कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, जयराम रमेश बोले– यह शासन और कानून दोनों का मजाक
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े एक अहम मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने अदालत में एक याचिका दाखिल कर कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी (Ex-Post Facto Environmental Clearance) को चुनौती दी है। रमेश का कहना है कि किसी परियोजना को काम शुरू होने या पूरा होने के बाद दी गई पर्यावरणीय मंजूरी न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि यह शासन व्यवस्था और पर्यावरणीय न्याय की मूल भावना का भी मजाक उड़ाती है।
यह याचिका ऐसे समय में दाखिल की गई है, जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई मामलों में सख्त रुख अपनाता नजर आ रहा है। हाल के महीनों में अरावली क्षेत्र को लेकर अदालत के फैसलों ने पर्यावरणीय बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
क्या है कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी?
कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी का मतलब होता है किसी परियोजना को काम शुरू होने या पूरा होने के बाद पर्यावरणीय स्वीकृति देना। आमतौर पर पर्यावरणीय कानूनों के तहत किसी भी औद्योगिक, खनन या आधारभूत ढांचा परियोजना को शुरू करने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और मंजूरी लेना अनिवार्य होता है।
आलोचकों का कहना है कि कार्योत्तर मंजूरी से परियोजना संचालकों को नियमों का उल्लंघन करने की छूट मिल जाती है और बाद में औपचारिकताओं को पूरा कर लिया जाता है।
जयराम रमेश ने क्या कहा?
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे को लेकर याचिका दाखिल की है। उन्होंने लिखा—
“अरावली को फिर से परिभाषित करने के पहले के फैसले पर 29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा से उत्साहित होकर, मैंने कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।”
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ऐसी मंजूरियां कानून की नजर में गलत, सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक और शासन प्रणाली को कमजोर करने वाली हैं।
‘कानून की बुनियाद के खिलाफ’
पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि काम होने के बाद दी जाने वाली मंजूरी न्यायशास्त्र की बुनियाद के ही खिलाफ है। उनके मुताबिक—
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पर्यावरणीय मंजूरी का उद्देश्य संभावित नुकसान को पहले से रोकना होता है
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कार्योत्तर मंजूरी इस उद्देश्य को पूरी तरह निष्प्रभावी बना देती है
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इससे जानबूझकर नियम तोड़ने वालों को आसानी से बच निकलने का मौका मिलता है
उन्होंने यह भी कहा कि कानून की जानकारी न होना, कानून तोड़ने का बहाना नहीं हो सकता।
अरावली मामले से जुड़ा संदर्भ
जयराम रमेश ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों का भी जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि 29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र को लेकर अपने 20 नवंबर के फैसले की समीक्षा करने का निर्णय लिया था। इस फैसले को रमेश ने “बेहद जरूरी और स्वागत योग्य” बताया।
इसके अलावा उन्होंने 18 नवंबर के उस आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 16 मई के अपने पहले के फैसले की समीक्षा का रास्ता खोला था। उस फैसले में अदालत ने कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी पर रोक लगाने की बात कही थी।
‘पिछली तारीख से मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए’
जयराम रमेश ने कहा कि पिछली तारीख से किसी भी तरह की पर्यावरणीय मंजूरी देना न केवल अवैध है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण कानूनों की आत्मा के खिलाफ भी है। उन्होंने जोर देकर कहा—
“ऐसी मंजूरियां शासन का मजाक उड़ाती हैं। पिछली तारीख से मंजूरी कभी नहीं दी जानी चाहिए।”
उनका मानना है कि अगर इस तरह की मंजूरियों को कानूनी मान्यता दी गई, तो इससे भविष्य में बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय उल्लंघनों को बढ़ावा मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग?
याचिका के जरिए जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि:
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कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी को पूरी तरह अवैध घोषित किया जाए
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केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों को ऐसी मंजूरी देने से रोका जाए
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पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए
उन्होंने यह भी आग्रह किया कि पर्यावरणीय मामलों में एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle) और सतत विकास (Sustainable Development) की भावना को प्राथमिकता दी जाए।
राजनीतिक और कानूनी मायने
इस याचिका के राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़े मायने हैं। विपक्ष लंबे समय से केंद्र सरकार पर पर्यावरणीय नियमों को कमजोर करने का आरोप लगाता रहा है। वहीं सरकार का पक्ष यह रहा है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट जयराम रमेश की याचिका को स्वीकार करता है, तो इससे कई लंबित और स्वीकृत परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है।
पर्यावरण संगठनों की प्रतिक्रिया
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई संगठनों और कार्यकर्ताओं ने जयराम रमेश के कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि:
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कार्योत्तर मंजूरी से पर्यावरणीय नुकसान पहले हो जाता है
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बाद में दी गई मंजूरी केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है
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इससे स्थानीय समुदायों और जैव विविधता को गंभीर खतरा होता है
आगे क्या?
अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह इस याचिका पर क्या रुख अपनाता है। यदि अदालत इस मुद्दे पर सख्त आदेश देती है, तो यह भारत की पर्यावरण नीति और परियोजना स्वीकृति प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
जयराम रमेश की इस पहल को पर्यावरणीय शासन में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
निष्कर्ष
कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के जरिए जयराम रमेश ने पर्यावरण संरक्षण और कानून के शासन पर एक गंभीर सवाल खड़ा किया है। यह मामला न केवल कानूनी बहस तक सीमित रहेगा, बल्कि आने वाले समय में विकास बनाम पर्यावरण की बहस को भी नई दिशा दे सकता है।