मकर संक्रांति और पोंगल के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी की गौ सेवा: भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप
नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति में पर्व और त्यौहार केवल हर्षोल्लास का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति, जीव-जंतुओं और मानवीय संवेदनाओं के प्रति आभार व्यक्त करने का एक अनुपम अवसर भी होते हैं। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मकर संक्रांति और पोंगल के शुभ अवसर पर अपने आधिकारिक आवास, 7 लोक कल्याण मार्ग पर ‘गौ सेवा’ कर एक नई मिसाल पेश की है। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आधुनिक भारत के नेतृत्वकर्ता की अपनी जड़ों और सनातन मूल्यों के प्रति अटूट आस्था को भी रेखांकित करता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने मकर संक्रांति के सूर्य के उत्तरायण होने के पुण्य काल में गायों को अपने हाथों से चारा खिलाया और उनका आशीर्वाद लिया। इस दौरान प्रधानमंत्री के चेहरे पर जो शांति और संतोष के भाव थे, वे करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। गौरतलब है कि इससे ठीक एक दिन पहले, 14 जनवरी को दक्षिण भारत के प्रमुख त्यौहार पोंगल के अवसर पर भी प्रधानमंत्री ने इसी प्रकार गौ सेवा की थी। पोंगल का पर्व विशेष रूप से कृषि और पशुधन की महत्ता को समर्पित होता है, और प्रधानमंत्री की इस पहल ने उत्तर से दक्षिण तक भारत की सांस्कृतिक एकता के सूत्र को और अधिक मजबूती प्रदान की है।
गौ सेवा और भारतीय परंपरा का अटूट मेल
भारतीय समाज में गाय को केवल एक पशु के रूप में नहीं, बल्कि ‘गौ माता’ के रूप में पूजा जाता है। वेदों से लेकर आधुनिक समाज तक, गौ सेवा को पुण्यदायी और सात्विक कर्म माना गया है। प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम इसी महान विरासत का सम्मान है। मकर संक्रांति, जो दान-पुण्य और नई ऊर्जा के आगमन का प्रतीक है, उस दिन गायों को घास और चारा खिलाना इस बात का संकेत है कि देश का विकास तब तक पूर्ण नहीं है जब तक हम अपनी पारिस्थितिकी और जीव-जगत का संरक्षण न करें।
प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने संबोधन में ‘विरासत भी, विकास भी’ का मंत्र दोहराते हैं। उनके आवास पर हुई यह गौ सेवा इसी मंत्र का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जब देश का सर्वोच्च नेता स्वयं पशु सेवा में संलग्न होता है, तो वह पूरे समाज को यह संदेश देता है कि आधुनिकता की दौड़ में हमें अपनी प्राचीन मान्यताओं और जीव-मात्र के प्रति दया के भाव को नहीं भूलना चाहिए। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ यानी पशुधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक माध्यम है।
पोंगल और मकर संक्रांति के बीच सांस्कृतिक सेतु
पोंगल और मकर संक्रांति, दोनों ही त्यौहार फसल कटाई के उत्सव हैं। जहाँ दक्षिण में पोंगल के दौरान ‘मट्टू पोंगल’ के दिन विशेष रूप से बैलों और गायों की पूजा की जाती है, वहीं उत्तर और पश्चिम भारत में मकर संक्रांति पर गायों को दान देने और चारा खिलाने की परंपरा है। प्रधानमंत्री ने लगातार दो दिनों तक इन रीति-रिवाजों का पालन कर ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को चरितार्थ किया है। उन्होंने यह दिखाया है कि भौगोलिक दूरियों के बावजूद, भारत की आत्मा एक ही सांस्कृतिक चेतना से स्पंदित होती है।
प्रधानमंत्री आवास के लॉन में गायों के साथ प्रधानमंत्री की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी व्यापक रूप से साझा की जा रही हैं। लोग इसे प्रधानमंत्री की सादगी और उनके जमीन से जुड़े व्यक्तित्व का परिचायक बता रहे हैं। यह कोई पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री ने पशु प्रेम दिखाया हो, लेकिन त्योहारों के विशिष्ट अवसर पर उनकी यह सक्रियता धार्मिक और सामाजिक महत्व को और अधिक बढ़ा देती है। यह युवाओं को भी अपनी संस्कृति से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है।
जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता का संदेश
आज के दौर में जब शहरीकरण बढ़ रहा है और लोग प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री की यह पहल हमें पुनः अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करती है। गौ सेवा को भारतीय दर्शन में ‘अहिंसा’ और ‘करुणा’ का उच्चतम रूप माना गया है। प्रधानमंत्री द्वारा गायों को दुलारना और उन्हें अपने हाथों से चारा खिलाना यह दर्शाता है कि सत्ता के शिखर पर होने के बावजूद, वह जीव-मात्र की सेवा के प्रति उतने ही समर्पित हैं जितना एक साधारण भारतीय नागरिक।
इस घटनाक्रम का एक सामाजिक पहलू यह भी है कि यह देश में ‘गौ संरक्षण’ के अभियान को और अधिक गति प्रदान करता है। सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं, जैसे कि ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’, का उद्देश्य भी भारतीय नस्ल की गायों का संरक्षण और संवर्धन करना है। प्रधानमंत्री की निजी स्तर पर की गई यह सेवा इन सरकारी नीतियों को एक नैतिक बल प्रदान करती है। यह समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि गाय केवल डेयरी उद्योग का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह हमारी आध्यात्मिक और सामाजिक संरचना का एक अभिन्न अंग है।
निष्कर्ष: सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह गौ सेवा उनके व्यक्तिगत विश्वास के साथ-साथ राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की यात्रा का भी हिस्सा है। मकर संक्रांति और पोंगल जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर उनके द्वारा की गई यह पहल देशवासियों को याद दिलाती है कि हमारे त्यौहार केवल उपभोग के लिए नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और आभार प्रकट करने के लिए हैं। प्रधानमंत्री ने अपने आचरण से यह सिद्ध किया है कि एक विकसित भारत के निर्माण का मार्ग हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण से होकर ही गुजरता है।
यह गौ सेवा आने वाले समय में देश के नागरिकों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करेगी, जिससे पशु कल्याण और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना और सुदृढ़ होगी। प्रधानमंत्री का यह सहज और सरल अंदाज करोड़ों लोगों के दिलों को छू गया है और इसने उत्सव की खुशियों को एक नई सार्थकता प्रदान की है।