महाराष्ट्र नगर परिषद चुनाव: चंद्रपुर में भाजपा ने कांग्रेस के जबड़े से छीनी जीत, ‘इंडिया ब्लॉक’ में दरार और हॉर्स-ट्रेडिंग के आरोपों से गरमाई सियासत
चंद्रपुर/मुंबई: महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों के बाद अब नगर परिषदों में सत्ता के शिखर यानी मेयर और डिप्टी मेयर पद को हथियाने की जंग अपने चरम पर है। इसी कड़ी में चंद्रपुर नगर परिषद का चुनावी परिणाम राज्य की राजनीति में एक बड़ा भूचाल लेकर आया है। सोमवार को हुए नाटकीय घटनाक्रम में भारतीय जनता पार्टी की पार्षद संगीता खांडेकर चंद्रपुर की नई मेयर चुन ली गई हैं। हालांकि, इस जीत ने महा विकास अघाड़ी (MVA) और विपक्षी ‘इंडिया ब्लॉक’ की एकजुटता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। भाजपा की इस जीत में शिवसेना (यूबीटी) की निर्णायक भूमिका ने कांग्रेस को हैरान और आक्रोशित कर दिया है, जिसके बाद महाराष्ट्र की राजनीति में ‘हॉर्स-ट्रेडिंग’ और विश्वासघात के आरोपों का दौर शुरू हो गया है।
चंद्रपुर नगर परिषद के मेयर चुनाव का मुकाबला इतना कड़ा था कि हार-जीत का फैसला महज एक वोट से हुआ। भाजपा की संगीता खांडेकर को कुल 32 वोट मिले, जबकि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस के उम्मीदवार को 31 वोटों से संतोष करना पड़ा। इस कांटे की टक्कर में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने के लिए शिवसेना (यूबीटी) के पार्षदों ने खुला समर्थन दिया। गठबंधन की शर्तों के तहत, शिवसेना (यूबीटी) के पार्षद प्रशांत दानव को डिप्टी मेयर चुना गया है। भाजपा और उद्धव ठाकरे की पार्टी के बीच हुए इस अप्रत्याशित गठबंधन ने कांग्रेस के खेमे में खलबली मचा दी है, क्योंकि शिवसेना (यूबीटी) राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की प्रमुख सहयोगी है।
कांग्रेस ने इस हार के बाद भाजपा और शिवसेना (यूबीटी) पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि चंद्रपुर में मेयर की कुर्सी हासिल करने के लिए पार्षदों की खुलेआम खरीद-फरोख्त की गई है। महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ नेताओं ने इस हार के लिए न केवल उद्धव ठाकरे की शिवसेना को, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) और प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) को भी जिम्मेदार ठहराया है। कांग्रेस का तर्क है कि यदि इन छोटे दलों और सहयोगियों ने विचारधारा के आधार पर मतदान किया होता, तो सबसे बड़ा दल होने के नाते मेयर पद पर कांग्रेस का कब्जा होता।
चंद्रपुर नगर परिषद की अंकगणितीय स्थिति पर नजर डालें तो 66 सदस्यों वाली इस परिषद में 15 जनवरी को आए चुनावी नतीजों ने खंडित जनादेश दिया था। कांग्रेस 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसे पूर्ण बहुमत (34 वोट) के लिए केवल सात अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता थी। दूसरी तरफ, भाजपा 23 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर थी। ऐसे में छह सीटों वाली शिवसेना (यूबीटी) किंगमेकर की भूमिका में थी। कांग्रेस को उम्मीद थी कि ‘इंडिया ब्लॉक’ और एमवीए के साथी होने के नाते शिवसेना के छह पार्षद उनके पाले में आएंगे, लेकिन ऐन वक्त पर शिवसेना ने भाजपा का दामन थाम लिया।
बाकी सीटों के बंटवारे में भारतीय शेतकारी कामगार पक्ष (जनविकास सेना) को तीन, वंचित बहुजन अघाड़ी को दो और एआईएमआईएम, बीएसपी व एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को एक-एक सीट मिली थी। दो निर्दलीय पार्षदों ने भी जीत दर्ज की थी। सोमवार को मतदान के दौरान भाजपा अपने 23 पार्षदों के साथ शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और निर्दलीयों का समर्थन जुटाने में सफल रही, जिससे उनका आंकड़ा 32 तक पहुंच गया।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सपकाल ने इस पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र के लिए काला दिन है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया कि भाजपा ने केवल शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और वीबीए के ‘अपरोक्ष सहयोग’ के कारण ही अपना मेयर बनाया है। सपकाल ने विशेष रूप से वंचित बहुजन अघाड़ी पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव के दौरान हमारा असली गठबंधन उनके साथ था, लेकिन मेयर चुनाव में उन्होंने कांग्रेस का साथ न देकर भाजपा की राह आसान कर दी। कांग्रेस का दावा है कि उनके पार्षदों को डराया-धमकाया गया या फिर प्रलोभन देकर तोड़ने की कोशिश की गई, जो सीधे तौर पर हॉर्स-ट्रेडिंग का मामला है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चंद्रपुर का यह घटनाक्रम आगामी विधानसभा चुनावों के लिए महा विकास अघाड़ी के भीतर गहरे अविश्वास का संकेत है। उद्धव ठाकरे की पार्टी का भाजपा के साथ जाना इस बात को दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर सत्ता की महत्वाकांक्षाएं अक्सर वैचारिक और गठबंधन की सीमाओं को लांघ जाती हैं। डिप्टी मेयर पद के बदले शिवसेना (यूबीटी) ने अपनी ही सहयोगी कांग्रेस को जो झटका दिया है, उसकी गूंज अब मुंबई और दिल्ली के गलियारों तक सुनाई दे रही है।
फिलहाल, चंद्रपुर में भाजपा की जीत और शिवसेना (यूबीटी) के साथ उनके नए समीकरण ने राज्य की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया है। जहां भाजपा इसे विकास की जीत बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे ‘धनबल’ और ‘विश्वासघात’ की राजनीति करार देकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस कलह का असर महा विकास अघाड़ी के भविष्य पर पड़ता है या फिर इसे केवल एक ‘स्थानीय निकाय का समीकरण’ मानकर रफा-दफा कर दिया जाएगा।