ऐतिहासिक मोड़ पर भारत-यूरोपीय संघ संबंध: ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के साथ एक नए आर्थिक युग का आगाज़
भारत के 77वें गणतंत्र दिवस का समारोह केवल सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक झांकियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति और अर्थशास्त्र के एक नए अध्याय का गवाह बना। नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर जब यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थीं, तब पूरी दुनिया की नजरें भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच होने वाले उस मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर टिकी थीं, जिसकी प्रतीक्षा पिछले दो दशकों से की जा रही थी। यह समझौता न केवल भारत के लिए यूरोप के 45 करोड़ उच्च-आय वाले उपभोक्ताओं के द्वार खोलने वाला है, बल्कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार अमेरिका के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट के बीच एक मजबूत वैकल्पिक बाजार की तलाश में है।
दो दशकों का लंबा सफर: 2007 से 2026 तक की गाथा
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक रिश्तों को एक औपचारिक कानूनी ढांचे में बांधने की कोशिश आज की नहीं है। इसकी शुरुआत साल 2007 में हुई थी, जब दोनों पक्षों ने ‘ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट’ (BTIA) के लिए वार्ता शुरू की थी। हालांकि, 2007 से 2013 के बीच वार्ता के कई दौर चले, लेकिन कारों पर टैरिफ, वाइन और स्पिरिट पर आयात शुल्क, और पेशेवरों की आवाजाही जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई, जिसके कारण बातचीत को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
लगभग नौ साल के गतिरोध के बाद, मई 2021 में राजनीतिक स्तर पर एक नई प्रतिबद्धता दिखाई दी। जून 2022 में वार्ता को आधिकारिक तौर पर फिर से शुरू किया गया। साल 2023 में ‘व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद’ के गठन ने इस प्रक्रिया को और गति दी। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने जब इस समझौते को ‘ऐतिहासिक समझौते की कगार पर’ बताया, तो यह स्पष्ट हो गया कि भारत और यूरोप अब एक-दूसरे की अनिवार्य आवश्यकता बन चुके हैं। समझौते के कुल 24 अध्यायों में से 20 पर आम सहमति बन जाना इस बात का प्रमाण है कि दोनों पक्षों ने अपनी पुरानी ‘रेड लाइन्स’ को लचीला बनाया है।
व्यापार के मौजूदा आंकड़े: एक मजबूत आधारशिला
वर्तमान में भारत और यूरोपीय संघ के बीच साझेदारी के आंकड़े काफी प्रभावशाली हैं। यूरोपीय संघ भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। भारत के कुल वैश्विक व्यापार में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी लगभग 11% है। भारत मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है, जो कुल निर्यात का लगभग 17% है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत से परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों की मांग यूरोप में तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा, भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है, और यूरोपीय संघ को होने वाले निर्यात में फार्मास्यूटिकल्स और रसायनों की हिस्सेदारी 15% है। कपड़ा, तैयार परिधान, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी भी भारत के निर्यात बास्केट के प्रमुख हिस्से हैं।
दूसरी तरफ, यूरोपीय संघ भारत को उच्च-तकनीकी इलेक्ट्रॉनिक्स (25%), औद्योगिक मशीनरी (20%) और परिवहन उपकरण भेजता है। एयरबस जैसी विमानन कंपनियां और मर्सिडीज-फोक्सवैगन जैसी ऑटोमोबाइल दिग्गज भारत के लिए यूरोपीय निर्यात की रीढ़ हैं। यूरोपीय संघ भारत में एक अग्रणी विदेशी निवेशक भी है, जिसका प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) स्टॉक 2023 तक 140 अरब यूरो को पार कर चुका है।
भारत के लिए लाभ: नए बाजारों की खोज और रोजगार का सृजन
