इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देना पुलिस का कानूनी कर्तव्य, ‘सेफ हाउस’ मुहैया कराना अब अनिवार्य
प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रेमी जोड़ों की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया है कि अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने वाले जोड़ों को सुरक्षा प्रदान करना पुलिस की मर्जी या कोई ‘उपकार’ नहीं है, बल्कि यह उनकी कानूनी बाध्यता और संवैधानिक उत्तरदायित्व है। न्यायालय ने विशेष रूप से ‘ऑनर किलिंग’ जैसी सामाजिक बुराइयों की आशंका को देखते हुए कहा कि यदि किसी जोड़े को जान का खतरा है, तो उन्हें सुरक्षित आवास यानी ‘सेफ हाउस’ उपलब्ध कराना पुलिस का अनिवार्य दायित्व है। अदालत ने चेतावनी दी कि सुरक्षा मुहैया कराने में किसी भी प्रकार की टालमटोल या लापरवाही पुलिस अधिकारियों के लिए भारी पड़ सकती है और उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
यह ऐतिहासिक टिप्पणी न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने हापुड़ जिले के एक प्रेमी जोड़े द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में जोड़े ने अपने परिजनों से जान का खतरा बताते हुए तत्काल सुरक्षा की मांग की थी। मामले के तथ्यों के अनुसार, एक 20 वर्षीय युवती ने अपनी मर्जी से 33 वर्षीय युवक के साथ निकाह किया था। युवती के पिता इस विवाह के कड़े विरोध में थे और उन्होंने युवक के पहले से शादीशुदा होने का संदेह जताया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता ने न्यायालय को स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों की यह पहली शादी है और दोनों बालिग हैं।
न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 31 अगस्त 2019 को जारी किए गए एक महत्वपूर्ण शासनादेश का विशेष उल्लेख किया। जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा कि गरिमापूर्ण, सुरक्षित और शांतिपूर्ण जीवन जीना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। जब कोई जोड़ा सुरक्षा की मांग लेकर प्रशासन के पास पहुँचता है, तो पुलिस इस जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि जो पुलिस अधिकारी ऐसे संवेदनशील मामलों में ढिलाई बरतते हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि वे न केवल अपने कर्तव्य की अवहेलना कर रहे हैं, बल्कि न्यायालय के आदेशों और शासनादेशों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।
अदालत ने जिस 31 अगस्त 2019 के शासनादेश का जिक्र किया, वह वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग और खाप पंचायतों द्वारा लिए जाने वाले गैर-कानूनी फैसलों के खिलाफ देश भर में सुरक्षा तंत्र स्थापित करने का आदेश दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे दोहराते हुए कहा कि शासन की मंशा स्पष्ट है—यदि कोई बालिग जोड़ा अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला करता है, तो राज्य का कर्तव्य है कि वह उनकी जान-माल की रक्षा करे।
सुरक्षा की रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा करते हुए अदालत ने बताया कि यदि कोई विवाहित जोड़ा जान के खतरे की आशंका जताता है, तो प्रशासन को उन्हें न्यूनतम दर पर कम से कम एक महीने के लिए ‘सेफ हाउस’ (सुरक्षित गृह) की सुविधा देनी होगी। यदि जांच में यह पाया जाता है कि खतरे की गंभीरता अधिक है, तो इस अवधि को एक वर्ष तक के लिए बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि जोड़ा बालिग है लेकिन उनकी शादी का अभी पंजीकरण नहीं हुआ है, तो पुलिस और संबंधित मजिस्ट्रेट का यह दायित्व है कि वे उनकी शादी को कानूनी रूप से पंजीकृत कराने में हर संभव सहयोग प्रदान करें।
हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) को विशेष निर्देश जारी करते हुए कहा कि वे ऐसे मामलों में अत्यधिक संवेदनशीलता का परिचय दें। न्यायालय ने एक समय-सीमा निर्धारित करते हुए कहा कि सुरक्षा की शिकायत मिलने के एक सप्ताह के भीतर पुलिस को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपनी होगी और आवश्यक सुरक्षात्मक कदम उठाने होंगे। विशेष रूप से अंतर्जातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है, क्योंकि सामाजिक संरचना में ऐसे जोड़ों पर हमले की संभावना अधिक रहती है।
हालांकि, अपने आदेश के अंत में न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण भी दिया। अदालत ने साफ किया कि सुरक्षा प्रदान करने का यह आदेश केवल ‘जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा’ (Right to Life and Liberty) तक ही सीमित है। इस आदेश का अर्थ यह कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि न्यायालय ने उनकी शादी को कानूनी रूप से वैध घोषित कर दिया है। शादी की कानूनी वैधता का विषय अलग है और यदि किसी पक्ष पर अपहरण, धोखाधड़ी या किसी अन्य आपराधिक कृत्य का आरोप है, तो पुलिस नियमानुसार अपनी स्वतंत्र जांच और कार्रवाई जारी रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
यह फैसला उन हजारों प्रेमी जोड़ों के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है, जो सामाजिक और पारिवारिक दबाव के कारण भय के साये में जीने को मजबूर हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख से उत्तर प्रदेश पुलिस के कार्यबल में जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है। न्यायालय ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में कानून किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं करेगा और पुलिस को एक संरक्षक की भूमिका निभानी ही होगी।