• February 11, 2026

न्यायिक प्रणाली में सुधार: अतिरिक्त ट्रायल अदालतों से मजबूत होगी न्याय की बुनियाद, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगी प्रगति रिपोर्ट

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश की न्यायिक व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने जोर देकर कहा कि यदि अतिरिक्त ट्रायल कोर्ट और विशेष अदालतों की स्थापना की जाती है, तो इससे न केवल पूरी न्यायिक प्रणाली मजबूत होगी, बल्कि जेलों में बंद आरोपियों को जमानत या त्वरित सुनवाई के लिए बार-बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की मजबूरी से भी राहत मिलेगी। अदालत का मानना है कि जमीनी स्तर पर अदालतों की संख्या बढ़ने से न्याय मिलने की प्रक्रिया में तेजी आएगी और न्यायपालिका पर बढ़ता बोझ कम होगा।

मुख्य न्यायाधीश की दो टूक: अदालतों में आने की आवश्यकता ही न पड़े

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की विशेष पीठ ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को स्पष्ट संकेत दिए। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रही अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी से पूछा कि राष्ट्रीय राजधानी में विशेष अदालतों की स्थापना को लेकर अब तक क्या प्रगति हुई है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस दौरान एक बहुत ही सार्थक विचार साझा किया। उन्होंने कहा, “हमारा मुख्य विचार यह है कि एक ऐसा मजबूत तंत्र कैसे विकसित किया जाए जिससे किसी भी आरोपी या याचिकाकर्ता को जमानत जैसी बुनियादी राहत के लिए बार-बार ऊपरी अदालतों में आने की आवश्यकता ही न पड़े? यह केवल तभी संभव है जब हमारे पास पर्याप्त संख्या में अतिरिक्त अदालतें और विशेष ट्रायल कोर्ट होंगे जो मामलों का निपटारा समयबद्ध तरीके से कर सकें।” अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह 10 फरवरी 2026 तक विशेष न्यायालय की स्थापना की दिशा में हुई प्रगति की विस्तृत जानकारी साझा करे।

आईएसआईएस विचारधारा प्रचार मामले से उठा सवाल

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी मोहम्मद हेयदाइतुल्लाह नामक व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। हेयदाइतुल्लाह पर आरोप है कि वह प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन आईएसआईएस (ISIS) की विचारधारा का भारत में प्रचार कर रहा था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के अनुसार, आरोपी ने युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें संगठन में भर्ती करने के लिए टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया।

यह मामला 2021 से लंबित है और इसमें लगभग 125 गवाहों से पूछताछ की जानी है। इसी देरी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी को केंद्र और दिल्ली सरकार को सुझाव दिया था कि इस विशेष मामले की दिन-प्रतिदिन (Day-to-Day) सुनवाई के लिए एक समर्पित विशेष अदालत गठित की जाए। पीठ ने दलील दी कि यदि मुकदमे में अत्यधिक देरी होती है, तो आरोपी यह वैध तर्क दे सकता है कि उसे बिना सजा सुनाए अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जो कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख और आरोपी की दलीलें

इससे पहले, दिल्ली उच्च न्यायालय ने हेयदाइतुल्लाह को जमानत देने से इनकार कर दिया था। आरोपी, जो कि एक योग्य एमबीए स्नातक है और गुरुग्राम की एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में काम करता था, ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। उसकी मुख्य दलील यह थी कि किसी आतंकवादी संगठन से मात्र सहानुभूति रखना या उसका वैचारिक समर्थन करना गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया था। अदालत ने पाया कि साक्ष्यों के अनुसार, हेयदाइतुल्लाह कोई ‘निष्क्रिय समर्थक’ नहीं था, बल्कि वह सक्रिय रूप से हिंसक साधनों के माध्यम से ‘खिलाफत’ स्थापित करने के लिए जिहाद की वकालत कर रहा था। अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि आरोपी ने स्वीकार किया था कि उसने 2018 में आईएसआईएस के दुर्दांत नेता अबू बक्र अल बगदादी के नाम पर निष्ठा की शपथ (बयात) ली थी। इन्हीं गंभीर आरोपों और राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए उसे राहत देने से इनकार कर दिया गया था।

त्वरित सुनवाई बनाम लंबी हिरासत: एक संवैधानिक चुनौती

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अब सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की है। एक ओर जहां आईएसआईएस से जुड़े आरोप अत्यंत गंभीर हैं, वहीं दूसरी ओर साढ़े चार साल से अधिक समय से चल रही जांच और 125 गवाहों की लंबी सूची यह संकेत देती है कि नियमित अदालतों में यह मुकदमा सालों तक खिंच सकता है।

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट अब विशेष अदालतों के मॉडल पर जोर दे रहा है। अदालत का स्पष्ट मत है कि यदि विशेष अदालतें गठित कर गवाहों की पेशी रोजाना आधार पर सुनिश्चित की जाए, तो मामले का फैसला जल्दी हो सकता है। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि यदि कोई निर्दोष है तो वह जल्दी रिहा हो सके, और यदि कोई दोषी है तो उसे कानून के तहत कड़ी सजा मिले। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 फरवरी की तारीख तय की है, जिस दिन केंद्र सरकार को विशेष अदालत की स्थापना पर अपना जवाब दाखिल करना होगा।

निष्कर्ष: भविष्य की न्यायपालिका का रोडमैप

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल भारतीय न्यायपालिका के लिए एक दूरगामी रोडमैप तैयार कर सकती है। यदि दिल्ली में विशेष अदालतों का यह प्रयोग सफल रहता है, तो इसे देशभर के अन्य संवेदनशील और जटिल मामलों में भी लागू किया जा सकता है। इससे न केवल मुकदमों की पेंडेंसी कम होगी, बल्कि न्याय की गुणवत्ता और गति में भी सुधार होगा, जिससे आम नागरिक का न्यायपालिका पर भरोसा और अधिक सुदृढ़ होगा।

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