• January 19, 2026

मुंबई बीएमसी में ‘होटल पॉलिटिक्स’: संजय राउत का बड़ा दावा— “एकनाथ शिंदे भी नहीं चाहते मुंबई में भाजपा का मेयर”

मुंबई: बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव के नतीजों के बाद मुंबई की राजनीति किसी हाई-वोल्टेज थ्रिलर फिल्म की तरह मोड़ ले रही है। मेयर पद की कुर्सी को लेकर महायुति गठबंधन में छिड़ी रार अब और गहरा गई है। एक तरफ जहां उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने 29 पार्षदों को ताज होटल में “सुरक्षित” कर दिया है, वहीं दूसरी ओर शिवसेना (यूबीटी) के फायरब्रांड नेता संजय राउत ने एक सनसनीखेज दावा कर राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। राउत ने कहा है कि न केवल शिंदे गुट के कई पार्षद उनके संपर्क में हैं, बल्कि खुद एकनाथ शिंदे भी मन ही मन यह नहीं चाहते कि मुंबई की प्रतिष्ठित मेयर की कुर्सी पर भारतीय जनता पार्टी का कोई व्यक्ति बैठे।

संजय राउत के इस बयान ने उस समय हलचल बढ़ाई है जब भाजपा और शिंदे सेना के बीच ‘ढाई-ढाई साल’ के फार्मूले पर खींचतान जारी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भले ही सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहे हों, लेकिन पार्षदों की “किलेबंदी” और विपक्षी खेमे की सक्रियता कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मुंबई की सत्ता का यह संग्राम अब केवल आंकड़ों का खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह मनोवैज्ञानिक युद्ध और ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ के चरम पर पहुँच गया है।

“ताज होटल जाएंगे हम”: संजय राउत की खुली चुनौती

मीडिया से मुखातिब होते हुए संजय राउत ने एकनाथ शिंदे द्वारा अपने पार्षदों को होटल में ठहराने के फैसले पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक स्थिति बताया। राउत ने कहा, “एकनाथ शिंदे के पार्षदों को जिस तरह से होटल में बंदी बनाकर रखा गया है, वह सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था का सवाल है। क्या उन पार्षदों को अपनी ही सरकार में अपहरण का डर है? या उन्हें डर है कि उन्हें तोड़ लिया जाएगा? किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को इस तरह कैद करना उनके अधिकारों का हनन है।”

राउत ने आगे कहा कि शिंदे ने अपने 29 पार्षदों को ताज होटल में भारी पुलिस पहरे के बीच रखा है, जो यह दर्शाता है कि गठबंधन के भीतर अविश्वास की खाई कितनी गहरी हो चुकी है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा, “हमें और हमारे दोस्तों को ताज होटल जाना है। हम वहां जाएंगे और हो सकता है कि वहां जाने से कुछ गड़बड़ हो, लेकिन फिर भी हम वहां जाने से पीछे नहीं हटेंगे।” राउत का यह बयान सीधे तौर पर शिंदे गुट के पार्षदों में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिससे महायुति के खेमे में बेचैनी बढ़ गई है।

शिंदे की “अंदरूनी इच्छा” पर सवाल और भाजपा की घेराबंदी

संजय राउत ने अपने बयान में सबसे विवादित दावा यह किया कि एकनाथ शिंदे खुद भाजपा का मेयर बनने के पक्ष में नहीं हैं। राउत के अनुसार, भले ही गठबंधन धर्म निभाने के लिए शिंदे ऊपरी तौर पर भाजपा के साथ खड़े दिख रहे हों, लेकिन मुंबई की राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वे भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व से डरे हुए हैं। राउत ने सवाल किया, “आखिर कौन चाहता है कि मुंबई में भाजपा का मेयर बने? खुद एकनाथ शिंदे भी ऐसा नहीं चाहते। उन्हें पता है कि अगर मुंबई की सत्ता भाजपा के पूर्ण नियंत्रण में चली गई, तो उनकी अपनी पार्टी की प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी।”

शिवसेना (यूबीटी) नेता ने यह भी दावा किया कि शिंदे गुट के कई पार्षद उनके संपर्क में हैं और वे भाजपा के साथ जाने को लेकर सहज नहीं हैं। राउत का तर्क है कि शिवसेना की मूल विचारधारा से जुड़े लोग कभी नहीं चाहेंगे कि मुंबई महानगरपालिका पर ‘कमल’ का पूरी तरह से कब्जा हो। इस दावे ने भाजपा के उन रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है जो 89 सीटों के साथ अपनी जीत को सुनिश्चित मान रहे थे। अब भाजपा को न केवल विपक्ष से, बल्कि अपने ही सहयोगी दल के भीतर चल रही इस कथित “अंदरूनी छटपटाहट” से भी निपटना होगा।

