• January 8, 2026

दिल्ली प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: CAQM को लगाई फटकार, टोल प्लाजा हटाने पर दो महीने की मोहलत देने से किया इनकार

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में छाई जहरीली धुंध और लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण के संकट पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बेहद सख्त रुख अपनाया। शीर्ष अदालत ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए उसे अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल करार दिया। सुनवाई के दौरान सबसे तीखी बहस दिल्ली की सीमाओं पर स्थित टोल प्लाजा को लेकर हुई। अदालत ने आयोग द्वारा इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए मांगी गई दो महीने की मोहलत को सिरे से खारिज कर दिया और आयोग को विशेषज्ञों के साथ तत्काल बैठक कर समाधान निकालने का आदेश दिया।

सीएक्यूएम की कार्यशैली पर ‘सुप्रीम’ नाराजगी

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने अदालत को बताया कि दिल्ली की सीमाओं पर भारी वाहनों के कारण लगने वाले जाम और प्रदूषण को कम करने के लिए टोल प्लाजा को अस्थायी रूप से हटाने या बंद करने के मुद्दे पर विचार किया जा रहा है, जिसके लिए उन्हें दो महीने का समय चाहिए। आयोग की इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि प्रदूषण एक आपातकालीन स्थिति है और आयोग इसे एक सामान्य प्रशासनिक कार्य की तरह ले रहा है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आयोग अपनी जिम्मेदारियां निभाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।

टोल प्लाजा और भारी वाहनों का प्रदूषण में योगदान

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात को रेखांकित किया कि दिल्ली में प्रवेश करने वाले भारी वाहन (Heavy Vehicles) वायु प्रदूषण के सबसे बड़े कारकों में से एक हैं। सीमाओं पर बने टोल प्लाजा पर वाहनों की लंबी कतारें लगती हैं, जिससे न केवल ट्रैफिक जाम होता है, बल्कि वहां घंटों खड़े ट्रक और व्यावसायिक वाहन भारी मात्रा में धुआं छोड़ते हैं। अदालत ने आयोग से पूछा कि जब प्रदूषण का मुख्य स्रोत स्पष्ट है, तो समाधान निकालने में देरी क्यों की जा रही है? पीठ ने कहा कि 2 जनवरी को एक बैठक करना और फिर अदालत से दो महीने का समय मांगना बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने निर्देश दिया कि आयोग विभिन्न हितधारकों (Stakeholders) के दबाव में आए बिना स्वतंत्र रूप से टोल प्लाजा के मुद्दे पर ठोस फैसला ले।

विशेषज्ञों की बैठक और दो सप्ताह में रिपोर्ट सौंपने का आदेश

अदालत ने केवल फटकार ही नहीं लगाई, बल्कि आयोग को एक सख्त समय-सीमा (Deadline) के भीतर काम करने का निर्देश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सीएक्यूएम को आदेश दिया कि वह अगले दो सप्ताह के भीतर पर्यावरण विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और संबंधित विभागों की एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाए। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य बढ़ते प्रदूषण के मूल कारणों की पहचान करना और उनके तात्कालिक समाधान ढूंढना होगा। अदालत ने आयोग से कहा कि विशेषज्ञों की इस राय के आधार पर दो हफ्ते के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाए, जिसमें यह बताया जाए कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जमीनी स्तर पर क्या कदम उठाए गए हैं और भविष्य की योजना क्या है।

सार्वजनिक राय और विशेषज्ञों के लेखों का हवाला

न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रदूषण की समस्या पर अब पर्याप्त जानकारी और सामग्री सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है। अदालत ने कहा कि विशेषज्ञ लगातार लेख लिख रहे हैं, लोग अपनी राय ईमेल के जरिए अदालत तक पहुंचा रहे हैं और वैज्ञानिक आंकड़े भी स्पष्ट हैं। इसके बावजूद आयोग अभी तक कारणों की पहचान करने और उन पर कार्रवाई करने के चरण में ही अटका हुआ है। अदालत ने आयोग से तल्ख लहजे में सवाल किया, “क्या आप वास्तव में प्रदूषण के असली कारणों की पहचान कर पाए हैं या सिर्फ समय मांग रहे हैं?” पीठ ने कहा कि अब कागजी बैठकों का समय खत्म हो चुका है और जमीन पर परिणाम दिखने चाहिए।

दीर्घकालिक समाधानों की आवश्यकता पर बल

सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को निर्देशित किया कि वह केवल ‘ग्रैप’ (GRAP) जैसे आपातकालीन कदमों तक ही सीमित न रहे, बल्कि प्रदूषण के ‘लंबे समय के समाधानों’ (Long-term Solutions) पर चरणबद्ध तरीके से विचार करना शुरू करे। अदालत का मानना है कि हर साल सर्दी के मौसम में इस तरह की स्थिति पैदा होना व्यवस्था की विफलता है। टोल प्लाजा पर रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) जैसी तकनीक के पूर्ण कार्यान्वयन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों पर आयोग को बिना किसी बाहरी प्रभाव के निर्णय लेने को कहा गया है। अदालत ने कहा कि हितधारकों का रुख कुछ भी हो, आयोग की प्राथमिकता केवल ‘स्वच्छ हवा’ और ‘जन स्वास्थ्य’ होनी चाहिए।

निष्कर्ष और न्यायिक हस्तक्षेप का संदेश

मंगलवार की सुनवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट अब प्रदूषण के मुद्दे पर प्रशासन की ढिलाई को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। आयोग को दी गई यह फटकार एक चेतावनी है कि यदि दो सप्ताह के भीतर संतोषजनक रिपोर्ट और कार्ययोजना पेश नहीं की गई, तो अदालत अधिक सख्त आदेश पारित कर सकती है। दिल्ली-एनसीआर के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े इस गंभीर विषय पर अब सबकी नजरें आयोग की आगामी विशेषज्ञ बैठक और उसकी रिपोर्ट पर टिकी हैं।

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