बार्शी में राजनीतिक भूकंप: शिंदे-ठाकरे और अजित-शरद गुट मिलकर लड़ेंगे जिला परिषद चुनाव, भाजपा के खिलाफ बनी ‘महाआघाड़ी’
सोलापुर: महाराष्ट्र की बार्शी तालुका की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। जहां राज्य स्तर पर एक-दूसरे के कट्टर विरोधी माने जाने वाले दल आपस में भिड़ते हैं, वहीं बार्शी में वे एक मंच पर आकर भाजपा को चुनौती देने जा रहे हैं। शिवसेना (शिंदे गुट), शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार गुट) ने जिला परिषद चुनाव के लिए महाआघाड़ी बनाने का ऐलान कर दिया है।
जिला परिषद चुनाव में भाजपा के खिलाफ एकजुट हुए सभी विपक्षी दल
बार्शी तालुका में आगामी जिला परिषद चुनाव को देखते हुए सभी प्रमुख विपक्षी दलों ने भाजपा के प्रभाव को तोड़ने के लिए मतभेद भुलाकर एकजुट होने का फैसला लिया है। इस महाआघाड़ी में शिवसेना के दोनों गुटों के साथ-साथ एनसीपी के दोनों धड़े शामिल हैं। यह गठबंधन राज्य स्तर की राजनीतिक दुश्मनी को स्थानीय स्तर पर दरकिनार करते हुए भाजपा के खिलाफ मजबूत मोर्चा खोलने की कोशिश है।
ठाकरे गुट के विधायक दिलीप सोपल ने किया महाआघाड़ी का ऐलान
इस नए गठबंधन की घोषणा ठाकरे गुट के विधायक दिलीप सोपल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर की। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे इस बदलते राजनीतिक समीकरण को समझें और आगामी बैठकों में बड़ी संख्या में शामिल हों। सोपल की पोस्ट के बाद सोलापुर जिले की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और सभी दल इस गठजोड़ के प्रभाव का आकलन कर रहे हैं।
भाजपा नेता राजेंद्र राऊत को चुनौती देने का मकसद
बार्शी में भाजपा के मजबूत नेता और पूर्व विधायक राजेंद्र राऊत का प्रभाव लंबे समय से रहा है। इस महाआघाड़ी का मुख्य उद्देश्य राऊत के प्रभाव को कमजोर करना और जिला परिषद में बहुमत हासिल करना है। महाआघाड़ी का नेतृत्व ठाकरे गुट के विधायक दिलीप सोपल कर रहे हैं, जबकि भाजपा की ओर से राजेंद्र राऊत ही मुख्य चेहरा रहेंगे।
चुनावी समर में कितना असरदार साबित होगा गठबंधन?
अब बार्शी जिला परिषद चुनाव की लड़ाई सीधे महाआघाड़ी बनाम भाजपा के बीच होने जा रही है। राज्य स्तर पर अलग-अलग खेमों में बंटे ये दल स्थानीय स्तर पर एक होकर कितना असर दिखाते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह गठबंधन मजबूती से काम करता है, तो बार्शी में भाजपा को कड़ी चुनौती मिल सकती है।यह घटनाक्रम महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत का संकेत दे रहा है, जहां चुनावी जीत के लिए वैचारिक मतभेदों को दरकिनार किया जा रहा है।