• February 13, 2026

संसद में अभूतपूर्व गतिरोध: पीएम मोदी के भाषण के बिना धन्यवाद प्रस्ताव पारित, हमले की साजिश के दावों से गरमाई सियासत

नई दिल्ली: भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में 5 फरवरी 2026 का दिन एक ऐसी घटना के लिए दर्ज किया जाएगा, जिसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं और सुरक्षा चिंताओं पर नई बहस छेड़ दी है। संसद के मौजूदा बजट सत्र की कार्यवाही लगातार हंगामे की भेंट चढ़ती रही, लेकिन गुरुवार को जो कुछ हुआ उसने 22 साल पुराने इतिहास को दोहरा दिया। लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बिना ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। यह घटनाक्रम केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके पीछे एक गहरी और भयावह साजिश के दावों ने राजनीतिक गलियारों में भूकंप ला दिया है। सूत्रों के हवाले से जो खबरें सामने आ रही हैं, वे लोकतंत्र के मंदिर की सुरक्षा और विपक्षी आचरण पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती हैं।

संसद के सातवें दिन की शुरुआत से ही माहौल तनावपूर्ण था। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का उत्तर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया जाना था, लेकिन विपक्षी दलों के भारी हंगामे और नारेबाजी के कारण सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से नहीं चल सकी। शाम करीब पांच बजे जब सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, तो उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री अपना पक्ष रखेंगे। लेकिन इसी दौरान सदन के भीतर कुछ ऐसा हुआ जिसने सुरक्षा एजेंसियों और सत्ता पक्ष को चौकन्ना कर दिया। समाचार एजेंसी एएनआई ने सूत्रों के हवाले से एक चौंकाने वाला दावा किया कि कांग्रेस और विपक्षी खेमे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर शारीरिक हमले की साजिश रची थी। इस दावे ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। बताया जा रहा है कि इस कथित योजना के तहत विपक्ष ने जानबूझकर अपनी महिला सांसदों को आगे किया था ताकि प्रधानमंत्री को घेरा जा सके और सुरक्षा घेरे में सेंध लगाई जा सके।

इस पूरे घटनाक्रम पर भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने विस्तार से अपनी बात रखी और विपक्ष की रणनीति पर तीखे हमले किए। तिवारी का दावा है कि यह विरोध प्रदर्शन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित और पहले से तय योजना का हिस्सा थी। उन्होंने बताया कि जिस समय प्रधानमंत्री को बोलना था, उस समय विपक्षी महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट के आसपास एक घेराव जैसी स्थिति बना रही थीं। तिवारी के अनुसार, सदन के भीतर की स्थिति काफी डरावनी और चिंताजनक थी। उन्होंने कहा कि विपक्ष की महिला सांसदों, जिनमें विशेष रूप से वर्षा गायकवाड़ और ज्योतिमणि शामिल थीं, ने ट्रेजरी बेंच की सीटों के पास पहुंचकर प्रधानमंत्री की सीट के करीब एक बड़ा बैनर लहराना शुरू कर दिया। इस बैनर पर ‘डू व्हॉट इज राइट’ लिखा था। यह पूरा प्रदर्शन उन आठ विपक्षी सांसदों के निलंबन के विरोध में बताया जा रहा था, जिन्हें एक दिन पहले ही सदन की मर्यादा भंग करने के आरोप में निलंबित किया गया था।

मनोज तिवारी ने संसदीय कार्य मंत्री की तत्परता की सराहना करते हुए कहा कि अगर उस समय सावधानी नहीं बरती जाती, तो स्थिति अनियंत्रित हो सकती थी। सूत्रों का कहना है कि इसी संभावित खतरे और पक्की जानकारी के आधार पर कि विपक्ष शारीरिक हमले जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, लोकसभा अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री के संबोधन को टालने और सदन को स्थगित करने का फैसला लिया। हालांकि प्रधानमंत्री सदन में मौजूद थे और बोलने के लिए पूरी तरह तैयार थे, लेकिन सुरक्षा प्रोटोकॉल और सदन की गरिमा को ध्यान में रखते हुए उन्हें संबोधन से रोकना पड़ा। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस अपनी गिरती राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए अब संसदीय मर्यादाओं को लांघकर व्यक्तिगत हमलों और हिंसा की राजनीति पर उतारू हो गई है।

सदन में मचे इस घमासान के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्षी नारेबाजी को नजरअंदाज करते हुए ध्वनि मत की प्रक्रिया शुरू की। विपक्ष लगातार सदन के वेल में आकर नारेबाजी कर रहा था, लेकिन हंगामे के बीच ही धन्यवाद प्रस्ताव को बिना प्रधानमंत्री के जवाब के पारित कर दिया गया। यह संसदीय इतिहास की एक दुर्लभ घटना है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो करीब 22 साल बाद ऐसी स्थिति बनी है जब प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब नहीं दिया और प्रस्ताव पास हो गया। इससे पहले साल 2004 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के दौरान ऐसा ही नजारा देखने को मिला था। उस समय भाजपा के नेतृत्व वाले विपक्ष ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जवाब देने से रोक दिया था, जिसके चलते बिना भाषण के ही प्रस्ताव पारित हुआ था। आज इतिहास ने खुद को दोहराया है, लेकिन इस बार के आरोप और परिस्थितियां कहीं अधिक गंभीर और चिंताजनक हैं।

विपक्ष का तर्क है कि उनका विरोध लोकतंत्र की रक्षा और निलंबित सांसदों के हक में था। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है और निलंबन की कार्रवाई एकतरफा थी। हालांकि, महिला सांसदों को ‘ढाल’ के रूप में इस्तेमाल करने और शारीरिक हमले की कथित साजिश के आरोपों ने विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि विरोध करने के लोकतांत्रिक तरीके होते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करना या उनके करीब जाकर शारीरिक रूप से बाधा डालना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। इस घटना ने संसद के भीतर सांसदों के आचरण और सुरक्षा जांच के दायरे को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

इस पूरे विवाद के बाद अब देश भर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक तरफ जहां भाजपा इसे कांग्रेस की कुत्सित मानसिकता और हार की हताशा बता रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस इन दावों को मनगढ़ंत और ध्यान भटकाने वाली रणनीति करार दे रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत की संसद अब वैचारिक मतभेदों से आगे बढ़कर व्यक्तिगत रंजिशों और शारीरिक टकराव का केंद्र बनती जा रही है? यदि सुरक्षा एजेंसियों के पास वाकई ऐसी कोई जानकारी थी, तो यह संसदीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। प्रधानमंत्री मोदी का भाषण न हो पाना केवल एक विधायी विफलता नहीं है, बल्कि यह उस संवाद की हार है जो लोकतंत्र की बुनियाद होती है।

अंततः, 5 फरवरी की इस कार्यवाही ने बजट सत्र के बाकी दिनों के लिए भी अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। धन्यवाद प्रस्ताव तो पास हो गया, लेकिन संसद के भीतर जो कड़वाहट और अविश्वास की खाई पैदा हुई है, उसे भरना आसान नहीं होगा। 2004 और 2026 के बीच की समानताएं केवल प्रक्रियात्मक हैं, लेकिन आज के दौर में जिस तरह के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वे राजनीति के गिरते स्तर की ओर इशारा करते हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सदन से लेकर सड़क तक और अधिक हंगामा होने के आसार हैं, क्योंकि अब यह केवल एक भाषण का मामला नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा और संसदीय शुचिता का विषय बन चुका है।

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