धर्म और कर्तव्य का द्वंद्व: बरेली सिटी मजिस्ट्रेट का इस्तीफा, शंकराचार्य का बड़ा प्रस्ताव और प्रशासनिक गलियारों में मचा हड़कंप
उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में गणतंत्र दिवस का अवसर इस बार एक अभूतपूर्व हलचल लेकर आया। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपनी सेवा और पद को त्यागते हुए न केवल इस्तीफा दिया, बल्कि सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली पर ऐसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए, जिसने शासन से लेकर संतों के शिविरों तक खलबली मचा दी है। वर्ष 2019 बैच के पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने अपने त्यागपत्र में धार्मिक निष्ठा और प्रशासनिक विसंगतियों को आधार बनाया है। इस घटनाक्रम में तब एक नया मोड़ आया जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने स्वयं संज्ञान लेते हुए इस पूर्व अधिकारी को ‘धर्म के क्षेत्र’ में सरकार से भी बड़े पद का प्रस्ताव दे दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने इस पूरे प्रकरण को अब एक बड़े वैचारिक और धार्मिक विमर्श में बदल दिया है।
अलंकार अग्निहोत्री, जिन्होंने प्रतिष्ठित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की थी, ने अपने सात पन्नों के त्यागपत्र में बेहद तीखे और भावनात्मक शब्दों का प्रयोग किया है। उन्होंने राज्यपाल को संबोधित करते हुए सीधे तौर पर आरोप लगाया कि प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के पावन स्नान के दौरान ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य और उनके शिष्यों के साथ स्थानीय प्रशासन ने न केवल अभद्रता की, बल्कि उनके साथ मारपीट भी की गई। अग्निहोत्री ने पत्र में उल्लेख किया है कि वृद्ध आचार्यों और बटुक ब्राह्मणों को जमीन पर गिराकर उनकी शिखा पकड़कर घसीटा गया, जो सनातन धर्म और ब्राह्मण समाज के गौरव का अपमान है। स्वयं ब्राह्मण वर्ग से आने के कारण अलंकार अग्निहोत्री ने इस घटना को अपनी आत्मा को कंपा देने वाला बताया और सरकार की विचारधारा को ब्राह्मण विरोधी करार दिया।
इस्तीफे के बाद अलंकार अग्निहोत्री और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच हुई फोन पर बातचीत का वीडियो इस समय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वीडियो में माघ मेले के अपने शिविर से बात करते हुए शंकराचार्य ने अग्निहोत्री के साहस की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि उनके मन में दो तरह की प्रतिक्रियाएं हैं; पहली दुख की कि एक मेधावी युवा ने कठिन परिश्रम से प्राप्त पद खो दिया, और दूसरी हर्ष की कि एक अधिकारी ने अपने धर्म और समाज के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन किया। शंकराचार्य ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि जो पद सरकार ने उनसे छीन लिया है या जिसे उन्होंने त्याग दिया है, वह उन्हें धर्म के क्षेत्र में उससे भी ऊंचा पद देने का प्रस्ताव करते हैं। उन्होंने समाज की ओर से अग्निहोत्री का अभिनंदन किया, जिसके जवाब में अधिकारी ने जल्द ही उनका आशीर्वाद लेने और मिलने की बात कही है।
अलंकार अग्निहोत्री का विरोध केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यूजीसी (UGC) के वर्ष 2026 के नए नियमों और विधेयकों को ‘काला कानून’ बताते हुए उनके विरोध में मोर्चा खोल दिया। सोशल मीडिया पर उनकी एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें वह पोस्टर लेकर खड़े हैं और यूजीसी नियमों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। अग्निहोत्री का तर्क है कि ये नियम सामान्य वर्ग और शैक्षणिक स्वायत्तता के खिलाफ हैं। इसके साथ ही उन्होंने प्रदेश में कथित रूप से चल रहे ‘ब्राह्मण विरोधी अभियान’ का जिक्र करते हुए जेल में एक ब्राह्मण की पिटाई से हुई मृत्यु का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि वर्तमान शासन में लोकतंत्र के स्थान पर ‘भ्रमतंत्र’ हावी हो गया है और वह ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनकर नहीं रह सकते जो उनके संस्कारों और धार्मिक मूल्यों के विपरीत कार्य करती हो।
इस्तीफे के बाद का घटनाक्रम और भी नाटकीय रहा। सोमवार शाम जब अलंकार अग्निहोत्री बरेली के जिलाधिकारी (डीएम) आवास पर पहुंचे, तो वहां से बाहर आने के बाद उन्होंने जिला प्रशासन पर बंधक बनाने का संगीन आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें डीएम आवास में करीब 45 मिनट तक अवैध तरीके से रोककर रखा गया और उनके खिलाफ षड्यंत्र रचा गया। उन्होंने यह भी बताया कि लखनऊ से आए किसी कॉल के दौरान डीएम के फोन का स्पीकर ऑन था, जिसमें उच्चाधिकारियों द्वारा उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग किया जा रहा था। हालांकि, जिला प्रशासन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। एडीएम प्रशासन के अनुसार, अग्निहोत्री स्वयं चर्चा के लिए आए थे और उन्हें सम्मानपूर्वक कॉफी पिलाई गई थी। प्रशासन का कहना है कि उन्हें केवल अवकाश लेने की सलाह दी गई थी और बंधक जैसी कोई बात नहीं थी।
फिलहाल, उत्तर प्रदेश सरकार ने अनुशासनहीनता और सरकारी मर्यादाओं के उल्लंघन के आरोप में अलंकार अग्निहोत्री को निलंबित कर दिया है। उन्हें जांच पूरी होने तक शामली कलेक्टर कार्यालय से संबद्ध किया गया है और बरेली के मंडलायुक्त को इस पूरे मामले की गहन जांच करने के आदेश दिए गए हैं। एक ओर जहां कर्मचारी संगठन और कुछ राजनीतिक दल अग्निहोत्री के समर्थन में लामबंद हो रहे हैं, वहीं भाजपा के कई नेताओं ने इसे राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित कदम बताया है। यह मामला अब केवल एक इस्तीफा भर नहीं रह गया है, बल्कि आगामी समय में यह उत्तर प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही के बीच बढ़ते तनाव का प्रतीक बन सकता है।