ईरान संकट: अधर में 2000 कश्मीरी छात्रों का भविष्य, महबूबा मुफ्ती और छात्र संघ ने की तत्काल एयरलिफ्ट की मांग
श्रीनगर/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और ईरान के भीतर बढ़ती अस्थिरता ने वहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हजारों भारतीय छात्रों, विशेषकर कश्मीरी छात्रों के जीवन पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं। ईरान में जारी व्यापक विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच भारतीय दूतावास द्वारा जारी की गई ‘एडवाइजरी’ ने छात्रों और उनके परिजनों के बीच भारी घबराहट पैदा कर दी है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (जेकेएसए) ने केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप कर यूक्रेन और सूडान की तर्ज पर एक संगठित निकासी अभियान चलाने की अपील की है।
मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के विभिन्न शहरों में लगभग 2000 कश्मीरी छात्र चिकित्सा (मेडिकल) और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई कर रहे हैं। संचार व्यवस्था ठप होने और इंटरनेट पर लगे प्रतिबंधों के कारण इन छात्रों का अपने परिवारों से संपर्क टूट गया है, जिससे कश्मीर घाटी में अभिभावकों की रातों की नींद उड़ गई है।
महबूबा मुफ्ती की केंद्र से अपील: ‘अकेला न छोड़े जाएं हमारे बच्चे’
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इस मानवीय संकट पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्रालय को टैग कर एक सोशल मीडिया पोस्ट साझा की है। उन्होंने कहा कि कश्मीर समेत देशभर के हजारों छात्र मौजूदा अस्थिर हालात के बीच ईरान में फंसे हुए हैं, जिससे गहरा भय और चिंता का माहौल व्याप्त है।
महबूबा मुफ्ती ने गुरुवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि अभिभावकों में भारी बेचैनी है क्योंकि वहां की स्थिति सामान्य नहीं दिख रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि वह कश्मीरी और अन्य भारतीय छात्रों की सुरक्षित घर वापसी के लिए कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि छात्रों के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे युद्ध जैसी स्थिति या आंतरिक विद्रोह के माहौल में खुद अपने स्तर पर अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का प्रबंध कर सकें।
जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने जताई सुरक्षा पर चिंता: निकासी योजना की मांग
जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (जेकेएसए) ने ईरान में फंसे छात्रों की सुरक्षा को लेकर एक विस्तृत बयान जारी किया है। एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुएहामी ने कहा कि तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने 14 जनवरी 2026 को जो ताजा सलाह जारी की है, उसने छात्रों के बीच अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया है। दूतावास ने भारतीय नागरिकों को ‘स्व-व्यवस्थित’ (Self-arranged) तरीके से ईरान छोड़ने की सलाह दी है, लेकिन छात्रों के लिए यह व्यावहारिक रूप से असंभव है।
जेकेएसए का तर्क है कि अशांत माहौल में जब उड़ानें रद्द हो रही हैं और सड़कों पर आवाजाही असुरक्षित है, तब छात्रों से खुद निकासी की व्यवस्था करने की उम्मीद करना उचित नहीं है। एसोसिएशन ने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से अपील की है कि वे ईरान सरकार के साथ समन्वय कर एक ‘सुरक्षित पारगमन मार्ग’ (Safe Transit Route) और एक स्पष्ट ‘निकासी ढांचा’ तैयार करें। उन्होंने सरकार से मांग की है कि जिस तरह ‘ऑपरेशन गंगा’ के तहत यूक्रेन से छात्रों को निकाला गया था, उसी तरह की सक्रियता यहाँ भी दिखाई जानी चाहिए।
संचार ब्लैकआउट और अभिभावकों की बढ़ती बेचैनी
ईरान में चल रही अशांति का सबसे बुरा असर संचार सेवाओं पर पड़ा है। वहां इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय कॉलिंग सुविधाओं में बार-बार आ रहे व्यवधानों के कारण छात्र अपने परिवारों को अपनी खैरियत की जानकारी नहीं दे पा रहे हैं। श्रीनगर के एक अभिभावक, सैयद मुजामिल कादरी ने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि वे पिछले कई दिनों से अपने बच्चे से ठीक से बात नहीं कर पाए हैं।
कादरी ने कहा, “हम विदेश मंत्री की क्षमता और उनकी निष्ठा पर पूरा भरोसा रखते हैं, लेकिन एक पिता होने के नाते मेरा हृदय बैठा जा रहा है। हमारे बच्चे वहां विदेशी धरती पर अकेले हैं। हम भारत सरकार से विनम्र अनुरोध करते हैं कि वह उन्हें इस मुश्किल घड़ी में अकेला न छोड़े।” अन्य परिवारों ने भी बताया कि संचार के अभाव में उनके बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है और वे अपने भविष्य तथा सुरक्षा को लेकर अत्यधिक अनिश्चित हैं।
दूतावास की एडवाइजरी: ‘जल्द से जल्द देश छोड़ें भारतीय नागरिक’
तेहरान स्थित भारतीय दूतावास द्वारा 14 जनवरी 2026 को जारी की गई आधिकारिक सलाह में सभी भारतीय नागरिकों, जिनमें छात्र, तीर्थयात्री, व्यवसायी और पर्यटक शामिल हैं, को उपलब्ध परिवहन साधनों का उपयोग कर जल्द से जल्द ईरान छोड़ने को कहा गया है। हालांकि, यह एडवाइजरी अनिवार्य निकासी (Evacuation) के बजाय एक सुझाव की तरह है, जिसने छात्रों के बीच संशय की स्थिति पैदा कर दी है।
छात्रों का कहना है कि हवाई टिकटों की कीमतें आसमान छू रही हैं और कई एयरलाइंस ने अपनी सेवाएं निलंबित कर दी हैं। ऐसे में बिना सरकारी सहायता या विशेष चार्टर्ड विमानों के भारत लौटना आर्थिक और भौतिक रूप से उनके बस से बाहर है। दूतावास ने आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर तो जारी किए हैं, लेकिन छात्र संघों का कहना है कि जब तक जमीनी स्तर पर निकासी का काम शुरू नहीं होता, तब तक ये नंबर केवल कागजी आश्वासन बनकर रह जाएंगे।
निष्कर्ष: त्वरित कूटनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता
ईरान में फंसे इन 2000 कश्मीरी छात्रों का मामला अब केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि एक बड़े मानवीय संकट का रूप ले रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार को ईरानी अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय वार्ता कर भारतीय छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। एसोसिएशन ने एक ‘समर्पित आपातकालीन हेल्पलाइन’ और सुरक्षित पारगमन मार्गों की स्थापना की मांग की है ताकि छात्र सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से अपने वतन लौट सकें।
आने वाले दिन इन छात्रों के भविष्य के लिए निर्णायक होंगे। क्या केंद्र सरकार एक संगठित मिशन के तहत इन छात्रों को एयरलिफ्ट करेगी, या छात्र स्वयं ही इस संकट से पार पाने के लिए संघर्ष करेंगे, यह विदेश मंत्रालय के अगले कदमों पर निर्भर करेगा।