तेलंगाना फोन टैपिंग कांड: एसआईटी के चक्रव्यूह में घिरे केसीआर, घंटों चली पूछताछ के बीच बीआरएस का राज्यव्यापी संग्राम
हैदराबाद: तेलंगाना की राजनीति में उस वक्त जबरदस्त उबाल आ गया जब भारत राष्ट्र समिति (BRS) के सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (KCR) बहुचर्चित फोन टैपिंग मामले में विशेष जांच दल (SIT) के समक्ष पेश हुए। यह घटनाक्रम न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसने राज्य की राजनीतिक फिजां को भी पूरी तरह गर्मा दिया है। पिछले कई महीनों से चल रही इस जांच के घेरे में अब सीधे तौर पर बीआरएस का शीर्ष नेतृत्व आ गया है। रविवार दोपहर जब केसीआर पूछताछ के लिए पहुंचे, तो पूरे हैदराबाद में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी गई थी और उनके आवास से लेकर एसआईटी कार्यालय तक का इलाका छावनी में तब्दील नजर आया।
इस हाई-प्रोफाइल मामले की जड़ें पूर्ववर्ती बीआरएस सरकार के कार्यकाल से जुड़ी हुई हैं। आरोप है कि सत्ता में रहते हुए शासन ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, प्रमुख मीडिया घरानों, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों और प्रभावशाली राजनेताओं की अवैध तरीके से निगरानी करवाई। इस पूरे प्रकरण का खुलासा तब हुआ जब पूर्व डीसीपी पी. राधाकृष्ण राव ने फोन टैपिंग के गंभीर आरोप लगाए। जांच के दौरान यह बात सामने आई कि अत्याधुनिक सर्विलांस उपकरणों का दुरुपयोग कर उन लोगों के निजी संवाद सुने गए, जो तत्कालीन सरकार की नीतियों के आलोचक थे या विपक्ष में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। एसआईटी ने इन दावों की पुष्टि के लिए तकनीकी साक्ष्यों को खंगालना शुरू किया, जिसके बाद जांच की आंच केसीआर के परिवार तक पहुंच गई।
केसीआर से पहले इस मामले में उनके बेटे और पूर्व मंत्री केटी रामाराव (KTR) के साथ-साथ उनके भतीजे और पूर्व वित्त मंत्री टी. हरीश राव से भी लंबी पूछताछ की जा चुकी है। जांच एजेंसी का मानना है कि इतनी बड़ी निगरानी प्रक्रिया बिना किसी शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी के संभव नहीं थी। अधिकारियों का कहना है कि वे उन कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं जो यह साबित कर सकें कि इस अवैध डेटा संग्रह के पीछे असल मास्टरमाइंड कौन था। तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर यह भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या टैप किए गए डेटा का इस्तेमाल राजनीतिक ब्लैकमेलिंग या चुनावी लाभ के लिए किया गया था।
रविवार की पूछताछ से पहले एक दिलचस्प कानूनी और कूटनीतिक ड्रामा भी देखने को मिला। एसआईटी ने जब 30 जनवरी को केसीआर को नया नोटिस जारी किया, तो पूर्व मुख्यमंत्री ने तुरंत इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने जांच अधिकारी को एक विस्तृत पत्र लिखकर इस नोटिस की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए। केसीआर ने तर्क दिया कि उन्हें दिया गया नोटिस कानूनी प्रक्रिया के मापदंडों के अनुरूप नहीं है और यह उनकी व्यक्तिगत गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। उन्होंने इसे एक ‘अवैध’ दस्तावेज करार दिया। हालांकि, तीखी असहमति के बावजूद उन्होंने एक जिम्मेदार नागरिक और कानून का पालन करने वाले राजनेता की छवि पेश करते हुए जांच में सहयोग करने का फैसला किया। वह अपने एर्रावली फार्महाउस से हैदराबाद स्थित अपने आवास पहुंचे और दोपहर ठीक तीन बजे तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार एसआईटी के सामने उपस्थित हुए।
जैसे ही केसीआर के पूछताछ के लिए पहुंचने की खबर फैली, बीआरएस कार्यकर्ता और समर्थक सड़कों पर उतर आए। पार्टी ने इस पूरी कार्रवाई को ‘राजनीतिक बदले की भावना’ (Political Vendetta) से प्रेरित बताया है। राज्य के विभिन्न जिलों में बीआरएस कार्यकर्ताओं ने काले बैज पहनकर विरोध प्रदर्शन किया और कांग्रेस सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। पार्टी प्रवक्ताओं का आरोप है कि वर्तमान सरकार अपनी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए केसीआर और उनके परिवार को निशाना बना रही है। हैदराबाद में केसीआर के आवास के बाहर समर्थकों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा, जिसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी। कई वरिष्ठ नेताओं को एहतियातन हिरासत में भी लिया गया।
फोन टैपिंग के ये आरोप केवल व्यक्तियों की निजता के उल्लंघन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये लोकतंत्र की शुचिता पर भी सवाल उठाते हैं। यदि यह साबित हो जाता है कि राज्य मशीनरी का उपयोग विपक्षी नेताओं की जासूसी के लिए किया गया था, तो यह भारतीय राजनीति के सबसे बड़े स्कैंडलों में से एक साबित हो सकता है। पूर्व डीसीपी के बयानों ने इस मामले में ‘सरकारी संरक्षण’ की ओर इशारा किया है, जो केसीआर के लिए बड़ी कानूनी मुश्किल खड़ी कर सकता है। एसआईटी फिलहाल उन डिजिटल फुटप्रिंट्स की तलाश कर रही है जो साबित कर सकें कि सर्विलांस का आदेश सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय या उनके करीबी सहयोगियों से आया था।
दूसरी ओर, सत्ताधारी पक्ष और जांच एजेंसियों का कहना है कि यह कार्रवाई किसी राजनीतिक द्वेष का परिणाम नहीं है, बल्कि कानून अपनी गति से काम कर रहा है। अधिकारियों का तर्क है कि जब इतने बड़े पैमाने पर अवैध निगरानी के साक्ष्य मिलते हैं, तो संबंधित विभाग के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल पूछना अनिवार्य हो जाता है। जांच का दायरा केवल फोन टैपिंग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस डेटा के विनाश (Destruction of Evidence) की कोशिशों की भी जांच की जा रही है। ऐसी खबरें आई थीं कि सरकार बदलने के तुरंत बाद कुछ हार्ड डिस्क और सर्वर को नष्ट करने का प्रयास किया गया था।
जैसे-जैसे शाम ढली, पूछताछ का दौर लंबा होता गया। हैदराबाद के राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर कयासों का दौर जारी है कि क्या एसआईटी केसीआर के जवाबों से संतुष्ट होगी या आने वाले दिनों में और भी कड़े कदम उठाए जाएंगे। इस मामले ने तेलंगाना में बीआरएस की जमीन को हिलाकर रख दिया है, क्योंकि पार्टी पहले से ही सत्ता गंवाने के बाद खुद को संगठित करने की कोशिश कर रही है। अब इस कानूनी लड़ाई ने उनके लिए एक और बड़ी चुनौती पेश कर दी है। आने वाले दिनों में तकनीकी विशेषज्ञों की रिपोर्ट और एसआईटी द्वारा जुटाए गए दस्तावेजों के आधार पर यह तय होगा कि तेलंगाना की राजनीति का यह ‘फोन टैपिंग कांड’ किस मोड़ पर जाकर थमता है। फिलहाल, सबकी नजरें जांच एजेंसी की अगली रिपोर्ट और केसीआर के अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हैं।