• January 19, 2026

उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव 2026: अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद और जयंत चौधरी क्यों चाहते हैं अकेले लड़ना?

16 सितम्बर 2025 लखनऊ: उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। साल 2026 में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव का सेमी-फाइनल माना जा रहा है। इस चुनाव में बीजेपी के सहयोगी दल अपनी ताकत दिखाने के लिए अकेले उतरने का फैसला कर रहे हैं। अपना दल (एस) की प्रमुख अनुप्रिया पटेल, निषाद पार्टी के संजय निषाद और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के जयंत चौधरी ने साफ-साफ कहा है कि वे गठबंधन के बिना अपनी पार्टी के दम पर चुनाव लड़ेंगे। लेकिन इसका क्या असर पड़ेगा? क्या यह एनडीए गठबंधन के लिए मुसीबत खड़ी कर देगा? आइए, इसकी वजहों और संभावनाओं पर नजर डालते हैंपंचायत चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। ये ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर पर होते हैं, जहां गांव-गांव तक पार्टियों की पकड़ का पता चलता है। राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक, चुनाव जनवरी-फरवरी 2026 में हो सकते हैं। इसके लिए तैयारियां जोरों पर हैं। ग्राम पंचायतों का परिसीमन जुलाई-अगस्त 2025 में पूरा हो चुका है।
लेकिन सियासी दलों के बीच गठबंधन को लेकर अब घमासान मचा हुआ है। बीजेपी के छोटे सहयोगी दल, जो विधानसभा और लोकसभा में उसके साथ हैं, पंचायत स्तर पर अलग राह चुन रहे हैं।सबसे पहले बात अनुप्रिया पटेल की। अपना दल (एस) की प्रमुख और केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने मई 2025 में प्रयागराज में एक रैली के दौरान ऐलान किया कि उनकी पार्टी पंचायत चुनाव अकेले लड़ेगी। अनुप्रिया का दल मुख्य रूप से दलित और पिछड़े वर्गों, खासकर जाटव समुदाय को जोड़ता है। वे कहती हैं कि गठबंधन से कोई बातचीत नहीं हुई है। पार्टी अपने स्तर पर तैयारी कर रही है। अनुप्रिया के मुताबिक, पंचायत चुनाव से उनकी पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूती मिलेगी। मिर्जापुर-प्रतापगढ़ जैसे इलाकों में अपना दल की अच्छी पकड़ है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला बीजेपी के लिए चुनौती पैदा कर सकता है, क्योंकि गठबंधन के वोट बंट सकते हैं।अनुप्रिया के ऐलान के ठीक बाद निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने भी मैदान में कूद पड़े। योगी सरकार में मत्स्य पालन मंत्री संजय निषाद ने 25 मई 2025 को एक कार्यक्रम में कहा कि निषाद पार्टी पंचायत चुनाव अपने बलबूते पर लड़ेगी। संजय निषाद का दल निषाद, मल्लाह और केवट जैसे मछुआरा समुदायों का प्रतिनिधित्व करता है। वे पूर्वांचल के कई जिलों में मजबूत हैं। संजय ने कार्यकर्ताओं से कहा कि हर गांव, हर वार्ड और हर बूथ पर पार्टी का झंडा लहराना है।
उन्होंने जातिवार जनगणना की मांग भी उठाई। कहा कि यह सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि हक और प्रतिनिधित्व की लड़ाई है। साथ ही, ‘मछुआ विजन डॉक्यूमेंट’ को सरकारी नीति बनाने की बात कही। संजय का तर्क है कि पंचायत चुनाव से पार्टी की जड़ें मजबूत होंगी। लेकिन विपक्षी दल इसे एनडीए में दरार बता रहे हैं।इन दोनों के बाद जयंत चौधरी की बारी आई। आरएलडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने सितंबर 2025 में ऐलान किया कि उनकी पार्टी भी पंचायत चुनाव अकेले लड़ेगी। जयंत का दल जाट समुदाय का समर्थन करता है। पश्चिमी यूपी के बागपत, मेरठ, मथुरा जैसे जिलों में आरएलडी की अच्छी पकड़ है। जयंत ने लखनऊ में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए यह जरूरी है। आरएलडी ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं। 2 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक जयंत के सात बड़े कार्यक्रम होंगे। वे कार्यकर्ताओं में जोश भरेंगे। जयंत के पिता चौधरी अजित सिंह की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आरएलडी बिना बीजेपी के समर्थन के टिक पाएगी?इन नेताओं के अकेले लड़ने के पीछे कई वजहें हैं।
पहली तो यह कि पंचायत चुनाव लोकल होते हैं। यहां गठबंधन की बजाय अपनी पहचान बनाना ज्यादा फायदेमंद होता है। छोटे दल अपनी बूथ-स्तरीय ताकत दिखाना चाहते हैं। दूसरी वजह 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी। पंचायत चुनाव के नतीजे से पार्टियां अपनी सियासी जमीन नापेंगी। तीसरी, बीजेपी के साथ गठबंधन में छोटे दलों को हमेशा सीटों का टेंशन रहता है। अकेले लड़कर वे अपनी कीमत बढ़ाना चाहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं, “चुनाव से पहले सहयोगी दल ताकत दिखाते हैं, ताकि ज्यादा सीटें मिलें। लेकिन पंचायत में अकेले लड़ना जोखिम भरा है। वोट बंटने से बीजेपी को नुकसान हो सकता है।”हालांकि, सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) के ओम प्रकाश राजभर ने भी अकेले लड़ने का ऐलान किया है। वे पंचायती राज मंत्री हैं। राजभर समुदाय के वोट बैंक वाले इलाकों में उनकी अच्छी पकड़ है। लेकिन एनडीए में यह बिखराव बीजेपी के लिए सिरदर्द बन सकता है। विपक्षी दल जैसे सपा और बसपा इसका फायदा उठा सकते हैं। कांग्रेस ने भी अकेले लड़ने की बात कही है। अजय राय जैसे नेता सक्रिय हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अकेले लड़ना छोटे दलों के लिए बड़ा दांव है।
अगर वे अच्छा प्रदर्शन करेंगे, तो 2027 में मजबूत स्थिति बन जाएगी। लेकिन अगर नतीजे खराब आए, तो गठबंधन टूटने का खतरा बढ़ सकता है। बीजेपी की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन योगी सरकार में ये सहयोगी बने रहेंगे या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा।पंचायत चुनाव न सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, बल्कि विकास, पानी, बिजली और सड़क जैसे बेसिक मुद्दे हावी रहते हैं। इन चुनावों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण है, जो पार्टियों के लिए नई चुनौती है। कुल मिलाकर, अनुप्रिया, संजय और जयंत का यह फैसला यूपी की सियासत को नया मोड़ दे रहा है। क्या यह गठबंधन को मजबूत करेगा या कमजोर? इसका जवाब तो चुनावी नतीजों से ही मिलेगा। फिलहाल, सभी दल अपनी-अपनी कमर कस रहे हैं।
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