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बंगाल के रण के लिए दिल्ली में बिछी राजनीतिक बिसात: खरगे-राहुल ने की राज्य नेताओं के साथ रणनीति पर चर्चा, उधर भाजपा अध्यक्ष ने भी सांसदों को दिया जीत का मंत्र

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली का राजनीतिक तापमान बढ़ गया है। गुरुवार को कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ही खेमों में पश्चिम बंगाल को लेकर मैराथन बैठकों का दौर चला। एक तरफ जहां कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने राज्य के वरिष्ठ नेताओं के साथ भावी रणनीति पर विचार-मंथन किया, वहीं दूसरी ओर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने बंगाल के सांसदों के साथ बैठक कर चुनावी तैयारियों की समीक्षा की। इन दोनों बैठकों ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार बंगाल का चुनावी समर त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प होने वाला है, जिसमें संगठन की मजबूती और स्थानीय मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

कांग्रेस के भीतर मची हलचल की बात करें तो 10 राजाजी मार्ग स्थित मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर हुई बैठक कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस उच्च स्तरीय बैठक में राहुल गांधी की मौजूदगी ने यह संकेत दे दिया है कि कांग्रेस आलाकमान इस बार बंगाल चुनावों को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। बैठक में पश्चिम बंगाल कांग्रेस इकाई के तमाम दिग्गज नेता शामिल हुए। सूत्रों के अनुसार, बैठक का मुख्य एजेंडा राज्य में कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करना और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना था। बंगाल में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के साथ ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन राज्य स्तर पर टीएमसी के साथ तालमेल की स्थिति अभी भी धुंधली है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने अब तक कांग्रेस या किसी अन्य सहयोगी दल के साथ गठबंधन को लेकर किसी भी प्रकार की औपचारिक चर्चा शुरू नहीं की है। टीएमसी का स्पष्ट रुख और अकेले चुनाव लड़ने के संकेत कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। ऐसे में खरगे और राहुल गांधी ने राज्य इकाई के नेताओं से यह समझने की कोशिश की कि यदि गठबंधन नहीं होता है, तो कांग्रेस किन सीटों पर और किन मुद्दों के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी। बैठक में मौजूद नेताओं ने राज्य में बिगड़ती कानून-व्यवस्था और टीएमसी शासन के खिलाफ जनता के बीच व्याप्त नाराजगी को भुनाने की योजना पर भी चर्चा की। कांग्रेस का मानना है कि भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने के साथ-साथ उसे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए कड़े फैसले लेने होंगे।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने भी बंगाल को लेकर अपनी आक्रामक रणनीति का प्रदर्शन किया है। भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मंगलवार को दिल्ली में पश्चिम बंगाल के लोकसभा और राज्यसभा सांसदों के साथ एक अहम बैठक की। यह बैठक करीब दो घंटे से भी ज्यादा समय तक चली, जिसमें पहली बार निर्वाचित हुए सांसदों को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। इस बैठक का उद्देश्य सांसदों की जमीनी रिपोर्ट को समझना और उन्हें चुनावी मोड में लाना था। पश्चिम बंगाल में भाजपा पिछले कुछ समय से टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है और पार्टी इस गति को बरकरार रखते हुए राज्य की सत्ता पर काबिज होने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

बैठक के बाद दार्जिलिंग से भाजपा सांसद राजू बिस्टा ने विस्तार से चर्चा के मुख्य अंश साझा किए। बिस्टा के अनुसार, यह बैठक पूरी तरह से संगठन की मजबूती पर केंद्रित थी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ यह उनकी पहली औपचारिक मुलाकात थी, जिसमें उन्हें बहुत कुछ सीखने और समझने को मिला। राजू बिस्टा ने जोर देकर कहा कि भाजपा की कार्यसंस्कृति अन्य दलों से भिन्न है क्योंकि यहाँ राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ सांसदों की मुलाकात एक पारिवारिक माहौल में हुई। सांसदों ने अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं, विकास कार्यों और टीएमसी सरकार द्वारा कथित रूप से रोकी जा रही केंद्रीय योजनाओं के मुद्दों को अध्यक्ष के सामने रखा। बिस्टा ने बताया कि नितिन नवीन ने सभी सांसदों को मार्गदर्शन दिया कि वे कैसे जनता के बीच जाकर केंद्र सरकार की उपलब्धियों को बताएं और ममता सरकार की विफलताओं को उजागर करें।

सांसदों के साथ हुई इस बैठक में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सांगठनिक सुझावों का आदान-प्रदान भी हुआ। भाजपा अध्यक्ष ने सांसदों को निर्देश दिया कि वे अपने क्षेत्रों में जाकर बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद करें। पार्टी का मानना है कि बंगाल में केवल भावनात्मक मुद्दों से काम नहीं चलेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन ही टीएमसी की चुनावी मशीनरी का मुकाबला कर सकता है। राजू बिस्टा ने यह भी संकेत दिया कि पार्टी सांसदों की चिंताओं को गंभीरता से ले रही है और आने वाले हफ्तों में बंगाल के लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का दौरा और तेज होगा।

पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को देखें तो इस साल के अंत में होने वाले चुनाव निर्णायक होने वाले हैं। टीएमसी जहां एक तरफ अपनी जन कल्याणकारी योजनाओं के दम पर सत्ता बरकरार रखने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा भ्रष्टाचार और कथित राजनीतिक हिंसा के मुद्दों पर उसे घेरने में जुटी है। इस सबके बीच कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता बचाने की लड़ाई लड़ रही है। गठबंधन की अनिश्चितता और टीएमसी के अकेले चलने के तेवरों ने कांग्रेस के सामने ‘करो या मरो’ वाली स्थिति पैदा कर दी है। दिल्ली में हुई ये दोनों बैठकें इस बात का प्रमाण हैं कि बंगाल की सत्ता का रास्ता भले ही कोलकाता से होकर जाता हो, लेकिन उसकी रणनीति के तार पूरी तरह से दिल्ली से जुड़े हुए हैं।

निष्कर्षतः, बंगाल का चुनाव अब केवल स्थानीय निकाय या सामान्य विधायी चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति के दो बड़े ध्रुवों—भाजपा और विपक्ष—के बीच वर्चस्व की जंग बन गया है। खरगे, राहुल और नितिन नवीन द्वारा दी गई दिशा आगामी महीनों में बंगाल की गलियों और गांवों में चुनावी नारों के रूप में गूंजती दिखाई देगी। जनता का फैसला क्या होगा यह तो समय बताएगा, लेकिन दिल्ली के इन सियासी मंथनों ने युद्ध का बिगुल फूंक दिया है।

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