मुंबई मेयर चुनाव: संजय राउत का भाजपा पर तीखा हमला, कहा- ‘मराठी कार्ड’ और ‘कांग्रेस से आई उम्मीदवार’ भाजपा की मजबूरी
मुंबई। बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के आगामी मेयर चुनाव को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति में बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। शिवसेना (यूबीटी) के फायरब्रांड नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने भाजपा द्वारा मेयर पद के लिए रितु तावड़े को उम्मीदवार बनाए जाने पर बड़ा तंज कसा है। रविवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए राउत ने दावा किया कि हालिया बीएमसी चुनावों में मराठी समुदाय ने जिस तरह शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के गठबंधन को अपना भारी समर्थन दिया है, उसी के डर से भाजपा को मजबूरन एक ‘मराठी चेहरे’ को मेयर पद के लिए सामने लाना पड़ा है। उन्होंने भाजपा की मूल विचारधारा पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी के पास अपना कुछ भी मौलिक नहीं बचा है।
संजय राउत ने मेयर पद की उम्मीदवार रितु तावड़े की राजनीतिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि वह मूल रूप से कांग्रेस की नेता रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आज दूसरों के घर से लाए गए नेताओं के दम पर राजनीति कर रही है। राउत के अनुसार, मुंबई में मराठी मानुस का जो प्रभाव शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की मनसे ने पैदा किया है, उसी का परिणाम है कि भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। गौरतलब है कि 53 वर्षीय रितु तावड़े का मुंबई की मेयर बनना अब लगभग तय माना जा रहा है। यदि वह चुनी जाती हैं, तो वह पिछले चार दशकों में भाजपा की पहली मेयर होंगी। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवसेना (यूबीटी) ने इस पद के लिए अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है, जिससे देश के सबसे अमीर नगर निकाय पर ठाकरे परिवार का पिछले 25 वर्षों से चला आ रहा वर्चस्व तकनीकी रूप से समाप्त होने की राह पर है।
मेयर चुनाव के राजनीतिक समीकरणों के साथ-साथ संजय राउत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी समारोह को लेकर भी तीखे सवाल दागे। शनिवार को आयोजित इस कार्यक्रम में फिल्म अभिनेता सलमान खान की संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ हुई बातचीत पर राउत ने कटाक्ष किया। उन्होंने पूछा कि क्या यह केवल एक बॉलीवुड सितारे का व्यक्तिगत स्वागत था या फिर आरएसएस अब अपनी शाखाओं में मुसलमानों का भी स्वागत करने के लिए तैयार है? राउत ने आरोप लगाया कि एक तरफ समाज में हिंदू-मुस्लिम नफरत और बदले की भावना वाला प्रोपेगेंडा फैलाया जाता है, जिसमें संघ की भी भूमिका रहती है, तो दूसरी तरफ ऐसे मंचों पर विरोधाभासी तस्वीरें दिखाई देती हैं। उन्होंने मांग की कि मोहन भागवत को इस दोहरे मापदंड पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
मुंबई की सत्ता के इस संग्राम में आंकड़ों का खेल भी काफी दिलचस्प है। 11 फरवरी को होने वाले मेयर चुनाव से पहले पिछले महीने हुए 227 सदस्यीय बीएमसी चुनावों के नतीजों ने मुंबई की राजनीतिक तस्वीर बदल दी थी। चुनाव परिणामों में भाजपा 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, जबकि उसकी सहयोगी एकनाथ शिंदे नीत शिवसेना ने 29 सीटें हासिल कीं। विपक्ष के पाले में, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने 65 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी ताकत का एहसास कराया, जबकि उसके सहयोगी दल मनसे को 6 और राकांपा (शरद पवार) को एक सीट मिली। शिवसेना (यूबीटी) और मनसे ने पूरे चुनाव के दौरान ‘मराठी पहचान’ और ‘भूमिपुत्र’ के मुद्दे को आक्रामक तरीके से उठाया था, जिसे राउत भाजपा के मराठी उम्मीदवार उतारने के पीछे की असली वजह मान रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने रितु तावड़े को उतारकर न केवल मराठी मतदाताओं को साधने की कोशिश की है, बल्कि शिवसेना के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने का मास्टरस्ट्रोक भी खेला है। वहीं, संजय राउत के बयान यह संकेत दे रहे हैं कि भले ही ठाकरे गुट ने मेयर पद की रेस से दूरी बना ली हो, लेकिन वे ‘मराठी अस्मिता’ के मुद्दे को हाथ से नहीं जाने देना चाहते। 11 फरवरी को होने वाले मतदान से पहले मुंबई की गलियों में शुरू हुआ यह ‘मराठी बनाम बाहरी’ और ‘असली बनाम नकली’ का विवाद आने वाले दिनों में और गहराने की उम्मीद है। राउत के ताजा हमलों ने साफ कर दिया है कि बीएमसी चुनाव के नतीजे आने के बाद भी मुंबई की सत्ता के गलियारों में संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।