कर्नाटक में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर ‘एक्शन मोड’ में सरकार: टास्क फोर्स, कमांड सेंटर और तकनीक से होगी सुरक्षा
मंगलुरु/बेंगलुरु: कर्नाटक के घने जंगलों और उनसे सटी मानवीय बस्तियों के बीच बढ़ता तनाव अब राज्य सरकार के लिए प्राथमिकता का विषय बन गया है। इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ते टकराव की घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। इसी कड़ी में शुक्रवार को राज्य के वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने सरकार की विस्तृत कार्ययोजना साझा करते हुए दावा किया कि कर्नाटक का वन प्रशासन वन्यजीव चुनौतियों से निपटने में देश का सबसे सक्रिय और सक्षम तंत्र बनकर उभरा है। सरकार का लक्ष्य न केवल मानव जीवन की रक्षा करना है, बल्कि जैव विविधता को सुरक्षित रखते हुए वन्यजीवों के संरक्षण को भी सुनिश्चित करना है।
बढ़ता संकट: एक साल के भीतर बाघों और इंसानों की जान गई
कर्नाटक में पिछले एक साल के आंकड़े डराने वाले रहे हैं। वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, एक वर्ष की अवधि के भीतर मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण 30 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। वहीं, दूसरी ओर संरक्षण के प्रयासों के बावजूद 14 बाघों की भी मृत्यु दर्ज की गई है। हाथियों और भेड़ियों के हमलों ने विशेष रूप से ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। इसी संकट को देखते हुए सिद्धारमैया सरकार ने अपनी रणनीति को पूरी तरह से बदलने का निर्णय लिया है, जिसमें अब पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक तकनीक को शामिल किया गया है।
तकनीक आधारित निगरानी और समर्पित कमांड सेंटर
वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने पिलिकुला निसर्गधाम में ‘हक्की हब्बा’ (पक्षी उत्सव) के दौरान मीडिया से बात करते हुए बताया कि सरकार ने संघर्ष को कम करने के लिए बेंगलुरु में एक अत्याधुनिक ‘कमांड सेंटर’ और हेल्पलाइन स्थापित की है। यह केंद्र 24 घंटे काम करता है और संकट की स्थिति में प्राप्त होने वाली हर कॉल की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग करता है।
जैसे ही किसी जंगली जानवर के रिहायशी इलाके में घुसने की सूचना मिलती है, कमांड सेंटर तुरंत संबंधित रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर (RFO), डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) और असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (ACF) को अलर्ट भेजता है। इसके बाद वन विभाग की टीमें त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली के तहत घटनास्थल पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित करती हैं। मंत्री ने जोर देकर कहा कि इस प्रणाली से न केवल रिस्पॉन्स टाइम कम हुआ है, बल्कि अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हुई है।
हाथी टास्क फोर्स और जमीनी स्तर पर हस्तक्षेप
तटीय और अंदरूनी कर्नाटक के जिलों में हाथियों की बढ़ती आवाजाही एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाथियों द्वारा फसलों की बर्बादी और जान-माल के नुकसान को देखते हुए सरकार ने एक विशेष ‘हाथी टास्क फोर्स’ (Elephant Task Force) का गठन किया है। यह टास्क फोर्स हाथियों के झुंड की आवाजाही पर नजर रखती है और उन्हें मानवीय बस्तियों से दूर रखने के लिए रेडियो कॉलरिंग और ड्रोन मैपिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर रही है।
ईश्वर खंड्रे ने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदायों के फीडबैक के आधार पर लक्षित हस्तक्षेप किए जा रहे हैं। जहां हाथियों की समस्या अधिक है, वहां रेल बैरिकेड्स और सौर बाड़ लगाने के काम को भी प्राथमिकता दी जा रही है। वन मंत्री ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था ऐसी बनाई गई है जिससे जानवरों को नुकसान पहुंचाए बिना उन्हें वापस उनके प्राकृतिक आवास में भेजा जा सके।
पारदर्शिता और अधिकारियों की जवाबदेही की समीक्षा
नई प्रणाली की एक बड़ी विशेषता इसकी पारदर्शिता है। कमांड सेंटर न केवल सूचनाएं प्रसारित करता है, बल्कि वह यह भी रिकॉर्ड करता है कि अधिकारियों ने सूचना मिलने के कितनी देर बाद प्रतिक्रिया दी। मंत्री खंड्रे के अनुसार, हर घटना की समीक्षा की जाती है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या कहीं कोई चूक हुई थी। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है, तो उस पर सुधारात्मक कार्रवाई की जाती है। इस कठोर समीक्षा तंत्र ने वन प्रशासन को अधिक चुस्त-दुरुस्त और पारदर्शी बना दिया है।
वन कर्मचारियों के लिए सुविधाओं का विस्तार
मैदानी स्तर पर काम करने वाले वन कर्मचारियों (Frontline Forest Staff) की चुनौतियों को समझते हुए सरकार उनके लिए आवासीय सुविधाओं की योजना भी बना रही है। संघर्षग्रस्त इलाकों में तैनात कर्मचारी अक्सर अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। मंत्री ने घोषणा की कि सरकार इन कर्मचारियों की तैयारी और मनोबल बढ़ाने के लिए उनके आवास और सुरक्षा उपकरणों पर निवेश कर रही है। जब अग्रिम पंक्ति के कर्मचारी सुरक्षित और तैयार होंगे, तभी वे जनता की सुरक्षा प्रभावी ढंग से कर पाएंगे।
निष्कर्ष: संतुलन और संरक्षण की दिशा में कदम
कर्नाटक सरकार का यह ‘एक्शन प्लान’ दर्शाता है कि वह मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि एक पारिस्थितिक चुनौती के रूप में देख रही है। तकनीक, त्वरित प्रतिक्रिया और स्थानीय सहभागिता के माध्यम से सिद्धारमैया सरकार एक ऐसा मॉडल विकसित करने की कोशिश कर रही है, जिसे देश के अन्य राज्य भी अपना सकें। वन मंत्री का यह दावा कि कर्नाटक का वन प्रशासन सबसे सक्रिय है, धरातल पर क्रियान्वित हो रही इन योजनाओं से पुख्ता होता नजर आ रहा है।