• February 13, 2026

वंदे मातरम् के सभी छंद अनिवार्य करने पर छिड़ा विवाद: मुस्लिम संगठनों का तीखा विरोध, साजिद रशीदी बोले- ‘सिर कटा लेंगे, पर विशेष पंक्तियां नहीं गाएंगे’

नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी किए गए नए दिशा-निर्देशों ने देश के राजनीतिक और धार्मिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकार के ताजा आदेश के अनुसार, अब सभी आधिकारिक और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरा (छंद) को बजाना या गाना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही, नए प्रोटोकॉल में राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के समान ही सम्मान देने की बात कही गई है। सरकार के इस कदम का मुस्लिम संगठनों और समुदाय के नेताओं ने पुरजोर विरोध शुरू कर दिया है, जिससे यह मुद्दा एक बार फिर सांप्रदायिक और संवैधानिक बहस के केंद्र में आ गया है।

इस विवाद में सबसे तीखी प्रतिक्रिया ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी की ओर से आई है। रशीदी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि मुसलमान अपने सिर कटा सकते हैं, लेकिन राष्ट्रगीत के उन विशेष छंदों का गायन नहीं करेंगे जो उनकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत हैं। उन्होंने इस निर्णय को समुदाय की आस्था पर प्रहार बताया है। समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत के दौरान रशीदी ने इस विरोध के पीछे ऐतिहासिक और धार्मिक तर्क देते हुए कहा कि वंदे मातरम् 1937 से ही विवाद का विषय रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि आजादी से पहले मौलाना अबुल कलाम आजाद और हुसैन अहमद मदानी जैसे प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियां इस्लाम की मूलभूत मान्यताओं के खिलाफ हैं।

रशीदी का मुख्य तर्क यह है कि राष्ट्रगीत के बाद के चार छंदों में देश को ‘मां दुर्गा’ और ‘मां सरस्वती’ जैसे देवी-देवताओं के रूप में संबोधित किया गया है। उनके अनुसार, इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत की अनुमति है और किसी अन्य की वंदना करना धार्मिक रूप से स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि 1937 में कांग्रेस ने इन आपत्तियों को स्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था और गीत के विवादित हिस्सों को हटाकर केवल शुरुआती पंक्तियों को ही अपनाया था। रशीदी ने आगे वर्ष 2016 के सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति वंदे मातरम् के दौरान खड़ा नहीं होता है, तो उसे अनिवार्य रूप से देशद्रोही नहीं माना जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुसलमान अपनी जान दे सकते हैं, लेकिन अपनी धार्मिक आस्था के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। उनके अनुसार, किसी पर भी अपनी आस्था के विरुद्ध कुछ थोपने का प्रयास करना सहन नहीं किया जाएगा।

विरोध की इस कड़ी में एआईएमआईएम (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने भी अपनी आवाज बुलंद की है। वारिस पठान ने सरकार के इस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से वंदे मातरम् का आदर और सम्मान करते हैं, लेकिन इसे अनिवार्य करना नागरिकों की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधते हुए कहा कि यह धारणा बनाना गलत है कि जो वंदे मातरम् नहीं बोलता, वह देशद्रोही है। पठान ने तर्क दिया कि मुस्लिम समुदाय राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ को खुशी-खुशी और पूरे सम्मान के साथ गाता है, क्योंकि उसमें किसी धार्मिक आस्था का टकराव नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बुनियादी समस्याओं और असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के भावनात्मक और विवादास्पद आदेश लेकर आ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंदों को लेकर सामान्यतः कोई विरोध नहीं देखा जाता है, क्योंकि उनमें मातृभूमि की सुंदरता और उर्वरता का वर्णन है। विवाद मुख्य रूप से उन छंदों पर होता है जिनमें भारत माता को दशप्रहरणधारिणी दुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है। अब तक सरकारी कार्यक्रमों में केवल संक्षिप्त संस्करण (शुरुआती दो छंद) ही गाए जाने की परंपरा रही है। केंद्र सरकार के नए प्रोटोकॉल ने अब पूरे छह छंदों को अनिवार्य बनाकर उस पुरानी व्यवस्था को बदल दिया है, जिसे लेकर मुस्लिम समुदाय अपनी आपत्ति दर्ज करा रहा है।

सरकार की ओर से इस मामले पर कहा गया है कि यह निर्णय राष्ट्रगीत के सम्मान को पुनर्जीवित करने और देश की सांस्कृतिक विरासत को पूर्ण रूप से आत्मसात करने के उद्देश्य से लिया गया है। हालांकि, विपक्षी नेताओं और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि भारत जैसे बहुलतावादी देश में जहां विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, वहां किसी की धार्मिक स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप करना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। फिलहाल, इस आदेश को लेकर देश भर में राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है और आने वाले दिनों में यह मामला अदालती गलियारों तक भी पहुँच सकता है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आपत्तियों पर अपना क्या रुख रखती है और क्या इस प्रोटोकॉल में कोई संशोधन किया जाएगा या इसे सख्ती से लागू किया जाएगा।

Digiqole Ad

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *