पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाला: मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा की करोड़ों की संपत्ति जब्त, ईडी की जांच में बड़े खुलासे
पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ वर्षों से सुर्खियों में रहे प्राथमिक शिक्षक भर्ती घोटाले (Primary Teachers Recruitment Scamm) की जांच अब सत्ता के ऊंचे गलियारों तक पहुंच चुकी है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई करते हुए वर्तमान कैबिनेट मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा पर अपना शिकंजा और कस दिया है। विधायक और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, वस्त्र एवं सुधार प्रशासन प्रभारी मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा की 3.65 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियों को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत अस्थायी रूप से जब्त कर लिया गया है। यह जब्ती 31 दिसंबर 2025 को की गई, जिसने राज्य की राजनीति में एक बार फिर हड़कंप मचा दिया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि शिक्षकों की अवैध भर्ती के माध्यम से अर्जित किए गए काले धन को सफेद करने के लिए इन संपत्तियों का निर्माण और खरीद की गई थी।
भ्रष्टाचार की कार्यप्रणाली: अयोग्य उम्मीदवारों को रेवड़ियों की तरह बांटी गईं नौकरियां
पश्चिम बंगाल में प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में जिस तरह की अनियमितताएं सामने आई हैं, वे चौंकाने वाली हैं। ईडी और सीबीआई की जांच से पता चला है कि इस घोटाले में एक सुनियोजित आपराधिक साजिश रची गई थी। योग्य और वास्तविक उम्मीदवारों, जिन्होंने वर्षों तक मेहनत की और परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन किया, उन्हें दरकिनार कर दिया गया। उनके स्थान पर उन युवाओं को सरकारी नौकरी दे दी गई जो न तो मेरिट सूची में थे और न ही निर्धारित मापदंडों पर खरे उतर रहे थे।
भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता के सिद्धांतों का पूरी तरह से उल्लंघन किया गया। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं थी, बल्कि करोड़ों रुपये कमाने का एक जरिया था। अयोग्य, गैर-सूचीबद्ध और निम्न श्रेणी के उम्मीदवारों से भारी मात्रा में रिश्वत लेकर उन्हें नियुक्ति पत्र थमा दिए गए। इस आपराधिक गठजोड़ में मंत्री, विधायक, शिक्षा विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारी और बिचौलिए शामिल थे, जिन्होंने मिलकर सरकारी खजाने और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया।
सीबीआई की एफआईआर और ईडी की धन शोधन जांच का आधार
इस घोटाले की नींव तब पड़ी जब कोलकाता उच्च न्यायालय ने प्राथमिक शिक्षक भर्ती में भारी विसंगतियों के आरोपों पर संज्ञान लिया। न्यायालय के निर्देशों के बाद, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की। इसी एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने धन शोधन (Money Laundering) के पहलू की जांच शुरू की। ईडी का मुख्य उद्देश्य उस पैसे के स्रोत और उसके निवेश का पता लगाना था जो अवैध नियुक्तियों के बदले लिया गया था। जांच में पाया गया कि इस घोटाले से प्राप्त आय का उपयोग चल-अचल संपत्तियां खरीदने, बैंक खातों में नकद जमा करने और बेनामी निवेश करने में किया गया था।
मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा के खिलाफ पुख्ता सबूत और छापेमारी
मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा के खिलाफ ईडी की कार्रवाई अचानक नहीं हुई है। इससे पहले, 22 मार्च 2024 को मंत्री के आवासीय परिसरों पर एक व्यापक तलाशी अभियान चलाया गया था। उस छापेमारी के दौरान ईडी ने 41 लाख रुपये की नकदी बरामद की थी। इसके साथ ही कई ऐसे ‘आपत्तिजनक दस्तावेज’ भी हाथ लगे थे, जो सीधे तौर पर भर्ती घोटाले में उनकी संलिप्तता की ओर इशारा करते थे।
जांच को आगे बढ़ाते हुए ईडी ने पाया कि चंद्रनाथ सिन्हा के बैंक खातों में बड़ी मात्रा में नकदी जमा की गई थी, जिसका कोई स्पष्ट और कानूनी स्रोत मंत्री नहीं बता सके। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि सिन्हा ने बोलपुर और बीरभूम के आसपास के क्षेत्रों में अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर बड़े पैमाने पर अचल संपत्तियां हासिल की थीं। ईडी ने पाया कि इन संपत्तियों की खरीद में इस्तेमाल किया गया पैसा कथित तौर पर भर्ती घोटाले की अवैध कमाई का हिस्सा था। इसी के आधार पर 6 अगस्त 2025 को उनके खिलाफ कोलकाता की विशेष पीएमएलए अदालत में छठी पूरक अभियोग शिकायत दर्ज की गई थी।
पार्थ चटर्जी और अर्पिता मुखर्जी: घोटाले का काला अध्याय
