तमिलनाडु चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मतदाता सूची की ‘विसंगति सूची’ सार्वजनिक करने का आदेश
नई दिल्ली/चेन्नई: तमिलनाडु में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर जारी विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और गड़बड़ी के आरोपों वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग को स्पष्ट आदेश दिया है कि वह ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (तार्किक विसंगति) सूची को सार्वजनिक करे, ताकि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। यह आदेश उन हजारों मतदाताओं के लिए बड़ी राहत बनकर आया है, जिनके नाम तकनीकी कारणों या विसंगतियों के चलते सूची से बाहर होने की कगार पर थे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता पर जोर देते हुए कहा कि चुनाव आयोग को उन सभी व्यक्तियों की सूची सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करनी चाहिए जिनके नामों पर ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के तहत सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने निर्देश दिया है कि यह सूची केवल चुनाव कार्यालयों तक सीमित न रहे, बल्कि इसे ग्राम पंचायत भवनों, प्रत्येक उपखंड या तालुका कार्यालयों और शहरी क्षेत्रों के वार्ड कार्यालयों में प्रमुखता से चस्पा किया जाए। पीठ का मानना है कि स्थानीय स्तर पर सूची प्रदर्शित होने से आम नागरिकों को आसानी से यह पता चल सकेगा कि उनके नाम में क्या विसंगति है और वे उसे सुधारने के लिए समय पर कदम उठा सकेंगे।
मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत ने एक सख्त समय सीमा भी निर्धारित की है। आदेश के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम इस विसंगति सूची में शामिल हैं, उन्हें सूची प्रकाशित होने की तिथि से 10 दिनों का समय दिया जाएगा। इस अवधि के भीतर, प्रभावित मतदाता स्वयं या अपने किसी अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से आवश्यक दस्तावेज संबंधित कार्यालय में जमा कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी अनिवार्य किया है कि सूची में प्रत्येक नाम के आगे विसंगति का संक्षिप्त कारण भी दर्ज किया जाए, ताकि मतदाता को यह स्पष्ट हो सके कि उसे किस आधार पर चिह्नित किया गया है और उसे कौन से दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।
प्रशासनिक जवाबदेही तय करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि वे चुनाव आयोग के इन आदेशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करें। एसआईआर प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की तैनाती के भी निर्देश दिए गए हैं, ताकि दस्तावेजों के सत्यापन और आपत्तियों के निपटारे में किसी प्रकार की देरी न हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके साथ ही, जिला प्रशासन को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे जनता के बीच इस प्रक्रिया के बारे में जागरूकता फैलाएं।
चुनाव के दौरान और पुनरीक्षण प्रक्रिया के समय होने वाले संभावित विवादों को देखते हुए अदालत ने सुरक्षा व्यवस्था पर भी कड़े निर्देश दिए हैं। तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और पुलिस आयुक्तों को आदेश दिया गया है कि वे पूरी प्रक्रिया के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना सुनिश्चित करें। कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसमें किसी भी प्रकार के व्यवधान या हिंसा की कोई जगह नहीं है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि पुनरीक्षण केंद्रों और सरकारी कार्यालयों में शांति बनी रहे।
तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए यह फैसला अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है। 234 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में इस साल के अंत में चुनाव होने हैं और सियासी पारा अभी से चढ़ा हुआ है। वर्तमान में राज्य में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की सरकार है, जो केंद्र में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के साथ गठबंधन में है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और एआईएडीएमके इस चुनाव में सत्ता परिवर्तन की कोशिशों में जुटी हैं। ऐसे में मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का मुद्दा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने समय रहते हस्तक्षेप कर पारदर्शिता की लकीर खींच दी है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यदि विसंगति सूची को सार्वजनिक नहीं किया गया, तो बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाता अपने मताधिकार से वंचित रह सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग की वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है और कई पात्र मतदाताओं के नाम बिना उचित सूचना के काटे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में अन्य राज्यों में होने वाले मतदाता पुनरीक्षण कार्यों के लिए भी एक नजीर साबित होगा। 10 दिनों की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण अवधि के दौरान अब प्रशासन और राजनीतिक दलों, दोनों की सक्रियता बढ़ जाएगी। जहां प्रशासन को रिकॉर्ड समय में दस्तावेजों का मिलान करना होगा, वहीं राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके समर्थक सूची से बाहर न रह जाएं। अब देखना यह होगा कि चुनाव आयोग कितनी तत्परता से इन दिशा-निर्देशों को जमीन पर लागू करता है।