महाराष्ट्र की राजनीति में ‘शून्यता’ और संवेदना का संकट: अजित पवार के निधन के बाद उत्तराधिकार की जंग पर संजय राउत का प्रहार
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति ने पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री अजित पवार का असामयिक निधन राज्य के लिए एक ऐसा राजनीतिक और व्यक्तिगत आघात साबित हुआ है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती। हालांकि, इस शोक की घड़ी में भी सत्ता के गलियारों में ‘अगला कौन?’ के सवाल ने जन्म ले लिया है। नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर शुरू हुई इस चर्चा ने शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत को बेहद आहत और क्रोधित कर दिया है। शनिवार को मीडिया से बात करते हुए राउत ने इन चर्चाओं को ‘अमानवीय’ करार देते हुए महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति में आ रही गिरावट पर गहरा दुख व्यक्त किया।
अजित पवार के निधन के अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि एनसीपी के भीतर और महायुति गठबंधन के गलियारों में भविष्य के नेतृत्व को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई। इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए संजय राउत ने कहा कि जिस परिवार ने अपना मुखिया खोया हो और जिसकी पीड़ा अभी अत्यंत ताजा हो, वहां सत्ता, पद और कैबिनेट विस्तार की बात करना शून्य संवेदनशीलता का प्रमाण है। राउत ने उन नेताओं को आड़े हाथों लिया जिन्होंने इस मुद्दे को सार्वजनिक मंच पर उठाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर कोई मंत्री या विधायक ऐसे वक्त में उत्तराधिकारी की बात करता है, तो इसका मतलब है कि उसमें मानवता का पूर्णतः अभाव है। उन्होंने कहा कि अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार का दुख अभी सबकी आंखों के सामने है, ऐसे में राजनीति को कुछ समय के लिए विश्राम देना चाहिए था।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब एनसीपी के कुछ खेमों से यह आवाज उठी कि अजित पवार की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए सुनेत्रा पवार को तत्काल राज्य मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना चाहिए। कुछ नेताओं ने तो यहां तक सुझाव दे डाला कि पार्टी की कमान भी उन्हें ही सौंप दी जाए ताकि संगठन में कोई बिखराव न आए। गौरतलब है कि सुनेत्रा पवार वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं, हालांकि वे बारामती से लोकसभा चुनाव हार गई थीं। दूसरी ओर, अजित पवार बारामती विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ऐसे में तकनीकी और राजनीतिक रूप से उनकी जगह भरने की कवायद ने जोर पकड़ लिया, जिसे संजय राउत ने ‘समय से पहले’ और ‘अनुचित’ करार दिया है।
राउत ने चेताया कि किसी कद्दावर नेता के निधन के तुरंत बाद उत्तराधिकारी तय करने की होड़ न केवल राजनीतिक असंवेदनशीलता है, बल्कि यह पार्टी और राज्य में अनावश्यक तनाव पैदा कर सकती है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की परंपरा हमेशा से संतों और संस्कारों की रही है, जहां राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत दुखों का सम्मान किया जाता रहा है। लेकिन वर्तमान में पद की लालसा ने मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ दिया है।
अजित पवार के जाने से न केवल एनसीपी (अजित गुट) में नेतृत्व का एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया है, बल्कि महाराष्ट्र के महायुति गठबंधन (भाजपा-शिवसेना-एनसीपी) के समीकरण भी दांव पर लग गए हैं। पार्टी के भीतर इस समय भविष्य को लेकर भारी चिंता और अलग-अलग राय है। एक तरफ सुनेत्रा पवार को कैबिनेट में लाने की मांग है, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे एक बड़ी हलचल शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (SP) और अजित गुट के संभावित विलय को लेकर भी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या अजित पवार के बिना यह गुट अपना स्वतंत्र अस्तित्व बचा पाएगा या अंततः दादा (अजित पवार) के समर्थकों को वापस बड़े साहब (शरद पवार) की शरण में जाना होगा।
संजय राउत ने इन विलय की अटकलों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसे बड़े फैसलों के लिए समय, धैर्य और परिपक्वता की आवश्यकता होती है। जब तक चिता की राख ठंडी न हो जाए, तब तक राजनीतिक सौदेबाजी की मेज सजाना शोभनीय नहीं है। राउत का मानना है कि फिलहाल सभी दलों की प्राथमिकता शोक संतप्त पवार परिवार के साथ खड़े होने और राजनीतिक संयम दिखाने की होनी चाहिए।
अजित पवार केवल एक नेता नहीं थे, वे महाराष्ट्र के प्रशासन की ‘नब्ज’ माने जाते थे। उनके निधन के बाद बारामती से लेकर मुंबई तक जो सन्नाटा है, वह उनके प्रभाव को दर्शाता है। लेकिन इस सन्नाटे के बीच उत्तराधिकार की यह सुगबुगाहट महाराष्ट्र की राजनीति के एक स्याह पक्ष को उजागर करती है। संजय राउत का यह भड़कना दरअसल उसी राजनीतिक संस्कृति को बचाने की एक पुकार है, जहां सत्ता से बड़ा स्थान इंसानियत को दिया जाता था। आने वाले दिन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए निर्णायक होंगे, जहां यह तय होगा कि एनसीपी की कमान किसके हाथ में जाती है, लेकिन फिलहाल संजय राउत के कड़े रुख ने सत्ता के भूखे चेहरों को आईना जरूर दिखा दिया है।