महंगाई मापने के नए पैमाने पर विवाद: एसबीआई ने उठाये इंडेक्स की सटीकता पर सवाल, यूपी-महाराष्ट्र के भारी दबदबे से डेटा बिगड़ने का डर
मुंबई/नई दिल्ली: भारत में आम आदमी की जेब पर पड़ने वाले असर यानी खुदरा महंगाई को मापने के तरीके में सरकार ने बड़ा बदलाव किया है, लेकिन इस नए पैमाने ने अर्थशास्त्रियों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की ताजा शोध रिपोर्ट में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की नई सीरीज (2024) की विश्वसनीयता और भौगोलिक संतुलन पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। रिपोर्ट का दावा है कि महंगाई की गणना के लिए चुने गए नए बाजारों में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का वर्चस्व इतना अधिक है कि यह पूरे देश की महंगाई की वास्तविक तस्वीर को धुंधला कर सकता है।
सरकार ने समय के साथ बदलते भारतीयों के उपभोग पैटर्न को देखते हुए वर्ष 2012 की पुरानी सीरीज को बदलकर सीपीआई-2024 सीरीज पेश की है। इसका उद्देश्य महंगाई के आंकड़ों को अधिक सटीक और आधुनिक बनाना था। इसके लिए सरकार ने गणना में शामिल वस्तुओं की संख्या बढ़ाई और भौगोलिक कवरेज का विस्तार किया। हालांकि, एसबीआई की रिपोर्ट इस विस्तार की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाती है। रिपोर्ट के अनुसार, पुरानी सीरीज के मुकाबले नई सीरीज में कुल 565 नए ग्रामीण और शहरी बाजारों को जोड़ा गया है, ताकि छोटे कस्बों और गांवों की कीमतों को बेहतर ढंग से ट्रैक किया जा सके। लेकिन चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन 565 नए बाजारों में से अकेले 43 प्रतिशत हिस्सेदारी सिर्फ दो राज्यों—उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की है।
एसबीआई के विश्लेषकों का मानना है कि नए बाजारों का यह प्रतिनिधित्व अत्यधिक असमान है। जब डेटा कलेक्शन के पॉइंट्स किसी खास क्षेत्र या राज्य की ओर इतने झुके हुए हों, तो राष्ट्रीय स्तर पर घोषित होने वाली महंगाई दर पर उन राज्यों की स्थानीय कीमतों का असर जरूरत से ज्यादा दिखने लगता है। सरल शब्दों में कहें तो, यदि उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र में किसी कारणवश कीमतें बढ़ती हैं, तो वह पूरे भारत की महंगाई दर को ऊपर खींच लेगी, भले ही दक्षिण या पूर्वोत्तर भारत में कीमतें स्थिर हों। यह भौगोलिक असंतुलन नीति निर्माताओं और रिजर्व बैंक के लिए सटीक फैसले लेना चुनौतीपूर्ण बना सकता है।
महंगाई मापने वाली ‘वस्तुओं की टोकरी’ (बास्केट) में भी क्रांतिकारी बदलाव किए गए हैं। नई सीरीज में कुल वेटेड आइटम की संख्या 299 से बढ़ाकर 358 कर दी गई है। इसमें वस्तुओं की संख्या अब 259 से बढ़कर 314 हो गई है, जबकि सेवाओं की संख्या को 40 से बढ़ाकर 50 किया गया है। बदलते समय के साथ जो चीजें अब लोगों के जीवन का हिस्सा नहीं रहीं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इनमें वीसीआर, डीवीडी प्लेयर, पुराने टेप रिकॉर्डर, कैसेट्स और रेडियो जैसी चीजें शामिल हैं। इनके स्थान पर आधुनिक जरूरतों जैसे ऑनलाइन स्ट्रीमिंग सेवाएं (नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार आदि), बेबीसिटर की सेवाएं, जिम और एक्सरसाइज इक्विपमेंट, पेनड्राइव, हार्ड डिस्क और वैल्यू-एडेड डेयरी उत्पादों को शामिल किया गया है। पहली बार ग्रामीण आवास को भी इस सूचकांक में स्थान दिया गया है, जो एक स्वागत योग्य कदम माना जा रहा है।
डिजिटल इंडिया की धमक को सूचकांक में शामिल करने के लिए सरकार ने 25 लाख से अधिक आबादी वाले 12 प्रमुख शहरों में ई-कॉमर्स और ऑनलाइन मार्केट की कीमतों को ट्रैक करना शुरू किया है। इस सूची में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और लखनऊ जैसे महानगर शामिल हैं। हालांकि, एसबीआई की रिपोर्ट और अन्य बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस चयन में कुछ महत्वपूर्ण शहरों की अनदेखी की गई है। इंदौर, पटना, भोपाल, नागपुर और ठाणे जैसे शहर, जो जनसंख्या के मामले में 25 लाख के करीब हैं और जहां ऑनलाइन खरीदारी का ग्राफ बहुत तेजी से बढ़ रहा है, उन्हें इस ट्रैकिंग सिस्टम से बाहर रखा गया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि टियर-2 शहरों की अनदेखी से डिजिटल इकोनॉमी की महंगाई का पूरा डेटा अधूरा रह सकता है।
नई सीरीज के लागू होने के साथ ही महंगाई के आंकड़ों में सांख्यिकीय बदलाव भी दिखने शुरू हो गए हैं। जनवरी 2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो नई सीरीज के तहत खुदरा महंगाई (हेडलाइन इन्फ्लेशन) 2.75 प्रतिशत दर्ज की गई। यदि इसे पुरानी सीरीज के ‘लिंकिंग फैक्टर’ के आधार पर देखा जाए, तो यह 2.55 प्रतिशत बैठती थी। यानी नई पद्धति में महंगाई का आंकड़ा थोड़ा ऊंचा दिख रहा है। हालांकि, कोर इन्फ्लेशन (ईंधन और खाद्य पदार्थों को छोड़कर) के मोर्चे पर राहत मिली है। नई सीरीज में कोर इन्फ्लेशन घटकर 3.4 प्रतिशत रह गई है, जो पुरानी सीरीज में 4.15 प्रतिशत के स्तर पर थी। इस बड़ी गिरावट का मुख्य तकनीकी कारण सोने (Gold) के वेटेज में की गई कटौती है। वर्ष 2012 की सीरीज में सोने का वेटेज 1.08 प्रतिशत था, जिसे अब घटाकर मात्र 0.62 प्रतिशत कर दिया गया है।
निष्कर्ष के तौर पर, सीपीआई का नया आधार वर्ष बदलते भारत की बदलती आदतों को प्रतिबिंबित करने का एक ईमानदार प्रयास जरूर है, लेकिन डेटा कलेक्शन के केंद्रों में कुछ राज्यों का अत्यधिक दखल और तेजी से बढ़ते टियर-2 शहरों की उपेक्षा इसकी सटीकता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। एसबीआई की यह चेतावनी सरकार के लिए एक संकेत है कि भविष्य में इस सूचकांक को और अधिक समावेशी और संतुलित बनाने की आवश्यकता होगी, ताकि ‘भारत की महंगाई’ का मतलब केवल कुछ राज्यों की कीमतों का औसत बनकर न रह जाए।