आसमान में भारत की प्रचंड गर्जना: 114 राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे को रक्षा खरीद परिषद की मंजूरी, चीन-पाक सीमा पर बढ़ेगी वायुसेना की ताकत
नई दिल्ली: ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के सफल क्रियान्वयन के बाद भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों और हवाई शक्ति को अभेद्य बनाने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। रक्षा खरीद परिषद (DAC) ने भारतीय वायुसेना के लिए 114 मल्टी-रोल लड़ाकू विमानों (MRFA) के सौदे को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस महत्वपूर्ण रक्षा सौदे के केंद्र में फ्रांस का उन्नत लड़ाकू विमान ‘राफेल’ है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रों 17 फरवरी 2026 से तीन दिवसीय भारत यात्रा पर आ रहे हैं। रणनीतिक जानकारों का मानना है कि इस यात्रा के दौरान दोनों देश इस महा-सौदे पर हस्ताक्षर कर अपने रक्षा सहयोग को एक नए और अविश्वसनीय शिखर पर ले जाएंगे।
‘ऑपरेशन सिन्दूर’ से मिले अनुभवों और भविष्य की युद्ध चुनौतियों को देखते हुए भारत ने आसमान में अपनी बादशाहत कायम करने की इच्छाशक्ति दिखाई है। इस सौदे के पूर्ण होने के बाद भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में जबरदस्त इजाफा होगा, जिससे वह अपनी सीमा के भीतर सुरक्षित रहते हुए भी दुश्मन के 200 से 250 किलोमीटर दूर स्थित ठिकानों को पलक झपकते ही ध्वस्त करने में सक्षम हो जाएगी।
रणनीतिक ताकत और मारक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि
वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह के अनुसार, राफेल एक ‘गेम-चेंजर’ लड़ाकू विमान है। भारतीय वायुसेना और सरकार ने मौजूदा वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को समझते हुए इस सौदे को बेहद खास बनाया है। वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास लगभग 28-29 स्क्वाड्रन हैं, जबकि दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर युद्ध की चुनौतियों को देखते हुए कम से कम 42 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है। कारगिल संघर्ष के बाद से ही सामरिक विशेषज्ञ वायुसेना की इस क्षमता विस्तार का सपना देख रहे थे।
114 नए राफेल विमानों के आने से वायुसेना में 4.5 पीढ़ी के 6 अतिरिक्त स्क्वाड्रन शामिल हो सकेंगे। ये सभी विमान आधुनिक ‘F-4 स्टैंडर्ड’ के होंगे, जो उन्नत रडार प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अत्याधुनिक मिसाइलों से लैस होंगे। गौरतलब है कि भारत के पास पहले से ही 36 राफेल विमान सेवा में हैं और नौसेना के लिए भी 26 राफेल एम (मैरीन) प्रस्तावित हैं। इस नए सौदे के बाद भारत के पास राफेल विमानों की कुल संख्या 150 तक पहुंच जाएगी। यह संख्या दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को पूरी तरह भारत के पक्ष में झुकाने और किसी भी शत्रु देश के मंसूबों को नाकाम करने के लिए पर्याप्त है। इस मारक क्षमता से भारत अपनी सीमा पार किए बिना पड़ोसी देशों के सामरिक ठिकानों को निशाना बना सकता है।
‘मेक इन इंडिया’ और तकनीकी हस्तांतरण का अनूठा मॉडल
इस सौदे की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘मेक इन इंडिया’ ढांचा है। मोदी सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए इस सौदे को स्वदेशी विनिर्माण से जोड़ा है। समझौते के तहत, फ्रांस से 18 राफेल विमान पूरी तरह से तैयार (फ्लाई-वे) स्थिति में प्राप्त किए जाएंगे, जबकि शेष 96 विमानों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इसके लिए फ्रांस की कंपनी ‘डसाल्ट एविएशन’ भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनी के साथ मिलकर तकनीकी हस्तांतरण (ToT) के माध्यम से इन विमानों को विकसित करेगी।
सुखोई-30 MKI के बाद राफेल दूसरा ऐसा उन्नत लड़ाकू विमान होगा, जिसे भारत में ही असेंबल और निर्मित किया जाएगा। सौदे की शर्तों के अनुसार, शुरुआती स्तर पर इन विमानों में 30 प्रतिशत स्वदेशी कल-पुर्जों का उपयोग किया जाएगा, जिसे चरणबद्ध तरीके से बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य है। इससे न केवल भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता बढ़ेगी, बल्कि देश में इसके रखरखाव और मरम्मत (MRO) की एक सुदृढ़ व्यवस्था भी स्थापित होगी।
रोजगार के अवसर और आर्थिक प्रभाव
करीब 40 अरब डॉलर (लगभग 3.25 से 3.60 लाख करोड़ रुपये) का यह सौदा भारत के रक्षा इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा अनुबंध होगा। इतने बड़े पैमाने पर निवेश और स्वदेशी निर्माण से रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों रोजगार के अवसर पैदा होंगे। यह सौदा भारत के रूस और इजरायल के साथ मौजूदा रक्षा संबंधों के बीच फ्रांस को एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में स्थापित करेगा। इससे न केवल विमानों की आपूर्ति होगी, बल्कि अत्याधुनिक वैमानिकी तकनीक का आदान-प्रदान भी सुगम होगा।
अंतिम मुहर और भविष्य की रूपरेखा
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों की 17 से 19 फरवरी की यात्रा के दौरान इस सौदे को अंतिम रूप दिए जाने की प्रबल संभावना है। हालांकि, इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की औपचारिक मुहर लगना अनिवार्य है। भारत की एक प्रमुख शर्त अपने स्वयं के स्वदेशी हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को राफेल के साथ ‘इंटीग्रेट’ करने की भी है। माना जा रहा है कि दोनों देश ‘गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट’ (G2G) आधार पर इस समझौते को अंतिम रूप देंगे।
विमानों के स्वरूप की बात करें तो इसमें 88 सिंगल-सीटर युद्धक विमान और 26 ट्विन-सीटर प्रशिक्षण विमान शामिल होंगे। यह विविधता वायुसेना को ऑपरेशनल तैयारियों के साथ-साथ पायलटों के प्रशिक्षण में भी बड़ी मदद देगी। आसमान में भारत की यह बढ़ती ताकत न केवल सीमा सुरक्षा सुनिश्चित करेगी, बल्कि वैश्विक मंच पर एक ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ के रूप में भारत की छवि को और अधिक मजबूत करेगी।