• January 19, 2026

बीएमसी में भगवा क्रांति: ‘धुरंधर देवेंद्र’ के नेतृत्व में भाजपा ने रचा इतिहास, ठाकरे परिवार का तीन दशकों का दबदबा समाप्त

मुंबई: देश की सबसे अमीर महानगरपालिका, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव परिणामों ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत कर दी है। दशकों से जिस मुंबई की सत्ता पर ठाकरे परिवार और शिवसेना का अटूट नियंत्रण माना जाता था, वहां अब भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ताकत का लोहा मनवाते हुए सबसे बड़ी पार्टी के रूप में खुद को स्थापित कर लिया है। चुनाव नतीजों के स्पष्ट होते ही मुंबई की सड़कों पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की तस्वीरों वाले ‘धुरंधर देवेंद्र’ के पोस्टर दिखाई देने लगे हैं। यह न केवल भाजपा की जीत का जश्न है, बल्कि इस बात का उद्घोष भी है कि मुंबई का नया राजनीतिक केंद्र अब फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा बन चुकी है।

भाजपा का 45 साल पुराना सपना और फडणवीस का नेतृत्व

भारतीय जनता पार्टी के लिए यह जीत महज एक चुनावी सफलता नहीं है, बल्कि यह उस 45 साल पुराने सपने का पूरा होना है, जिसके तहत पार्टी बीएमसी में अपना महापौर (मेयर) देखना चाहती थी। 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद से ही मुंबई नगर निगम को जीतना पार्टी का बड़ा लक्ष्य रहा है। इस बार 227 वार्डों वाली बीएमसी में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 89 सीटें जीती हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस पूरे चुनाव अभियान का नेतृत्व किया और उनकी रणनीति ने पार्टी को उस मुकाम पर पहुँचा दिया जहां वह अकेले दम पर सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी है। मुंबई भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष तजिंदर सिंह तिवाना, जो स्वयं भी नगरसेवक चुने गए हैं, द्वारा लगाए गए ‘धुरंधर देवेंद्र’ के पोस्टर इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस जीत का सारा श्रेय कार्यकर्ताओं ने फडणवीस की दूरगामी सोच और संगठनात्मक क्षमता को दिया है।

ठाकरे परिवार के राजनीतिक साम्राज्य का पतन

मुंबई की राजनीति में बीते करीब तीन दशकों से मातोश्री और ठाकरे परिवार का सिक्का चलता था। नगर निगम की सत्ता उनके हाथ में होने का मतलब था कि मुंबई की धड़कन पर उनका नियंत्रण था। हालांकि, इस चुनाव ने समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। शिवसेना में हुए विभाजन के बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) केवल 65 सीटों पर सिमट कर रह गई है, जिससे वह सदन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। वहीं, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 29 सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिंदुत्व के मुद्दे और विकास की राजनीति के बीच मुंबई के मतदाताओं ने भाजपा के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे पर अधिक भरोसा जताया है।

विपक्षी दलों की स्थिति और सीटों का गणित

बीएमसी चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। कांग्रेस पार्टी को मात्र 24 सीटों पर संतोष करना पड़ा है, जो कभी मुंबई में एक बड़ी ताकत हुआ करती थी। वहीं, राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) केवल 6 सीटें ही जीत सकी है। हैदराबाद स्थित असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएमआईएम ने 8 सीटें जीतकर मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पैठ बनाई है। शरद पवार और अजित पवार के नेतृत्व वाले राकांपा के दोनों गुटों का प्रदर्शन मुंबई में निराशाजनक रहा है, जहाँ उन्हें कुल मिलाकर मात्र 4 सीटें ही प्राप्त हुई हैं। इन नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि मुंबई की जनता ने खंडित जनादेश के बजाय एक मजबूत नेतृत्व को प्राथमिकता दी है।

महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं में भाजपा का परचम

बीएमसी की जीत केवल एक शुरुआत थी, क्योंकि राज्य भर की 29 महानगरपालिकाओं में भाजपा ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। कुल 2,869 सीटों के लिए हुए मतदान में भाजपा ने अकेले 1,441 सीटें जीतकर पूरे राज्य में अपनी बादशाहत कायम की है। मुंबई के अलावा ठाणे, नवी मुंबई, पुणे, पनवेल और नासिक जैसे महत्वपूर्ण शहरों में भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने अपना परचम लहराया है। सबसे चौंकाने वाले परिणाम पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ से आए हैं, जिन्हें पवार परिवार का गढ़ माना जाता था। यहाँ भाजपा ने शरद पवार और अजित पवार की संयुक्त शक्ति को मात देते हुए जीत हासिल की है। राज्य की लगभग 25 महानगरपालिकाओं में अब भाजपा या तो अकेले या अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता पर काबिज होने जा रही है।

एकनाथ शिंदे और गठबंधन की भूमिका

राज्य स्तर पर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शिंदे गुट ने कुल 405 सीटों पर जीत दर्ज की है, जो उन्हें राज्य की राजनीति में एक प्रासंगिक खिलाड़ी बनाए रखती है। भाजपा और शिंदे सेना का गठबंधन अधिकांश शहरों में सफल रहा है, जिससे यह संदेश गया है कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत और भाजपा की विकासवादी राजनीति का संगम मतदाताओं को आकर्षित कर रहा है। इसके विपरीत, उद्धव ठाकरे के गुट को राज्य स्तर पर बड़ा झटका लगा है, क्योंकि उनकी सीटों की संख्या मात्र 15 तक सीमित रह गई है। यह उनके नेतृत्व और पार्टी की पकड़ पर बड़े सवाल खड़े करता है।

कांग्रेस की साख बचाने वाले कुछ चुनिंदा शहर

जहाँ एक ओर भाजपा की आंधी ने पूरे महाराष्ट्र को अपनी चपेट में ले लिया, वहीं कांग्रेस पार्टी के लिए कुछ शहरों ने संजीवनी का काम किया है। लातूर, चंद्रपुर और भिवंडी-निजामपुर में कांग्रेस अपनी साख बचाने में सफल रही है। लातूर में पार्टी ने 70 में से 43 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जो पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के परिवार के दबदबे को दर्शाता है। भिवंडी-निजामपुर में भी कांग्रेस 30 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इन क्षेत्रों में स्थानीय नेतृत्व और परंपरागत वोट बैंक ने कांग्रेस को पूरी तरह साफ होने से बचा लिया है।

मालेगांव में छोटे दलों का प्रभाव

मालेगांव नगर निगम के नतीजे राज्य की मुख्यधारा की राजनीति से थोड़े अलग रहे हैं। यहाँ ‘इंडियन सेकुलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र पार्टी’ ने 84 में से 35 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। एआईएमआईएम यहाँ 21 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही है। यह दर्शाता है कि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में धार्मिक और स्थानीय मुद्दे अब भी राष्ट्रीय दलों की तुलना में अधिक प्रभावी हैं। यहाँ भाजपा और शिवसेना जैसे बड़े दलों का प्रभाव कम नजर आया है।

भविष्य की राजनीति और मुंबई का नया मेयर

बीएमसी के नतीजों के बाद अब सबकी नजरें मेयर पद के चुनाव पर टिकी हैं। चूंकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए पहली बार भगवा दल का मेयर बीएमसी के मुख्यालय पर बैठेगा। यह न केवल प्रशासनिक बदलाव होगा, बल्कि मुंबई के विकास के रोडमैप में भी एक बड़ा मोड़ साबित होगा। देवेंद्र फडणवीस ने इस जीत के साथ यह साबित कर दिया है कि वे महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। विपक्ष के लिए ये नतीजे आत्ममंथन का विषय हैं, क्योंकि जिस तरह से भाजपा ने शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत की है, उसने आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी एक मजबूत नींव रख दी है। मुंबई की राजनीति अब ‘मातोश्री’ से निकलकर सीधे जनता और विकास के एजेंडे पर केंद्रित होती दिख रही है।

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