शिक्षक भर्ती घोटाले की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक इसमें पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी का जिक्र न हो। इस मामले ने तब पूरे देश का ध्यान खींचा था जब अर्पिता मुखर्जी के आवासों पर छापेमारी के दौरान नोटों के पहाड़ मिले थे। ईडी ने अर्पिता के परिसरों से कुल 49.80 करोड़ रुपये नकद और 5.08 करोड़ रुपये के सोने के आभूषण बरामद किए थे।
इस भारी बरामदगी के बाद तत्कालीन शिक्षा विभाग के प्रभारी मंत्री पार्थ चटर्जी और अर्पिता मुखर्जी सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पार्थ चटर्जी, जो कभी तृणमूल कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेताओं में गिने जाते थे, उन्हें इस घोटाले के कारण न केवल मंत्री पद गंवाना पड़ा बल्कि पार्टी से भी निलंबित कर दिया गया। इस मामले में अब तक 95 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियों के लिए छह अस्थायी कुर्की आदेश जारी किए जा चुके हैं।
जब्ती और कुर्की का बढ़ता आंकड़ा: 641 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति पर शिकंजा
पश्चिम बंगाल में केवल प्राथमिक शिक्षक भर्ती ही नहीं, बल्कि एसएससी (SSC) सहायक शिक्षक भर्ती और ग्रुप ‘सी’ व ‘डी’ स्टाफ भर्ती में भी इसी तरह के घोटाले हुए हैं। ईडी की कोलकाता इकाई ने इन सभी मामलों में अब तक की गई कार्रवाई का एक विस्तृत ब्योरा पेश किया है। प्राथमिक शिक्षक भर्ती (PTRS) मामले में वर्तमान में कुल जब्ती और कुर्की लगभग 154.91 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह संपत्ति मुख्य आरोपियों और उनसे जुड़ी फर्जी संस्थाओं के नाम पर थी।
वहीं, अगर एसएससी सहायक शिक्षक और ग्रुप ‘सी’ व ‘डी’ भर्ती घोटालों को भी जोड़ दिया जाए, तो ईडी ने इन मामलों में लगभग 486 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की हैं। सभी भर्ती घोटालों को मिलाकर अब तक ईडी द्वारा की गई कुल कुर्की और जब्ती का आंकड़ा लगभग 641 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। यह राशि दर्शाती है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार किस स्तर तक पैठ बना चुका था।
कानूनी प्रक्रिया और 54 आरोपियों पर तय हुए आरोप
भर्ती घोटाले के इस जटिल मामले में कानूनी प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ रही है। कोलकाता स्थित विशेष न्यायालय (PMLA) में इस समय पार्थ चटर्जी, अर्पिता मुखर्जी और विधायक माणिक भट्टाचार्य सहित कुल 54 व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ मुकदमा चल रहा है। न्यायालय ने इन सभी के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय कर दिए हैं।
जांच एजेंसी ने अदालत को सूचित किया है कि माणिक भट्टाचार्य, जो पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष थे, ने इस पूरी साजिश में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर ऐसे आदेश जारी किए जिससे अयोग्य उम्मीदवारों का रास्ता साफ हो सके। ईडी की चार्जशीट में साक्ष्यों की एक लंबी श्रृंखला है, जिसमें कॉल रिकॉर्ड्स, व्हाट्सएप चैट और वित्तीय लेनदेन के दस्तावेज शामिल हैं, जो यह साबित करते हैं कि किस तरह नियुक्तियों को नीलामी की वस्तु बना दिया गया था।
युवाओं के भविष्य और सामाजिक न्याय पर गहरा आघात
इस घोटाले का सबसे दुखद पहलू वह सामाजिक और मानसिक आघात है जो बंगाल के लाखों बेरोजगार युवाओं ने झेला है। हजारों अभ्यर्थी ऐसे हैं जो गरीबी और तंगहाली के बावजूद अपनी मेहनत के दम पर मेरिट सूची में स्थान पाने के हकदार थे, लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक ने उनके सपनों को चाट लिया। कोलकाता की सड़कों पर महीनों तक चले उम्मीदवारों के विरोध प्रदर्शनों ने सरकार की नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
ईडी की ताजा कार्रवाई और चंद्रनाथ सिन्हा की संपत्तियों की कुर्की यह संदेश देती है कि कानून के हाथ लंबे हैं और भ्रष्टाचार की कमाई को छिपाना आसान नहीं है। हालांकि, सवाल अब भी यही बना हुआ है कि क्या इन कुर्क की गई संपत्तियों से उन युवाओं को न्याय मिल पाएगा जिनका कीमती समय और करियर इस व्यवस्था की बलि चढ़ गया।
निष्कर्ष और भविष्य की कार्रवाई
प्रवर्तन निदेशालय ने स्पष्ट किया है कि जांच अभी भी जारी है और आने वाले समय में कुछ और बड़े नाम इस रडार पर आ सकते हैं। चंद्रनाथ सिन्हा की संपत्ति की अस्थायी कुर्की इस मामले में अंतिम कड़ी नहीं है। जैसे-जैसे मनी ट्रेल (Paisa Kahan Gaya) की कड़ियां जुड़ती जा रही हैं, नए बेनामी सौदों और फर्जी कंपनियों का पता चल रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता और न्यायपालिका की नजरें अब इस मुकदमे के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि भ्रष्टाचार के इस ‘नोटों के पहाड़’ के पीछे के असली मास्टरमाइंड को क्या सजा मिलती है।