• February 13, 2026

भारत के प्रशासनिक इतिहास में स्वर्णिम अध्याय: प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सेवा तीर्थ’ और ‘कर्तव्य भवनों’ का किया उद्घाटन, लुटियंस दिल्ली से आधुनिक भारत की ओर महाप्रस्थान

नई दिल्ली: भारत की प्रशासनिक राजधानी आज एक ऐसे ऐतिहासिक बदलाव की साक्षी बनी है, जो न केवल शासन व्यवस्था के आधुनिकीकरण का प्रतीक है, बल्कि औपनिवेशिक विरासत से निकलकर आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्रीय राजधानी में नवनिर्मित प्रधानमंत्री कार्यालय परिसर, जिसे ‘सेवा तीर्थ’ नाम दिया गया है, और दो विशाल प्रशासनिक भवनों ‘कर्तव्य भवन-1’ एवं ‘कर्तव्य भवन-2’ का भव्य उद्घाटन किया। यह आयोजन उस विशेष तिथि पर हुआ है जब ठीक 95 वर्ष पहले, यानी 13 फरवरी 1931 को, नई दिल्ली को आधिकारिक रूप से भारत की राजधानी के रूप में दुनिया के सामने पेश किया गया था। आज लगभग एक सदी बाद, भारत ने अपनी कार्यसंस्कृति और प्रशासनिक ढांचे को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप ढालते हुए एक नया इतिहास रच दिया है।

दोपहर के समय आयोजित एक गरिमामयी समारोह में प्रधानमंत्री ने सबसे पहले ‘सेवा तीर्थ’ नामकरण की पट्टिका का अनावरण किया। इसके पश्चात उन्होंने कर्तव्य भवनों का निरीक्षण किया और वहां उपलब्ध कराई गई आधुनिक सुविधाओं का जायजा लिया। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री ने शाम को एक विशाल जनसभा को भी संबोधित किया, जहां उन्होंने इस नए परिसर को विकसित भारत के संकल्प की सिद्धि का केंद्र बताया। यह पूरा घटनाक्रम महज ईंट और पत्थरों की इमारतों का उद्घाटन नहीं है, बल्कि भारत के शासन मॉडल में आए उस परिवर्तन का प्रतिबिंब है जो अब सुगमता, पारदर्शिता और दक्षता पर आधारित है।

रायसीना हिल पर स्थित नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक पिछले नौ दशकों से भारत की सत्ता के केंद्र रहे हैं। 1931 में जब वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई दिल्ली का उद्घाटन किया था, तब इन इमारतों को ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। हालांकि, समय के साथ बदलती जरूरतों और बढ़ते कार्यभार के कारण ये पुरानी इमारतें वर्तमान दौर की तकनीकी और सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने में अक्षम साबित हो रही थीं। अलग-अलग मंत्रालयों का शहर के विभिन्न हिस्सों में बिखरा होना न केवल प्रशासनिक समन्वय में बाधा उत्पन्न करता था, बल्कि इसके कारण सरकारी खजाने पर रखरखाव का भारी बोझ भी बढ़ रहा था। ‘सेवा तीर्थ’ और ‘कर्तव्य भवनों’ के अस्तित्व में आने से अब यह बिखराव समाप्त हो गया है।

