का सबसे मुखर समर्थक रहा है। केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने से लेकर उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में सत्ता हासिल करने तक, इस वर्ग ने भाजपा के पक्ष में जबरदस्त ध्रुवीकरण करने में बड़ी भूमिका निभाई है। सीएसडीएस-लोकनीति के पिछले सर्वेक्षणों के आंकड़े भी इस बात की तसदीक करते हैं कि भाजपा का ग्राफ कम पढ़े-लिखे युवाओं की तुलना में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं के बीच कहीं अधिक ऊंचा रहा है। उदाहरण के तौर पर, 2014 के आम चुनाव में जब 18 से 25 वर्ष के युवाओं का मतदान प्रतिशत 68 प्रतिशत तक पहुंच गया था, तब भाजपा को इस वर्ग का 34 प्रतिशत समर्थन मिला था, जबकि कांग्रेस महज 19 प्रतिशत पर सिमट गई थी। यह रुझान पिछले एक दशक से लगातार बना हुआ था, लेकिन यूजीसी के 2026 के नए नियमों ने इस समीकरण को हिलाकर रख दिया है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं के इस गुस्से के पीछे ठोस संवैधानिक और व्यावहारिक कारण हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के अनुसार, यूजीसी के नए प्रावधानों की प्रकृति पूरी तरह से संविधान विरोधी प्रतीत होती है। उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है, लेकिन यूजीसी के नए नियमों ने अनजाने में सामान्य वर्ग के प्रति एक पूर्वाग्रह ग्रसित छवि बनाने की कोशिश की है। दुबे का तर्क है कि कॉलेज परिसरों में सामान्य वर्ग के छात्रों, विशेषकर छात्राओं को भी कई बार भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, लेकिन वर्तमान नियमों की शब्दावली उन्हें न्याय पाने की प्रक्रिया से बाहर करती दिख रही है। सबसे बड़ी चिंता ‘इक्विटी कमेटी’ की पारदर्शिता को लेकर है, जिसमें सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी इस वर्ग के छात्रों को न्याय के प्रति सशंकित कर रही है।
नाराजगी की यह लहर केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि भाजपा के सांगठनिक ढांचे के भीतर भी कंपन पैदा कर रही है। पार्टी के अंदरखाने इस बात पर गहन चर्चा हो रही है कि कैसे इन नियमों ने पार्टी के ‘आधार वोट’ को चोट पहुंचाई है। खबर है कि कई राज्यों में सामान्य वर्ग से आने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं ने पार्टी के पदों से इस्तीफा देना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां जातिगत समीकरण बेहद संवेदनशील हैं, भाजपा नेताओं को अपने ही निर्वाचन क्षेत्रों में युवाओं के कड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक, स्थानीय नेताओं का मानना है कि यदि सरकार ने इन नियमों को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की या इन्हें वापस नहीं लिया, तो क्षेत्र में प्रचार करना भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
विपक्ष भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं दे रहा है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि किसी भी वर्ग के निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। विपक्ष के इस रुख ने भाजपा के सहयोगी दलों को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा जैसे दल पिछड़े और अति-पिछड़े वर्गों की राजनीति करते हैं, लेकिन उन्हें भी पता है कि उनकी चुनावी जीत में भाजपा के कोर वोटर यानी सामान्य वर्ग का समर्थन अनिवार्य होता है। संजय निषाद जैसे नेताओं ने भले ही शुरुआत में नियमों का स्वागत किया हो, लेकिन जमीनी हकीकत को देखते हुए सहयोगी दलों के भीतर भी नुकसान का डर साफ देखा जा सकता है।
यूजीसी रेगुलेशन, 2026 को लेकर जो सबसे बड़ा बिंदु विवाद का केंद्र बना है, वह है इसकी भाषा और सामान्य वर्ग को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखना। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि शैक्षणिक संस्थानों में समानता का अर्थ सभी के लिए समान अवसर और सुरक्षा होनी चाहिए, न कि किसी एक वर्ग को लक्षित करना। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि इन नियमों का दुरुपयोग हो सकता है और इनकी भाषा में स्पष्टता का अभाव है। अब जबकि मामला 19 मार्च तक के लिए टल गया है और केंद्र से जवाब मांगा गया है, भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस ‘परसेप्शन’ की लड़ाई को जीतने की है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भाजपा के लिए यह स्थिति ‘इधर कुआं उधर खाई’ जैसी है। यदि वह नियमों में बड़े बदलाव करती है, तो आरक्षित वर्गों के भीतर गलत संदेश जाने का खतरा है, और यदि वह वर्तमान स्थिति को बनाए रखती है, तो उसका सबसे वफादार युवा समर्थक वर्ग उससे छिटक सकता है। आने वाले समय में केंद्र सरकार की ओर से आने वाला हलफनामा और संभवतः नियमों में संशोधन की कवायद ही यह तय करेगी कि क्या भाजपा अपने इस सबसे बड़े समर्थक वर्ग का भरोसा फिर से बहाल कर पाएगी या नहीं। फिलहाल, बारामती से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक, राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ है और सबकी नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।