भारत-ईयू व्यापार समझौते पर आर-पार: पीयूष गोयल का जयराम रमेश पर पलटवार, बोले- ‘यह खट्टे अंगूर वाली राजनीति है’
नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर देश की सियासत में उबाल आ गया है। इस महा-सौदे को लेकर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश के बीच तीखी जुबानी जंग छिड़ गई है। जयराम रमेश द्वारा उठाए गए सवालों और चिंताओं पर कड़ा प्रहार करते हुए पीयूष गोयल ने इसे ‘खट्टे अंगूर’ वाली राजनीति करार दिया है। गोयल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व जमीनी हकीकत से कट चुका है और अपनी पिछली सरकारों की ‘फैसले न लेने की अक्षमता’ को अब उपलब्धि के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है।
पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि भारत-ईयू एफटीए को केवल एक साधारण व्यापारिक सौदा कहना गलत होगा। उन्होंने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (सभी समझौतों की जननी) बताते हुए कहा कि जब पूरी दुनिया इस ऐतिहासिक कदम की सराहना कर रही है, तब कांग्रेस इसे कमतर आंकने की कोशिश क्यों कर रही है। गोयल के अनुसार, यह समझौता केवल दो पक्षों के बीच का व्यापार नहीं है, बल्कि यह 25 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त जीडीपी, 11 ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक व्यापार और लगभग दो अरब लोगों के एक विशाल साझा बाजार को एक साथ लाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि भारत के 33 अरब डॉलर के श्रम-आधारित निर्यात को लेकर विपक्ष द्वारा फैलाया जा रहा डर पूरी तरह से भ्रामक और निराधार है।
केंद्रीय मंत्री ने पिछली कांग्रेस सरकारों पर तंज कसते हुए कहा कि अतीत की नीतिगत निष्क्रियता और निर्णयों में देरी के कारण भारत ने विकास, रोजगार और आय के कई बड़े अवसर गंवाए हैं। उन्होंने दावा किया कि जनता ने इस निष्क्रियता को बार-बार चुनावों में खारिज किया है और अब देश एक सक्रिय नेतृत्व के तहत वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। गोयल ने तर्क दिया कि भारत और यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं। उन्होंने साफ किया कि यह समझौता कोई ‘जीरो-सम गेम’ (एक का फायदा, दूसरे का नुकसान) नहीं है, बल्कि दोनों पक्षों के लिए ‘विन-विन’ (दोनों की जीत) वाली स्थिति है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस समझौते को लेकर कई गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। रमेश का कहना था कि यह समझौता भारत की ओर से अब तक का सबसे बड़ा व्यापारिक खुलापन है, जिससे यूरोपीय संघ से आयात में अप्रत्याशित वृद्धि हो सकती है। उन्होंने विशेष रूप से कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM), सख्त स्वास्थ्य मानकों, फार्मा सेक्टर के बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), ऑटो सेक्टर की चुनौतियां और रूस से आने वाले रिफाइंड फ्यूल पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी। रमेश के अनुसार, इन संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्टता के बिना एफटीए के लाभ सीमित रह सकते हैं और घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुंच सकता है।
इन आरोपों का जवाब देते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि वर्तमान सरकार ने सीबीएम (कार्बन टैक्स) जैसे मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सबसे गंभीरता से उठाया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि स्टील, एल्युमिनियम और अन्य प्रमुख क्षेत्रों के निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए व्यावहारिक और रचनात्मक रास्ते तलाशे गए हैं। गोयल ने कहा कि सरकार ‘माय वे या हाईवे’ वाली जिद के बजाय संवाद, आपसी भरोसे और रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से समाधान खोजने में विश्वास रखती है।
स्वास्थ्य और फार्मा सेक्टर के मुद्दों पर सरकार का पक्ष रखते हुए गोयल ने स्पष्ट किया कि भारत की सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी नियमों पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने आईपीआर के सवाल पर कहा कि प्रस्तावित शर्तें विश्व व्यापार संगठन (WTO) के ‘ट्रिप्स’ (TRIPS) समझौते के अनुरूप ही हैं। इसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा, तकनीक का हस्तांतरण और भारत की पारंपरिक डिजिटल ज्ञान लाइब्रेरी (TKDL) की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं। सेवाओं के क्षेत्र में भी भारत ने अपनी घरेलू नीतियों को ध्यान में रखते हुए ही प्रतिबद्धताएं जताई हैं, जिससे देश में विदेशी निवेश और उच्च तकनीक के प्रवाह को बढ़ावा मिलेगा।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र को लेकर उठ रहे सवालों पर केंद्रीय मंत्री ने ‘मेक इन इंडिया’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने बताया कि सरकार की नीति कोटा आधारित और चरणबद्ध होगी, जिसका उद्देश्य विदेशी कंपनियों को भारत में केवल असेंबली करने के बजाय पूर्ण उत्पादन (Full Production) के लिए प्रोत्साहित करना है। इससे न केवल भारत में उच्च तकनीक और शोध एवं विकास (R&D) को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भारतीय उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता के मानक और ज्यादा विकल्प भी उपलब्ध होंगे।
अंत में पीयूष गोयल ने विपक्षी नेताओं से ‘निराशावादी नजरिये’ को छोड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि भारत के महत्वाकांक्षी युवाओं और बढ़ते कारोबारियों के लिए रास्ते खोले जाने चाहिए, न कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण उनमें रोड़े अटकाए जाने चाहिए। सरकार के अनुसार, यह एफटीए भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को दोगुना करने, लाखों नए रोजगार सृजित करने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी को मजबूती से स्थापित करने का एक स्वर्णिम अवसर है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद और सार्वजनिक विमर्श में यह बहस किस दिशा में मुड़ती है, क्योंकि इस समझौते के परिणाम भारत की भावी आर्थिक दशा और दिशा तय करने वाले होंगे।