‘सेवा तीर्थ’ परिसर को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यहां प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय को एक ही छत के नीचे लाया गया है। पहले ये महत्वपूर्ण संस्थान अलग-अलग स्थानों से संचालित होते थे, जिससे त्वरित निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में कभी-कभी देरी होती थी। अब एक ही समेकित परिसर होने से शीर्ष स्तर पर नीति निर्धारण और कार्यान्वयन में अभूतपूर्व तेजी आने की संभावना है। इसी प्रकार, कर्तव्य भवन-1 और 2 में देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों जैसे रक्षा, वित्त, गृह, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और कानून मंत्रालयों को स्थान दिया गया है। मंत्रालयों के इस एकीकरण से न केवल कागजी कार्यवाही और फाइलों के मूवमेंट में लगने वाला समय बचेगा, बल्कि विभिन्न विभागों के बीच अंतर-विभागीय समन्वय भी पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ होगा।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो नई दिल्ली का निर्माण 1911 के दिल्ली दरबार के बाद शुरू हुआ था जब किंग जॉर्ज पंचम ने राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की थी। ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस और सर हर्बर्ट बेकर ने रायसीना हिल परिसर की परिकल्पना की थी। आज जब प्रधानमंत्री ने नए परिसरों का उद्घाटन किया, तो यह संदेश स्पष्ट था कि भारत अब अपनी प्रशासनिक पहचान को भारतीय लोकाचार और आधुनिक तकनीक के संगम के रूप में परिभाषित कर रहा है। सरकार की योजना के अनुसार, भविष्य में रिक्त होने वाले नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को ‘युगे युगेन भारत’ नामक राष्ट्रीय संग्रहालय में परिवर्तित किया जाएगा, जो दुनिया के सबसे विशाल संग्रहालयों में से एक होगा और भारत के 5000 वर्षों के इतिहास की गाथा कहेगा।

इन नई इमारतों की सबसे बड़ी विशेषता इनका डिजिटल और पर्यावरण अनुकूल स्वरूप है। सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन परिसर 4-स्टार जीआरआईएचए मानकों पर आधारित हैं, जिसका अर्थ है कि इन्हें बनाते समय पर्यावरण संरक्षण का विशेष ध्यान रखा गया है। इन परिसरों में सौर ऊर्जा के उपयोग, वर्षा जल संचयन और उन्नत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को लागू किया गया है। वर्तमान समय की सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए यहां स्मार्ट एक्सेस कंट्रोल, हाई-टेक सर्विलांस नेटवर्क और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए आधुनिक रेस्पॉन्स सिस्टम स्थापित किए गए हैं। प्रत्येक कार्यालय को पूरी तरह से डिजिटल और पेपरलेस कार्यप्रणाली के अनुकूल बनाया गया है, जो प्रधानमंत्री के ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान को सीधे तौर पर जमीन पर उतारता है।

सचिवालय के इस पुनर्विकास से आम नागरिकों को भी बड़ी राहत मिलेगी। पहले मंत्रालयों के अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण आम जनता को सरकारी कार्यों के लिए शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक चक्कर लगाने पड़ते थे। अब कर्तव्य भवनों में केंद्रीकृत स्वागत प्रणाली और व्यवस्थित सार्वजनिक संपर्क क्षेत्र बनाए गए हैं, जिससे शासन व्यवस्था न केवल पारदर्शी हुई है बल्कि आम नागरिक के लिए सुलभ भी हो गई है। यह कदम ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ के सिद्धांत को पुष्ट करता है।

सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के हिस्से के रूप में तैयार ये भवन भारत के बढ़ते वैश्विक कद की ओर भी इशारा करते हैं। जब विदेशी प्रतिनिधिमंडल भारत आएंगे, तो वे एक ऐसा प्रशासनिक केंद्र देखेंगे जो अपनी विरासत पर गर्व भी करता है और भविष्य की तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर भी चलता है। कर्तव्य भवन नाम अपने आप में इस बात का परिचायक है कि इन कार्यालयों में बैठने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों का प्राथमिक उद्देश्य जन सेवा और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना है।

95 साल पहले 13 फरवरी को जब दिल्ली का उद्घाटन हुआ था, तब वह औपनिवेशिक शासन की नींव को मजबूत करने का प्रयास था। आज 2026 में, उसी तारीख को प्रधानमंत्री द्वारा किया गया यह उद्घाटन एक स्वतंत्र, समर्थ और आधुनिक भारत की नींव को और गहरा करने का प्रयास है। यह नए भारत की वह कार्यसंस्कृति है जहां काम के माहौल को न केवल बेहतर बनाया गया है, बल्कि उसे राष्ट्र की प्रगति की गति तेज करने के एक माध्यम के रूप में विकसित किया गया है। सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन आने वाली पीढ़ियों के लिए उस परिवर्तनकारी कालखंड की याद दिलाते रहेंगे जब भारत ने अपनी पुरानी बेड़ियों को तोड़कर एक आधुनिक प्रशासनिक ढांचे को अपनाया था।

Digiqole Ad

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *