बीएमसी चुनाव रुझान: मुंबई में सत्ता परिवर्तन की आहट और ठाकरे परिवार के 25 साला साम्राज्य पर संकट
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आता दिख रहा है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के हालिया चुनाव के जो रुझान सामने आ रहे हैं, वे न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश की राजनीति में हलचल मचाने वाले हैं। करीब चार साल के लंबे अंतराल के बाद 15 जनवरी को हुए मतदान के बाद जो शुरुआती आंकड़े और रुझान मिल रहे हैं, उनके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई दिखाई दे रही है। यदि ये रुझान अंतिम नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह 25 वर्षों में पहली बार होगा जब ठाकरे परिवार का मुंबई महानगरपालिका की सत्ता से पूरी तरह पत्ता साफ हो जाएगा।
यह चुनाव केवल एक नगर निकाय का चुनाव नहीं है, बल्कि यह उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के लिए अस्तित्व की लड़ाई और भाजपा के लिए मुंबई पर अपनी पकड़ मजबूत करने का लिटमस टेस्ट साबित हो रहा है। 1996 से लगातार बीएमसी पर राज करने वाला ठाकरे परिवार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसके सबसे मजबूत किले की दीवारें दरकती नजर आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन रुझानों ने यह साफ कर दिया है कि मुंबई की जनता अब नए राजनीतिक समीकरणों और विकास के वादों की ओर देख रही है।
ठाकरे परिवार और बीएमसी का दशकों पुराना अटूट रिश्ता
शिवसेना और बीएमसी का रिश्ता महज सत्ता का नहीं, बल्कि भावनात्मक और संगठनात्मक भी रहा है। शिवसेना के लिए बीएमसी की चुनावी यात्रा 1971 में शुरू हुई थी जब हेमचंद्र गुप्ते महापौर बने थे। हालांकि, पार्टी का असली वर्चस्व 1985 के चुनाव के बाद स्थापित हुआ। 1992 तक शासन करने के बाद कुछ समय के लिए सत्ता कांग्रेस और आरपीआई के पास गई, लेकिन 1996 में शिवसेना ने जो वापसी की, वह ऐतिहासिक थी। तब से लेकर 2022 तक, लगातार 25 सालों तक बीएमसी की कमान ठाकरे परिवार के हाथ में रही।
मुंबई महानगरपालिका को शिवसेना की ‘लाइफलाइन’ माना जाता रहा है। यहीं से पार्टी को आर्थिक मजबूती और जमीनी कार्यकर्ताओं का बड़ा नेटवर्क मिलता था। बाल ठाकरे से लेकर उद्धव ठाकरे तक, मातोश्री (ठाकरे निवास) का आदेश ही बीएमसी की नीतियों को तय करता था। लेकिन 2022 में पार्टी के भीतर हुई बड़ी बगावत और एकनाथ शिंदे के अलग होने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल गए। इस बार का चुनाव बिना किसी स्पष्ट बहुमत के और बदली हुई परिस्थितियों में हुआ, जिसका असर अब रुझानों में भाजपा की बढ़त के रूप में दिख रहा है।
भाजपा की रणनीतिक जीत और महायुति का बढ़ता प्रभाव
वरिष्ठ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा की इस संभावित जीत के पीछे एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। भाजपा ने इस बार पारंपरिक राजनीति से हटकर पूरी तरह से विकास और बुनियादी ढांचे को अपना मुख्य हथियार बनाया। कोस्टल रोड, मेट्रो नेटवर्क का विस्तार और नवी मुंबई एयरपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स को भाजपा ने अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया। मतदाताओं के बीच यह संदेश देने में भाजपा काफी हद तक सफल रही कि ‘डबल इंजन’ की सरकार (केंद्र और राज्य) ही मुंबई की समस्याओं का स्थायी समाधान निकाल सकती है।
दूसरा सबसे बड़ा कारण ‘महायुति’ गठबंधन का मजबूत होना रहा। देवेंद्र फडणवीस की रणनीतिक कुशलता और एकनाथ शिंदे के पास मौजूद शिवसेना का मूल कैडर जब भाजपा के साथ मिला, तो इसने उद्धव ठाकरे की शक्ति को काफी कमजोर कर दिया। भाजपा ने इस बार वार्ड स्तर पर अपनी संगठन शक्ति को बहुत मजबूत किया था। सत्ता में होने के कारण सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ जनता तक पहुंचाना और हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की फौज ने भाजपा को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।
ठाकरे गुट की विफलता के पीछे के गहरे कारण
