• February 26, 2026

अंकिता भंडारी प्रकरण: भाजपा नेता दुष्यंत गौतम की प्राथमिकी पर पुलिस का कड़ा रुख, सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए ‘दंगा भड़काने’ की साजिश की होगी डिजिटल जांच

देहरादून: उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड मामले ने एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। इस बार मामला हत्याकांड की जांच से इतर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही सूचनाओं और उन पर किए जा रहे ‘विवादित कमेंट्स’ से जुड़ा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी के बाद देहरादून पुलिस ने कमर कस ली है। पुलिस अब उन तमाम डिजिटल साक्ष्यों को खंगाल रही है, जिनके जरिए कथित तौर पर प्रदेश की शांति व्यवस्था भंग करने और एक विशेष राजनीतिक दल की छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया है। डालनवाला थाने में दर्ज इस मामले के बाद अब वे सभी लोग जांच के घेरे में हैं, जिन्होंने अंकिता भंडारी के नाम पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं या भ्रामक पोस्ट साझा की हैं।

दुष्यंत गौतम के गंभीर आरोप: दंगे भड़काने और बदनाम करने की साजिश

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स, जैसे फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर एक सोची-समझी साजिश के तहत अंकिता भंडारी मामले को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। गौतम का दावा है कि अंकिता के नाम का सहारा लेकर ‘उर्मिला’ व अन्य विवादित पोस्ट्स के माध्यम से उत्तराखंड के सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़ने की कोशिश की गई है। प्राथमिकी में कहा गया है कि इन पोस्ट्स का उद्देश्य न केवल भाजपा की छवि खराब करना है, बल्कि प्रदेश में सांप्रदायिक या सामाजिक विद्वेष पैदा कर दंगे भड़काना भी है। भाजपा नेता ने इसे एक ‘टूलकिट’ का हिस्सा बताते हुए पुलिस से उन सभी हैंडलर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है जो पर्दे के पीछे से इस प्रोपेगेंडा को हवा दे रहे हैं।

डिजिटल साक्ष्यों का संकलन: रडार पर ‘उर्मिला’ से संबंधित पोस्ट

प्राथमिकी दर्ज होने के बाद डालनवाला पुलिस और साइबर सेल की टीम सक्रिय हो गई है। जांच अधिकारियों ने डिजिटल साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पुलिस का प्राथमिक ध्यान उन विशिष्ट पोस्ट्स पर है जिनमें अंकिता भंडारी के संदर्भ में ‘उर्मिला’ नामक पात्र या अन्य विवादास्पद संदर्भों का उल्लेख किया गया है। पुलिस उन यूजर्स की पहचान कर रही है जिन्होंने न केवल इन पोस्ट्स को साझा किया, बल्कि उन पर भड़काऊ और आपत्तिजनक टिप्पणियां भी कीं। जांच का एक मुख्य हिस्सा यह पता लगाना है कि क्या ये पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष के निजी विचार थे या फिर इन्हें किसी संगठित गिरोह द्वारा एक निश्चित मंशा के साथ वायरल किया गया था। पुलिस उन ‘कीवर्ड्स’ और ‘हैशटैग्स’ की भी मैपिंग कर रही है जिनका इस्तेमाल तनाव फैलाने के लिए किया गया।

मंशा की होगी गहन जांच: क्या यह महज अभिव्यक्ति है या अपराध?

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इस मामले में जांच अधिकारी (IO) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रत्येक संदिग्ध पोस्ट और कमेंट के पीछे की मंशा (Intent) की गहराई से जांच की जाए। पुलिस यह समझने का प्रयास करेगी कि क्या संबंधित यूजर ने अज्ञानतावश पोस्ट शेयर की या फिर इसके पीछे शांति व्यवस्था बिगाड़ने का कोई आपराधिक इरादा था। उत्तराखंड पुलिस के उच्चाधिकारियों ने कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और किसी की छवि खराब करने या दंगा भड़काने की कोशिश के बीच एक महीन रेखा होती है, और इस मामले में कानून के दायरे में रहकर ठोस कार्रवाई की जाएगी। जांच अधिकारी अब उन सोशल मीडिया हैंडल्स का पूरा ‘ट्रेल’ निकाल रहे हैं ताकि यह देखा जा सके कि विवादित सामग्री का मूल स्रोत (Origin) क्या था।

संदिग्धों को नोटिस जारी करने की तैयारी

पुलिस सूत्रों के अनुसार, जैसे ही डिजिटल साक्ष्यों का संकलन पूरा हो जाएगा और तकनीकी रिपोर्ट प्राप्त होगी, संबंधित व्यक्तियों को पूछताछ के लिए नोटिस जारी किए जाएंगे। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC/BNSS) की सुसंगत धाराओं के तहत इन लोगों को थाने बुलाकर उनके बयानों को दर्ज किया जाएगा। यदि यह पाया जाता है कि किसी व्यक्ति या समूह ने जानबूझकर समाज में वैमनस्य फैलाने के लिए भ्रामक जानकारी साझा की है, तो उनकी गिरफ्तारी भी संभव है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि किसी भी संवेदनशील मामले में बिना तथ्यों की पुष्टि किए सोशल मीडिया पर टिप्पणी करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आ सकता है, विशेषकर तब जब वह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बन जाए।

शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील

अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड की भावनाओं से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। इस मामले में पुलिस प्रशासन ने जनता से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर चल रही किसी भी अपुष्ट खबर या भड़काऊ पोस्ट पर भरोसा न करें। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पुलिस का मुख्य लक्ष्य उन साक्ष्यों को सुरक्षित करना है जो प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों से सीधे जुड़े हैं। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि जांच निष्पक्ष हो और किसी भी निर्दोष को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए। हालांकि, राजनीतिक दल की छवि खराब करने और प्रदेश में अशांति फैलाने के प्रयासों को पुलिस ने बेहद गंभीरता से लिया है। आने वाले दिनों में इस मामले में कई बड़े खुलासे और कार्रवाई होने की उम्मीद है।

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