• February 25, 2026

CJI सूर्यकांत ने PIL की ‘मशरूम ग्रोथ’ पर जताई नाराजगी: सुबह अखबार पढ़कर शाम को याचिका दायर करने वाले ‘नामचीन चेहरों’ पर सख्त टिप्पणी

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाओं (PIL) की तेजी से बढ़ती संख्या पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने इसे “मशरूम ग्रोथ” (कवक की तरह अनियंत्रित बढ़ोतरी) करार देते हुए कहा कि कुछ “प्रमुख चेहरों” (prominent faces) का एकमात्र एजेंडा सुबह अखबार पढ़ना और शाम तक उस पर याचिका दायर कर देना रह गया है।
मंगलवार (24 फरवरी 2026) को एक मामले की सुनवाई के दौरान CJI ने टिप्पणी की, “हम PIL में मशरूम ग्रोथ देख रहे हैं। ऐसा लगता है कि कुछ प्रमुख चेहरे अब ऐसे हैं जिनका एकमात्र एजेंडा है—सुबह अखबार पढ़ना और शाम तक याचिका दायर कर देना।” उन्होंने कहा कि कई याचिकाएं बिना किसी जमीनी शोध या गहन जांच के सिर्फ समाचारों के आधार पर दायर की जा रही हैं, जिससे अदालत का कीमती समय बर्बाद हो रहा है।
याचिकाओं के पीछे का उद्देश्य संदिग्धCJI ने याचिकाओं की गुणवत्ता और उनके उद्देश्यों पर सवाल उठाए। उन्होंने माना कि ऐसी PILs से अदालत का समय व्यर्थ होता है, जो वास्तविक जरूरतमंदों और गंभीर कानूनी मुद्दों के लिए इस्तेमाल होना चाहिए। कई मामलों में इन याचिकाओं का मकसद जनहित के बजाय विकास परियोजनाओं को रोकना या व्यक्तिगत/प्रचार संबंधी लाभ लेना होता है। CJI ने कहा कि बिना ठोस आधार वाली याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं।
पहले भी कोर्ट ने की ऐसी टिप्पणियांयह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने PIL की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई है। 2022 के एक फैसले में कोर्ट ने कहा था, “हालांकि कई ऐसी याचिकाओं में कोई वास्तविक जनहित शामिल नहीं होता है। ये याचिकाएं या तो ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (प्रचार के लिए मुकदमेबाजी) होती हैं या ‘पर्सनल इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (निजी स्वार्थ के लिए मुकदमेबाजी)। हम ऐसी निरर्थक याचिकाओं की कड़ी निंदा करते हैं। यह कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसी याचिकाएं अदालत के कीमती समय को बर्बाद करती हैं, जिसे गंभीर मुद्दों पर खर्च किया जा सकता था। अब समय आ गया है कि ऐसी तथाकथित जनहित याचिकाओं को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया जाए, ताकि बड़े जनहित में चल रहे विकास कार्य न रुकें।”CJI सूर्यकांत की यह टिप्पणी PIL दाखिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त रुख को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे फर्जी या प्रचार वाली याचिकाओं पर लगाम लग सकती है और न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी।
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