• January 31, 2026

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन का युवाओं को आह्वान: राष्ट्रीय एकता और निस्वार्थ सेवा ही भारत की असली शक्ति

नई दिल्ली: भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर युवाओं में राष्ट्रभक्ति और सेवा का नया जोश भर दिया है। नई दिल्ली स्थित अपने सरकारी आवास पर राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के गणतंत्र दिवस परेड शिविर में आए स्वयंसेवकों के साथ एक विशेष संवाद कार्यक्रम के दौरान उन्होंने देश के भविष्य की आधारशिला रखने वाले इन युवाओं को संबोधित किया। उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सैन्य क्षमता या केवल आर्थिक आंकड़ों में नहीं, बल्कि देश की अटूट राष्ट्रीय एकता और समाज के लिए मिलकर सेवा करने की सामूहिक भावना में निहित है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे समाज सेवा को केवल एक गतिविधि न मानकर अपना परम कर्तव्य समझें और जीवन के हर मोड़ पर देशहित को सर्वोपरि रखें।

उपराष्ट्रपति ने संवाद के दौरान देश की प्रगति के मूल मंत्रों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब किसी राष्ट्र के नागरिक एकजुट होकर एक ही दिशा में प्रयास करते हैं, तभी वह देश विकास की नई ऊंचाइयों को छू पाता है। उन्होंने इतिहास का स्मरण कराते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महान विभूतियों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि सरदार पटेल ने जिस अखंड भारत का सपना देखा था और जिस एकता का मार्ग हमें दिखाया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता प्राप्ति के समय था। उनके विचार आज भी देश की प्रगति के लिए सबसे बड़े मार्गदर्शक हैं। उपराष्ट्रपति के अनुसार, महापुरुषों के दिखाए रास्ते पर चलकर ही हम एक सुदृढ़ और संगठित राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

संबोधन का एक बड़ा हिस्सा ‘विकसित भारत 2047’ के विजन पर केंद्रित रहा। उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत को अपनी आजादी के 100वें वर्ष तक एक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य कोई साधारण संकल्प नहीं है। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी या कुछ नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ भारतीयों की एक साझा यात्रा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को अनुशासित, देशभक्त और जिम्मेदार बनना अनिवार्य है। उन्होंने युवाओं पर विशेष भरोसा जताते हुए कहा कि आज की पीढ़ी अपनी अद्भुत प्रतिभा, बड़े सपनों और अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुभवों के साथ इस मिशन का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यही युवा अपनी ऊर्जा और नवाचार के बल पर 2047 तक भारत को विश्व के अग्रणी देशों की कतार में सबसे आगे खड़ा कर देंगे।

हालांकि, उपराष्ट्रपति ने विकास की परिभाषा को केवल जीडीपी और बुनियादी ढांचे तक सीमित रखने के बजाय इसे और व्यापक रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘विकसित भारत’ का निर्माण केवल आर्थिक तरक्की से संभव नहीं है। एक राष्ट्र तभी वास्तव में विकसित कहलाता है जब उसके समाज में आपसी भाईचारा हो, नैतिक मूल्य मजबूत हों और नागरिकों के भीतर अच्छे संस्कारों का समावेश हो। उन्होंने कहा कि भौतिक समृद्धि के साथ-साथ चारित्रिक समृद्धि भी उतनी ही आवश्यक है। इस संदर्भ में उन्होंने राष्ट्रीय सेवा योजना यानी एनएसएस जैसी संस्थाओं की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उपराष्ट्रपति के अनुसार, एनएसएस की गतिविधियां युवाओं के भीतर सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनाओं को जागृत करती हैं, जो एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए अपरिहार्य हैं।

एनएसएस के स्वयंसेवकों की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति ने उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों की लंबी सूची का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि साक्षरता अभियान हो या पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयास, स्वास्थ्य जागरूकता फैलाना हो या सामुदायिक विकास के कार्य, एनएसएस के युवाओं ने हर क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। विशेषकर आपदा राहत और पुनर्वास के समय इन स्वयंसेवकों द्वारा दिखाई गई तत्परता और साहस की उन्होंने मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आपदा के समय जब ये युवा अपनी जान की परवाह किए बिना समाज की मदद के लिए आगे आते हैं, तो वही सच्चे राष्ट्र निर्माण की जीवंत तस्वीर होती है।

उपराष्ट्रपति ने युवाओं को जीवन का एक अनमोल सूत्र देते हुए कहा कि निस्वार्थ भाव से की गई सेवा का प्रभाव दोहरा होता है। इससे न केवल समाज को लाभ पहुंचता है और वह मजबूत होता है, बल्कि सेवा करने वाले व्यक्ति का स्वयं का चरित्र भी निखरता है। उन्होंने समझाया कि जब एक युवा दूसरे की मदद करता है, तो उसके भीतर नेतृत्व क्षमता, धैर्य और सहानुभूति जैसे गुणों का विकास होता है। यही वे गुण हैं जो एक व्यक्ति को महान बनाते हैं और अंततः एक महान राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

इस संवाद कार्यक्रम के माध्यम से उपराष्ट्रपति ने देश के युवाओं को यह संदेश दिया कि वे केवल भविष्य के नागरिक नहीं हैं, बल्कि वर्तमान के परिवर्तनकारी एजेंट हैं। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाएं और देश को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य करें। कार्यक्रम का समापन एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ हुआ, जहां उपस्थित युवाओं ने राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में अपनी पूरी आहुति देने का संकल्प लिया। उपराष्ट्रपति का यह संबोधन न केवल एनएसएस के स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणादायक था, बल्कि यह पूरे देश के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शिका की तरह है जो एक सशक्त, समृद्ध और समावेशी भारत के निर्माण का सपना देखते हैं।

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