• February 13, 2026

बांग्लादेश में ‘रहमान युग’ का उदय: बीएनपी की प्रचंड जीत और भारत-बांग्लादेश संबंधों के नए समीकरण

ढाका/नई दिल्ली: पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए ऐतिहासिक आम चुनावों के परिणामों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। शेख हसीना सरकार के नाटकीय पतन और उसके बाद उपजी लंबी राजनीतिक अस्थिरता के बाद हुए इन चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। 300 सदस्यीय संसद में बीएनपी ने 200 से अधिक सीटों पर कब्जा जमाकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है। इस शानदार जीत के साथ ही पार्टी के शीर्ष नेता तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना तय हो गया है। भारत के लिए ये नतीजे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पिछले कुछ समय से बांग्लादेश के साथ रिश्तों में आई तल्खी और अनिश्चितता के बीच अब एक स्थिर और लोकतांत्रिक सरकार के साथ संवाद का रास्ता साफ हो गया है।

चुनाव के अंतिम परिणामों ने न केवल बीएनपी की सत्ता में वापसी की मुहर लगाई है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति के एक और बड़े पहलू को उजागर किया है। इन चुनावों में कट्टरपंथी विचारधारा वाली पार्टी जमात-ए-इस्लामी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। बीएनपी की इस बड़ी जीत को भारत में एक राहत भरी खबर के रूप में देखा जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी ताकतों का कमजोर होना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से सकारात्मक संकेत है। हालांकि ऐतिहासिक रूप से बीएनपी और भारत के संबंध बहुत मधुर नहीं रहे हैं, लेकिन वर्तमान वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों में नई दिल्ली तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार को एक विश्वसनीय लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देख रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान और उनकी पार्टी को इस निर्णायक जीत पर गर्मजोशी से बधाई दी है। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने संदेश में स्पष्ट किया कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के प्रति अपने समर्थन को जारी रखेगा। उन्होंने तारिक रहमान के साथ मिलकर दोनों देशों के बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। भारत का यह रुख दर्शाता है कि नई दिल्ली ‘पड़ोस पहले’ की नीति के तहत बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली का स्वागत करती है और पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर एक नई शुरुआत के लिए तैयार है।

तारिक रहमान की जीत के कई गहरे मायने हैं, जो आने वाले समय में भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय करेंगे। सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा सहयोग का है। 2009 से 2024 के बीच शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान भारत को पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद पर लगाम लगाने में भारी मदद मिली थी। उस समय बांग्लादेश की धरती का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए बंद कर दिया गया था। अब बीएनपी के सत्ता में आने पर भारत की नजर इस बात पर होगी कि क्या नया नेतृत्व सुरक्षा के मोर्चे पर वही सहयोग जारी रखता है। अतीत में बीएनपी सरकारों पर भारत विरोधी तत्वों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इस बार तारिक रहमान के पास अपनी छवि बदलने और भारत के साथ एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभरने का मौका है।

एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती बांग्लादेश में हावी होते कट्टरपंथ को नियंत्रित करने की होगी। बीएनपी के शासन करने का तरीका और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रति उसका रवैया वैश्विक स्तर पर उसकी छवि निर्धारित करेगा। इसके अलावा, शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग और सीमा प्रबंधन जैसे संवेदनशील मुद्दे शुरुआती तौर पर नई सरकार और भारत के बीच चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं। विदेश नीति के मोर्चे पर भारत यह भी बारीकी से देखेगा कि तारिक रहमान की सरकार चीन और पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को किस तरह संतुलित करती है। बांग्लादेश में चीन का बढ़ता निवेश और पाकिस्तान का संभावित प्रभाव भारत की रणनीतिक चिंताओं का हिस्सा रहा है।

बीएनपी का इतिहास संघर्ष और सत्ता के उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। इस पार्टी की नींव पूर्व प्रधानमंत्री जिया-उर-रहमान ने रखी थी, जिसके बाद उनकी पत्नी खालिदा जिया ने लंबे समय तक नेतृत्व किया। 30 दिसंबर 2025 को खालिदा जिया के निधन के बाद पार्टी की पूरी जिम्मेदारी उनके बेटे तारिक रहमान के कंधों पर आ गई। 2024 के चुनावों का बहिष्कार करने वाली बीएनपी ने इस बार जनता के बीच जाकर ‘राष्ट्रवाद’ और ‘लोकतंत्र की बहाली’ को मुख्य मुद्दा बनाया, जिसे बांग्लादेशी आवाम ने हाथों-हाथ लिया। प्रचंड बहुमत यह दर्शाता है कि जनता ने पुराने नेतृत्व के विकल्प के रूप में तारिक रहमान पर अटूट विश्वास जताया है।

भारत और बांग्लादेश के बीच केवल राजनीतिक संबंध ही नहीं, बल्कि गहरे आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध भी हैं। बिजली, सड़क, रेलवे और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं। स्थिर राजनीतिक माहौल होने से इन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति मिलेगी और व्यापार घाटे को कम करने की दिशा में भी काम किया जा सकेगा। ऊर्जा के क्षेत्र में भारत द्वारा दी जा रही सहायता और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा की तरह हैं। नई सरकार के साथ इन आर्थिक साझेदारियों को और अधिक विस्तार मिलने की संभावना है, जिससे न केवल दोनों देशों का फायदा होगा बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में स्थिरता आएगी।

सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान के लिहाज से भी यह एक नए युग की शुरुआत हो सकती है। दोनों देशों के बीच छात्रों, कलाकारों और युवाओं के लिए नए अवसर खुल सकते हैं, जो जमीनी स्तर पर जन-जन के बीच संबंधों को मजबूत करेंगे। अंततः, तारिक रहमान की यह जीत एक संदेश है कि बांग्लादेश के लोग एक स्थिर और प्रगतिशील भविष्य चाहते हैं। भारत की ‘पड़ोस पहले’ नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ढाका में इस नए नेतृत्व के साथ कितनी प्रभावी ढंग से तालमेल बिठाता है। आने वाले दिन न केवल बांग्लादेश के भविष्य के लिए बल्कि दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य के लिए भी अत्यंत निर्णायक होने वाले हैं।

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