• March 7, 2026

रक्षा मंत्री ने गोवा में नौसेना युद्ध कॉलेज के आधुनिक भवन परिसर का उद्घाटन किया

 रक्षा मंत्री ने गोवा में नौसेना युद्ध कॉलेज के आधुनिक भवन परिसर का उद्घाटन किया

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को गोवा में नौसेना युद्ध कॉलेज के नए अत्याधुनिक भवन परिसर का उद्घाटन किया। चोल राजवंश के शक्तिशाली समुद्री साम्राज्य की याद में इस आधुनिक भवन का नाम ‘चोल’ रखा गया है। इमारत की डिजाइन भारत की समृद्ध समुद्री विरासत को दर्शाने के मकसद से तैयार की गई है। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि भारतीय नौसेना का रोल आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाला है।

उन्होंने कहा कि आज जब नेवल वॉर कॉलेज के नए भवन का उद्घाटन हो रहा है तो प्रशिक्षु प्रशिक्षण के दौरान निश्चित रूप से इस बात को जानेंगे, सीखेंगे कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र में नौसेना की भूमिका कैसे महत्वपूर्ण हो रही है। मेरा पूरा विश्वास है कि यह नौसेना युद्ध महाविद्यालय अपने नवीन प्रशिक्षण के माध्यम से प्रशिक्षुओं की सैन्य क्षमता को बढ़ाने के साथ ही उन्हें इस नए परिप्रेक्ष्य और आर्थिक हित पर ध्यान केंद्रित करने के बारे में भी अवगत कराएगा। रक्षा मंत्री ने कहा कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र में वैश्विक व्यापार के संबंध में उभर रही चुनौतियों को देखते हुए कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय नौसेना का आधार, हमारी आर्थिक रुचि सबसे अधिक निकटता से जुड़ी हुई है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि नौसेना ने एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन और एंटी ट्रैफिकिंग ऑपरेशन के माध्यम से पाइरेसी और ट्रैफिकिंग पर लगाम लगाने के साथ ही भारत के लिए वैश्विक कैनवास पर सद्भावना भी पैदा की है। भारतीय नौसेना की तत्परता से समुद्री घटनाओं में कमी देखी गई है लेकिन समुद्री डकैतों की धमकियों को अभी भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। आने वाले समय में भारतीय नौसेना की भूमिका अहम होगी, क्योंकि भारत का कुल भूमि क्षेत्रफल लगभग 32 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक है लेकिन भारत तीन ओर से समुद्र की चपेट में है। भारत की सबसे बड़ी नौसैनिक शक्ति विरोधियों से तो हमारी सुरक्षा करती है, साथ ही हिंद महासागर के अन्य हितधारकों को भी सुरक्षा का माहौल प्रदान कर रही है।

नौसेना युद्ध कॉलेज का इतिहास

भारतीय नौसेना के मध्यम और वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों को उन्नत पेशेवर सैन्य शिक्षा प्रदान करने के लिए साल 1988 में आईएनएस करंजा में नौसेना युद्ध कॉलेज की स्थापना की गई थी। साल 2010 में इस कॉलेज का नाम बदलकर नौसेना युद्ध कॉलेज कर दिया गया और 2011 में इसे गोवा में इसके मौजूदा स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया। उच्च सैन्य शिक्षा के लिए एक प्रमुख प्रतिष्ठित संस्थान होने की दृष्टि से इस कॉलेज का मिशन सशस्त्र बलों के अधिकारियों को रणनीतिक और परिचालन स्तरों पर नेतृत्व के लिए तैयार करना है। इसके अलावा यह कॉलेज समुद्री सुरक्षा पाठ्यक्रम भी संचालित करता है, जिसमें समुद्री पड़ोस के सैन्य अधिकारी भी हिस्सा लेते हैं। नौसेना युद्ध कॉलेज वॉरगेमिंग और आर्कटिक अध्ययन के लिए भारतीय नौसेना का उत्कृष्टता केंद्र भी है।

‘चोल’ भवन

अकादमिक निर्देश, अनुसंधान और युद्धाभ्यास के लिए नौसेना युद्ध कॉलेज का भवन चोल राजवंश की समुद्री शक्ति से प्रेरित है। इस संरचना के केंद्रीय भाग में एक टाइलयुक्त भित्ति चित्र है, जो साल 1025 में हिंद महासागर के सुदूर समुद्र पार श्रीविजय साम्राज्य के लिए राजेंद्र चोल के अभियान को दिखाता है। इस भवन का नाम अतीत में भारत के समुद्री प्रभाव और मौजूदा समय में एक समुद्री शक्ति के रूप में इसके फिर से उत्थान को दिखाकर अतीत को वर्तमान से जोड़ता है।

इस भवन का निर्माण गृह-III मानदंडों के अनुरूप किया गया है। इस भवन की कई प्रमुख विशेषताएं हैं। इनमें पर्यावरणीय विकास पहलों के लिए उत्खनित मिट्टी का घरेलू उपयोग, 10 लाख लीटर से अधिक की वर्षा जल संचयन क्षमता, 100 किलोवाट सौर ऊर्जा उत्पादन और हरित भवन मानक शामिल हैं। टिकाऊपन और ऊर्जा दक्षता के पहलू इस भवन के डिजाइन इंजीनियरिंग दर्शन के मूल हैं, जिसका सबसे अच्छा उदाहरण 100 साल पुराने बरगद के पेड़ को उखाड़े बिना उसके आसपास भवन का निर्माण किया गया है।

प्रतीकात्मक रूप से यह भवन रीस मैगोस में पुर्तगालियों के औपनिवेशिक किले की तरह दिखता है। यह उपयुक्त स्थान औपनिवेशिक अतीत के अवशेषों को छोड़ने के भारत की प्रतिबद्धता को दिखाता है। इसके अलावा यह भविष्य के सैन्य हस्तियों के लिए छत्रपति शिवाजी के ‘जलमेव यस्य, बलमेव तस्य’ (जो समुद्र को नियंत्रित करता है, वह सर्वशक्तिमान है) में स्पष्ट विश्वास के निरंतर मूल्य के एक उपयुक्त अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है।

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