• July 3, 2026

कथित निकाह हलाला मामले में 9 आरोपियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं, कोर्ट बोला- पर्सनल लॉ से ऊपर है आपराधिक कानून

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अमरोहा के चर्चित कथित निकाह हलाला, तीन तलाक और यौन शोषण से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए नौ आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी मामले में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के आरोप सामने आते हैं, तो आपराधिक कानून को किसी भी व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) या धार्मिक प्रथा के अधीन नहीं किया जा सकता। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला समाज के उस पक्ष को उजागर करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में निहित समानता, व्यक्तिगत गरिमा और निजता जैसे मूल्यों से काफी दूर है। अदालत ने सभी नौ आरोपियों की एफआईआर रद्द करने संबंधी याचिकाएं खारिज कर दीं।

क्या है पूरा मामला?

मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के सैदनगली थाना क्षेत्र का है। शिकायत के अनुसार, पीड़िता का निकाह 25 अप्रैल 2015 को कथित तौर पर उसकी इच्छा के विरुद्ध अजहर नवाज से कराया गया था। उस समय उसकी उम्र महज 15 वर्ष थी। जनवरी 2016 में पति ने उसे तीन तलाक दे दिया। शिकायत में आरोप है कि बाद में दोबारा निकाह कराने के नाम पर मौलाना की सलाह का हवाला देकर पीड़िता को कथित निकाह हलाला की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर किया गया। इस दौरान मौलाना पर जबरन शारीरिक संबंध बनाने का आरोप है। इसके बाद वर्ष 2017 में पीड़िता का दोबारा अपने पहले पति से निकाह कराया गया। एफआईआर के अनुसार, वर्ष 2021 में पति ने उसे दूसरी बार भी तीन तलाक दे दिया और दूसरी महिला से शादी कर ली। बाद में जब दूसरी पत्नी से संतान नहीं हुई तो उसने पीड़िता को फिर से साथ रखने का प्रस्ताव दिया। आरोप है कि इस बार उसे बताया गया कि दो बार तलाक होने के कारण दोबारा हलाला करना आवश्यक है। पीड़िता का आरोप है कि 19 फरवरी 2025 को हलाला के नाम पर पति के दो भाइयों ने जान से मारने की धमकी देकर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और बाद में फर्जी निकाह का नाटक रचा गया।

कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान आरोपियों ने दलील दी कि मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ और धार्मिक प्रथाओं से जुड़ा है, इसलिए एफआईआर रद्द की जानी चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में गंभीर आपराधिक आरोप हों, तब व्यक्तिगत कानून की आड़ लेकर जांच को नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि एफआईआर रद्द करने के स्तर पर साक्ष्यों की विस्तृत जांच नहीं की जाती, बल्कि यह देखा जाता है कि शिकायत में संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। खंडपीठ ने यह भी उल्लेख किया कि पहली कथित हलाला प्रक्रिया के समय पीड़िता नाबालिग थी, जिससे प्रथम दृष्टया पॉक्सो कानून के तहत अपराध का मामला बनता है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध को किसी भी पर्सनल लॉ के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता और ऐसे मामलों में पॉक्सो अधिनियम पूरी तरह लागू होगा।

पुलिस जांच का रास्ता साफ

हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों की याचिकाएं खारिज करते हुए पहले दिए गए अंतरिम आदेश भी तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिए। इसके साथ ही पुलिस के लिए मामले की विस्तृत जांच आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। फिलहाल मामले की जांच जारी है और आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होगा।

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