इस ट्रेड डील से भारत को होने वाले फायदों का दायरा बहुत व्यापक है। भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ के 27 देशों के बाजारों तक शून्य या बेहद कम टैरिफ पर पहुंच मिलेगी। इसका सबसे बड़ा लाभ भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों को होगा। कपड़ा और परिधान उद्योग के लिए यह समझौता किसी वरदान से कम नहीं है। वर्तमान में यूरोपीय बाजार में चीन की हिस्सेदारी 30% है, जबकि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को ‘जीरो टैरिफ’ सुविधा के कारण भारत पर बढ़त हासिल है। एफटीए लागू होने के बाद भारतीय कपड़ा उद्योग इन देशों के बराबर खड़ा हो सकेगा, जिससे लाखों नए रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।
चमड़ा, जूते और रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्रों को भी कम टैरिफ के कारण बड़ी बढ़त मिलेगी। सेवा क्षेत्र में, भारत अपने आईटी इंजीनियरों, डॉक्टरों और अन्य पेशेवरों के लिए आसान वीजा नियमों और ‘म्युचुअल रिकग्निशन एग्रीमेंट्स’ की मांग कर रहा है। यदि पेशेवर कर्मियों की आवाजाही सुगम होती है, तो यह अमेरिका के एच-1बी वीजा पर भारत की निर्भरता को कम करने में सहायक होगा। फार्मा सेक्टर के लिए केवल शुल्क कटौती ही नहीं, बल्कि नियामक बाधाओं का कम होना सबसे बड़ी राहत होगी, जिससे भारतीय जेनेरिक दवाएं यूरोपीय अस्पतालों तक आसानी से पहुंच सकेंगी।
यूरोपीय संघ की रणनीति: चीन से दूरी और भारत से नजदीकी
यूरोपीय संघ के लिए यह समझौता केवल आर्थिक लाभ का मामला नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक अनिवार्यता है। यूरोप अपनी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) को चीन से हटाकर किसी विश्वसनीय लोकतांत्रिक साझेदार की ओर मोड़ना चाहता है। भारत की विशाल आबादी और बढ़ता मध्यम वर्ग यूरोपीय कंपनियों के लिए एक आकर्षक गंतव्य है।
यूरोप विशेष रूप से भारत के ऑटोमोबाइल बाजार और वाइन-स्पिरिट क्षेत्र में कटौती चाहता है। वर्तमान में भारत विदेशी कारों और शराब पर 100% से 200% तक का भारी शुल्क लगाता है। समझौते के तहत इन शुल्कों में चरणबद्ध कटौती से यूरोपीय विलासिता की वस्तुओं के लिए भारत एक बड़ा बाजार बन जाएगा। इसके अलावा, यूरोपीय संघ भारत के वित्तीय, बैंकिंग और टेलीकॉम सेक्टर में अधिक पहुंच और अपने निवेश के लिए कानूनी सुरक्षा चाहता है।
चुनौतियां और ‘रेड लाइन्स’
इतने बड़े समझौते में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारत ने अपनी ‘रेड लाइन’ स्पष्ट कर दी है कि वह कृषि और डेयरी क्षेत्र को इस समझौते से बाहर रखेगा। भारत के करोड़ों किसानों के हितों की रक्षा के लिए डेयरी उत्पादों पर छूट देना सरकार के लिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से कठिन है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) जैसे पर्यावरण संबंधी मानकों को व्यापार से जोड़ने का दबाव बना रहा है, जिसे भारत एक व्यापारिक बाधा (Trade Barrier) के रूप में देखता है।
डाटा सुरक्षा और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) भी ऐसे विषय हैं जिन पर गहन चर्चा जारी है। यूरोपीय संघ के कड़े जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) के अनुरूप भारत को अपनी डाटा सुरक्षा नीतियों को ढालना होगा ताकि सेवाओं का सुचारू आदान-प्रदान हो सके।
निष्कर्ष: वैश्विक संतुलन का नया केंद्र
भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाला यह मुक्त व्यापार समझौता, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है, वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था में एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरेगा। यह समझौता न केवल व्यापारिक बाधाओं को कम करेगा, बल्कि रक्षा, अंतरिक्ष और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग के नए रास्ते खोलेगा। 77वें गणतंत्र दिवस पर उर्सुला वॉन डेर लेयेन की उपस्थिति और उसके बाद होने वाले संभावित हस्ताक्षर यह संकेत देते हैं कि भारत अब केवल एक बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को आकार देने वाला एक निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है। यह डील भारत को एक ऐसी आर्थिक मजबूती प्रदान कर सकती है, जो उसे आने वाले दशक में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य की ओर तेजी से ले जाएगी।