दूसरी ओर, ठाकरे परिवार की इस संभावित हार के पीछे कई आंतरिक और बाहरी कारण गिनाए जा रहे हैं। पार्टी में हुआ विभाजन सबसे बड़ा आघात था। उद्धव ठाकरे के साथ रहने वाले कई अनुभवी नगरसेवक और विधायक एकनाथ शिंदे के साथ चले गए, जिससे पार्टी का जमीनी ढांचा कमजोर हो गया। इसके अलावा, उद्धव ठाकरे ने इस बार भी ‘मराठी मानुष’ और ‘मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश’ जैसे पुराने भावनात्मक मुद्दों पर ही दांव लगाया। जानकारों का कहना है कि मुंबई की नई पीढ़ी अब केवल भावनात्मक नारों के बजाय बेहतर सुविधाओं और रोजगार के अवसरों पर ध्यान दे रही है।
एक और बड़ा मुद्दा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का विरोध रहा। आरे मेट्रो शेड जैसे प्रोजेक्ट्स को रोकने या उनमें देरी करने के फैसलों को भाजपा ने ‘विकास विरोधी’ छवि के रूप में प्रचारित किया। आम मुंबईकर जो रोज ट्रैफिक और लोकल ट्रेनों की भीड़ से जूझता है, उसे लगा कि राजनीतिक गतिरोध के कारण उसके जीवन की सुगमता में देरी हो रही है। इसके अलावा, रैलियों में जुटने वाली भारी भीड़ का वोटों में तब्दील न हो पाना भी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे दोनों के लिए चिंता का विषय बना।
क्यों पूरी दुनिया की नजरें बीएमसी पर टिकी हैं
बीएमसी कोई साधारण नगर निगम नहीं है। 1865 (या कुछ स्रोतों के अनुसार 1873) में स्थापित यह संस्थान देश का सबसे पुराना और दुनिया का सबसे अमीर नगर निकाय है। इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका वार्षिक बजट कई छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कुल बजट से भी अधिक है। लगभग 74,000 करोड़ रुपये का बजट रखने वाली यह संस्था मुंबई के हर छोटे-बड़े पहलू को नियंत्रित करती है।
मुंबई में रहने वाले बड़े उद्योगपतियों से लेकर बॉलीवुड के सितारों तक, हर किसी की नागरिक सुविधाएं बीएमसी के हाथ में होती हैं। 2,050 किलोमीटर लंबा सड़क नेटवर्क, सात बड़ी झीलों से होने वाली पानी की आपूर्ति और रोजाना 10,000 मीट्रिक टन कचरे का प्रबंधन करना बीएमसी की जिम्मेदारी है। इसके अलावा, यह दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में से एक का संचालन करती है, जिसमें चार बड़े मेडिकल कॉलेज और 16 सामान्य अस्पताल शामिल हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी बीएमसी 1100 से अधिक स्कूलों के माध्यम से लाखों बच्चों का भविष्य संवारती है।
बीएमसी की आर्थिक शक्ति: बजट और फंड्स का गणित
बीएमसी की सबसे बड़ी ताकत उसकी आर्थिक स्वायत्तता है। यह देश का एकमात्र ऐसा नगर निगम है जिसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए राज्य या केंद्र सरकार के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता। इसका राजस्व मुख्य रूप से संपत्ति कर (Property Tax) से आता है, जो मुंबई की महंगी रिहायशी और कमर्शियल संपत्तियों पर लगाया जाता है। इसके अलावा, पानी और सीवेज शुल्क के रूप में मिलने वाली राशि भी आय का बड़ा स्रोत है।
शहर में होने वाले नए निर्माण कार्यों से मिलने वाला ‘डेवलपमेंट चार्ज’ और विज्ञापनों से होने वाली कमाई बीएमसी की तिजोरी को भरती है। हालांकि राज्य सरकार से भी अनुदान मिलते हैं, लेकिन बीएमसी का अपना राजस्व आधार इतना मजबूत है कि वह हजारों करोड़ के कोस्टल रोड जैसे प्रोजेक्ट खुद के दम पर पूरे कर रही है। यही कारण है कि इस संस्था पर कब्जा करने का मतलब है कि एक बहुत बड़े वित्तीय संसाधन और प्रशासनिक शक्ति पर नियंत्रण पाना।
निष्कर्ष: मुंबई की राजनीति का नया सवेरा?
बीएमसी चुनाव के ये रुझान केवल एक सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा नहीं कर रहे, बल्कि यह महाराष्ट्र की राजनीति के बदलते स्वरूप का प्रतिबिंब हैं। यदि भाजपा अंततः सत्ता हासिल करती है, तो यह मुंबई के राजनीतिक इतिहास में एक नए युग की शुरुआत होगी। ठाकरे परिवार के लिए यह आत्ममंथन का समय होगा कि वे कैसे अपने खोए हुए गढ़ को वापस पा सकते हैं। आने वाले कुछ घंटों में जब ये रुझान पक्के नतीजों में बदलेंगे, तब यह साफ हो जाएगा कि मुंबई के ‘राजा’ के रूप में अब किसका राजतिलक होगा। लेकिन एक बात स्पष्ट है—मुंबई की जनता ने विकास और राजनीतिक स्थिरता को प्राथमिकता दी है।