होटल पॉलिटिक्स और पार्षदों की सुरक्षा का पेचीदा मामला

मुंबई के ताज होटल में चल रही इस ‘होटल पॉलिटिक्स’ ने 2019 के उस घटनाक्रम की याद ताजा कर दी है, जब महाराष्ट्र की सत्ता के लिए इसी तरह की घेराबंदी की गई थी। एकनाथ शिंदे का अपने पार्षदों को होटल में शिफ्ट करना दोहरे अर्थों में देखा जा रहा है। पहला, वे भाजपा पर ‘ढाई-ढाई साल’ के मेयर पद के फार्मूले को स्वीकार करने का दबाव बनाना चाहते हैं। दूसरा, उन्हें डर है कि शिवसेना (यूबीटी) या कांग्रेस उनके पार्षदों को “नैतिकता” या “पुरानी निष्ठा” के नाम पर तोड़ सकती है।

संजय राउत ने इसी बिंदु पर प्रहार करते हुए कहा कि शिंदे को अपने पार्षदों को तुरंत रिहा करना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिस सरकार के पास बहुमत का आंकड़ा होने का दावा है, उसे अपने ही लोगों को कैद करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? ताज होटल के बाहर पुलिस का कड़ा पहरा और अंदर चल रही बैठकों ने यह साफ कर दिया है कि बीएमसी का मेयर चुनना इतना आसान नहीं होने वाला है। थोड़ा सा भी दलबदल या क्रॉस-वोटिंग भाजपा के 89 और शिंदे के 29 पार्षदों के कमजोर बहुमत (118) को खतरे में डाल सकता है।

उद्धव ठाकरे का ‘ईश्वरीय कृपा’ वाला दांव और बीएमसी का भविष्य

संजय राउत के इन तीखे हमलों से पहले उद्धव ठाकरे ने यह कहकर माहौल गरमाया था कि “अगर भगवान की कृपा हुई तो मुंबई का मेयर शिवसेना (यूबीटी) का ही होगा।” उद्धव के इस बयान को पहले एक भावनात्मक टिप्पणी माना गया था, लेकिन राउत के ताजा दावों के बाद इसे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। यूबीटी खेमे को उम्मीद है कि महायुति के भीतर मेयर पद की यह लड़ाई इतनी बढ़ जाएगी कि गठबंधन टूट सकता है या शिंदे गुट में फिर से फूट पड़ सकती है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और शिवसेना (यूबीटी) के रणनीतिकारों के बीच लगातार बैठकों का दौर जारी है। उनका गणित सीधा है—अगर शिंदे गुट का एक छोटा हिस्सा भी नाराज होकर अलग होता है या वोटिंग से अनुपस्थित रहता है, तो भाजपा का बहुमत गिर जाएगा। ऐसे में विपक्षी गठबंधन ‘महाविकास अघाड़ी’ अपनी संभावनाएं तलाश सकता है। संजय राउत का ताज होटल जाने का बयान इसी “ऑपरेशन” का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य शिंदे गुट के भीतर असंतोष को हवा देना है।

निष्कर्ष: मुंबई की सत्ता का सस्पेंस अभी बाकी है

फिलहाल मुंबई की राजनीति एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ हर पल समीकरण बदल रहे हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यह भरोसा दिला रहे हैं कि महायुति एकजुट है और मेयर पद का फैसला जल्द ही आपसी सहमति से हो जाएगा। दूसरी तरफ, ताज होटल की घेराबंदी और संजय राउत के “संपर्क” वाले दावों ने इस एकता पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

क्या एकनाथ शिंदे अपने पार्षदों को एकजुट रख पाएंगे? क्या भाजपा छोटे भाई की भूमिका निभा रहे शिंदे की ‘ढाई साल’ की मांग के आगे झुकेगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या संजय राउत वाकई ताज होटल पहुँचकर कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर पाएंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले कुछ दिनों में बीएमसी के विशेष सदन में ही मिलेंगे। लेकिन एक बात साफ है, बीएमसी की सत्ता की इस लड़ाई ने महाराष्ट्र की राजनीति में ‘अपनों’ और ‘परायणों’ के बीच की लकीर को बहुत धुंधला कर दिया है।

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