अरुणाचल सीमा पर भारतीय सेना का ‘ऑपरेशन अग्नि-शमन’: चीन की ओर से आई आग को भारतीय वायुसेना के साथ मिलकर बुझाया
ईटानगर/अंजाव: भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश से एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के अत्यंत निकट स्थित अंजाव जिले में लगी भीषण जंगल की आग पर भारतीय सेना ने भारतीय वायुसेना के साथ एक संयुक्त और साहसिक अभियान चलाकर पूरी तरह से काबू पा लिया है। यह आग केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि सीमावर्ती सुरक्षा की दृष्टि से भी एक गंभीर चुनौती बन गई थी, क्योंकि इसकी शुरुआत सीमा पार चीन के क्षेत्र से हुई थी। करीब एक सप्ताह तक चली इस जद्दोजहद के बाद अब लोहित घाटी के जंगलों में स्थिति सामान्य है और किसी भी प्रकार की जनहानि की सूचना नहीं है।
इस घटनाक्रम की शुरुआत 21 जनवरी 2026 को हुई थी, जब वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार यानी चीनी क्षेत्र में पहली बार धुएं के गुबार देखे गए थे। अगले कुछ दिनों तक आग सीमा पार के जंगलों में धधकती रही, लेकिन 27 जनवरी को तेज हवाओं और सूखे पत्तों के कारण लपटों ने भारतीय सीमा को पार कर लिया। आग तेजी से अंजाव जिले के काहो गांव, शेरू क्षेत्र और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मदन रिज की ओर बढ़ने लगी। काहो भारत का अंतिम गांव माना जाता है और यहाँ नागरिक आबादी के साथ-साथ सैन्य चौकियां भी मौजूद हैं, जिसके कारण प्रशासन और सेना के बीच तुरंत सक्रियता बढ़ गई।
भारतीय सेना के स्पीयर कॉर्प्स ने इस स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल मोर्चा संभाला। लोहित नदी की पश्चिमी पहाड़ियों में लगी यह आग बेहद दुर्गम और खड़ी ढलानों पर थी, जहाँ पैदल पहुंचकर आग बुझाना नामुमकिन था। ऐसे में भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों की मदद ली गई। सेना और वायुसेना ने एक समन्वित रणनीति के तहत ‘बाम्बी बकेट’ (Bambi Bucket) ऑपरेशन चलाया, जिसमें पास की नदी से पानी भरकर प्रभावित पहाड़ी क्षेत्रों में छिड़काव किया गया। जमीन पर तैनात सेना के जवानों ने फायर लाइन्स बनाकर आग को नागरिक बस्तियों और सैन्य ठिकानों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस आग ने लगभग 4,50,000 वर्ग मीटर के विशाल वन क्षेत्र को अपनी चपेट में लिया है। हालांकि आग लगने के सटीक कारणों का आधिकारिक तौर पर अभी पता नहीं चल पाया है, लेकिन सर्दियों के मौसम में जंगलों का सूखापन और सीमा पार की गतिविधियों को इसका शुरुआती कारण माना जा रहा है। इतनी बड़ी आग के बावजूद भारतीय सुरक्षा बलों की तत्परता का ही परिणाम था कि मदन रिज जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।
अरुणाचल प्रदेश में आग की यह एकमात्र घटना नहीं थी। इसी दौरान राज्य के शी-योमी जिले के मेचुका स्थित टोंगकोरला इलाके में भी एक अन्य जंगल की आग लगने की सूचना मिली। रक्षा जनसंपर्क अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र रावत ने जानकारी दी कि वहां एक स्थानीय जमीन मालिक के विशेष अनुरोध पर सेना की त्वरित प्रतिक्रिया टीम (QRT) को तैनात किया गया था। मेचुका की भौगोलिक परिस्थितियां और वहां का प्रतिकूल मौसम अग्निशमन कार्यों के लिए बड़ी बाधा बना हुआ था, लेकिन भारतीय सेना के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए कठिन परिस्थितियों में भी समन्वित अभियान चलाया।
मेचुका में समय रहते की गई इस कार्रवाई ने न केवल पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया, बल्कि आसपास की निजी संपत्तियों और मानव जीवन को भी सुरक्षित बचा लिया। स्थानीय निवासियों ने सेना के इस मानवीय और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण की काफी सराहना की है। अधिकारियों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह की आग न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि सुरक्षा रडार और संचार प्रणालियों के लिए भी बाधा बन सकती है, इसलिए सेना इसे प्राथमिकता के आधार पर नियंत्रित करती है।
फिलहाल, अंजाव और शी-योमी दोनों ही जिलों में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। सेना और जिला प्रशासन अभी भी प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी कर रहे हैं ताकि आग के दोबारा सुलगने की किसी भी संभावना को खत्म किया जा सके। सीमावर्ती गांवों के लोगों ने भारतीय सेना और वायुसेना के इस सफल समन्वय के प्रति आभार व्यक्त किया है। यह सफल अभियान एक बार फिर साबित करता है कि भारतीय सशस्त्र बल न केवल बाहरी दुश्मनों से देश की सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम हैं, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के समय भी देश के नागरिकों और संसाधनों के लिए सबसे मजबूत सुरक्षा कवच के रूप में खड़े रहते हैं।