महाराष्ट्र निकाय चुनाव: जलगांव में एक ही परिवार की तिहरी जीत और जालना में जेल से जीते आरोपी ने किया सबको हैरान
महाराष्ट्र के हालिया नगर निकाय चुनावों के परिणामों ने राज्य की राजनीति में कई नए और अनपेक्षित अध्याय जोड़ दिए हैं। जहां एक ओर बड़े राजनीतिक दलों और दिग्गजों के बीच सत्ता की जंग चल रही थी, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर कुछ ऐसी जीतें सामने आईं जिन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और सामाजिक विमर्श को नई दिशा दे दी है। इन चुनावों में केवल विचारधाराओं की लड़ाई नहीं थी, बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय समीकरणों का भी बोलबाला रहा। जलगांव में एक ही परिवार के तीन सदस्यों का एक साथ चुनकर आना और जालना में एक हाई-प्रोफाइल हत्याकांड के आरोपी की जीत ने इस चुनाव को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है।
निकाय चुनावों के ये परिणाम दर्शाते हैं कि महाराष्ट्र की जनता ने इस बार केवल पार्टी सिंबल को नहीं देखा, बल्कि स्थानीय चेहरों और उनके द्वारा पैदा किए गए प्रभाव को प्राथमिकता दी है। इन परिणामों में जहां पारिवारिक विरासत का जश्न दिखा, वहीं गंभीर आपराधिक आरोपों के बावजूद मिली जीत ने चुनावी नैतिकता और कानून पर नई बहस छेड़ दी है। राज्य भर में इस समय इन अनोखी जीतों की गूंज सुनाई दे रही है, जो भविष्य की राजनीति के लिए कई संकेत दे रही है।
जलगांव में कोल्हे परिवार का ऐतिहासिक राजनीतिक रिकॉर्ड
उत्तर महाराष्ट्र के जलगांव जिले में इस बार एक अनोखा चुनावी करिश्मा देखने को मिला। जलगांव नगर निगम के चुनाव में ‘कोल्हे परिवार’ ने अपनी राजनीतिक पैठ का लोहा मनवाते हुए एक नया इतिहास रच दिया है। इस परिवार के तीन सदस्यों ने अलग-अलग वार्डों से चुनावी मैदान में ताल ठोंकी थी और आश्चर्यजनक रूप से तीनों ने ही जीत का स्वाद चखा। इस जीत ने जलगांव की राजनीति में कोल्हे परिवार के दबदबे को एक बार फिर प्रमाणित कर दिया है।
इस पूरी कहानी के केंद्र में शिवसेना (शिंदे गुट) के कद्दावर नेता और जलगांव के पूर्व महापौर ललित कोल्हे रहे। ललित कोल्हे के लिए यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था, क्योंकि उन्होंने जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा था। जेल की सलाखों के पीछे से चुनाव जीतने की उनकी क्षमता ने उनके समर्थकों के बीच उनकी लोकप्रियता को और पुख्ता कर दिया है। ललित कोल्हे की जीत के साथ-साथ उनके बेटे पीयूष कोल्हे ने भी राजनीति के अखाड़े में शानदार पदार्पण किया। पीयूष ने अपने जीवन का पहला चुनाव लड़ा और मतदाताओं के भारी समर्थन से जीत हासिल की, जिससे कोल्हे परिवार की अगली पीढ़ी का नेतृत्व भी स्थापित हो गया।
जैसे ही मतगणना केंद्र से जीत की आधिकारिक घोषणा हुई, जलगांव की सड़कों पर जश्न का माहौल बन गया। इस जीत की सबसे भावुक तस्वीर तब सामने आई जब ललित कोल्हे की पत्नी और शिंदे सेना की महिला विंग की प्रमुख सरिता कोल्हे अपने आंसुओं को रोक नहीं पाईं। बेटे पीयूष की जीत की खबर सुनते ही वह भावुक हो गईं और खुशी के आंसू बहाते हुए उसे गले लगा लिया। परिवार के लिए यह दोहरी और तीहरी खुशी का मौका था क्योंकि ललित, पीयूष और परिवार के एक अन्य सदस्य ने मिलकर नगर निगम में अपनी जगह पक्की कर ली थी। यह दृश्य सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हुआ और लोगों ने इसे एक परिवार के राजनीतिक संघर्ष की परिणति के रूप में देखा।
जालना में श्रीकांत पंगारकर की जीत और नैतिकता का सवाल
जलगांव की जीत जहां पारिवारिक जश्न का कारण बनी, वहीं जालना नगर निगम के नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया। पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड के आरोपी श्रीकांत पंगारकर ने वार्ड नंबर 13 से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की है। पंगारकर की इस जीत ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। उन्होंने न केवल चुनाव जीता, बल्कि भाजपा और अन्य स्थापित दलों के उम्मीदवारों को 2,621 वोटों के बड़े अंतर से मात दी।
पंगारकर की इस जीत के पीछे कुछ रणनीतिक कारण भी बताए जा रहे हैं। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने इस वार्ड से अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था, जिससे मुकाबला बहुकोणीय हो गया और पंगारकर को इसका सीधा लाभ मिला। श्रीकांत पंगारकर पर गंभीर आरोप हैं और उनका मामला फिलहाल अदालत में लंबित है। हालांकि, जीत के बाद उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि जब तक अदालत उन्हें दोषी करार नहीं देती, तब तक वे निर्दोष हैं और उन्हें चुनाव लड़ने व जीतने का पूरा अधिकार है।
जीत के बाद पंगारकर के समर्थकों ने जालना की सड़कों पर भारी जुलूस निकाला और जश्न मनाया। इस जीत के वीडियो जैसे ही सार्वजनिक हुए, आरोपित व्यक्तियों के चुनाव लड़ने और जनता द्वारा उन्हें चुनने की नैतिकता पर सवाल उठने लगे। आलोचकों का कहना है कि गंभीर अपराधों के आरोपियों का राजनीतिक शक्ति हासिल करना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा हो सकता है, जबकि उनके समर्थकों का तर्क है कि जनता का फैसला सर्वोपरि है। यह मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है कि क्या कानून में ऐसे प्रावधानों की आवश्यकता है जो विचाराधीन कैदियों को चुनाव लड़ने से रोक सकें।
पूरे महाराष्ट्र में भगवा लहर का व्यापक प्रभाव
इन छिटपुट और अनोखी जीतों के अलावा, यदि बड़े फलक पर देखा जाए तो पूरे महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में ‘भगवा प्रभाव’ स्पष्ट रूप से नजर आया। नागपुर, पुणे और नासिक जैसे प्रमुख शहरों के नतीजों ने संकेत दिया है कि हिंदुत्व और विकास के एजेंडे का संगम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहा है। इन शहरों में भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के गठबंधन को भारी सफलता मिली है, जिससे महायुति सरकार का आत्मविश्वास और बढ़ गया है।
नागपुर में, जो कि भाजपा का गढ़ माना जाता है, पार्टी ने अपना वर्चस्व बरकरार रखा। वहीं पुणे में भी विकास कार्यों और मेट्रो परियोजनाओं के वादे ने मतदाताओं को प्रभावित किया। नासिक के नतीजे भी सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में रहे, जिससे यह साफ हो गया कि शहरी क्षेत्रों में वर्तमान सरकार की नीतियों के प्रति सकारात्मक रुझान है। इन शहरों की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नगर निगमों का प्रबंधन ही किसी भी बड़े शहर की भविष्य की दिशा तय करता है।
भगवा लहर के इस व्यापक प्रभाव ने विपक्षी दलों, विशेषकर महाविकास अघाड़ी के लिए चिंता की लकीरें खींच दी हैं। मुंबई से लेकर विदर्भ तक, भगवा झंडे की मजबूती ने यह दिखा दिया है कि आने वाले विधानसभा चुनावों की राह कैसी रहने वाली है। हालांकि, जलगांव और जालना जैसी जगहों के निर्दलीय और छोटे समूहों के नतीजों ने यह भी याद दिलाया है कि स्थानीय राजनीति में कभी-कभी बड़े लहरों के बावजूद स्थानीय मुद्दे और व्यक्तिगत छवि भी अपनी जगह बना लेती है।
निष्कर्ष: चुनाव परिणाम और भविष्य की राजनीति
महाराष्ट्र निकाय चुनावों के इन विविध परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की राजनीति अब एक बहुआयामी मोड़ पर है। जहां एक तरफ संगठनात्मक ताकत और गठबंधन की राजनीति हावी है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर बाहुबल, पारिवारिक विरासत और सहानुभूति की लहर भी अपना काम कर रही है। कोल्हे परिवार की जीत ने जहां राजनीति में ‘परिवार’ के महत्व को नए सिरे से परिभाषित किया, वहीं पंगारकर की जीत ने कानून और लोकतंत्र के बीच के धुंधले क्षेत्र को उजागर किया।
ये चुनाव परिणाम केवल नगर निगमों के गठन तक सीमित नहीं रहेंगे। इनका प्रभाव आने वाले महीनों में होने वाली राज्य की बड़ी राजनीतिक हलचलों पर भी पड़ेगा। इन नतीजों ने भाजपा-शिंदे गठबंधन को जहां मजबूती दी है, वहीं निर्दलीयों और स्थानीय समूहों की जीत ने बड़े दलों को यह संदेश भी दिया है कि वे जनता को हल्के में न लें। महाराष्ट्र की यह राजनीतिक प्रयोगशाला अब देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन गई है कि कैसे छोटे चुनाव बड़े राष्ट्रीय मुद्दों और बहसों को जन्म दे सकते हैं।