• January 19, 2026

महाराष्ट्र निकाय चुनाव: महायुति में ‘बैनर युद्ध’ तेज, भाजपा ने सहयोगी एनसीपी के खिलाफ खोला मोर्चा

पुणे/मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में ‘महायुति’ गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। आगामी नगर निकाय चुनावों (Civic Polls) की सुगबुगाहट के बीच सत्तारूढ़ गठबंधन के दो प्रमुख घटक दलों, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) के बीच तकरार अब चुनाव आयोग के दरवाजे तक पहुंच गई है। पुणे में राजनीतिक पारा उस समय और बढ़ गया जब भाजपा ने सार्वजनिक रूप से अपने ही सहयोगी दल एनसीपी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई। यह विवाद न केवल स्थानीय स्तर पर वर्चस्व की लड़ाई को दर्शाता है, बल्कि राज्य की राजनीति में गठबंधन के भविष्य और आपसी विश्वास पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।

पुणे में सियासी उबाल और भाजपा की चुनाव आयोग में दस्तक

विवाद का मुख्य केंद्र पुणे नगर निगम चुनाव बना है, जहाँ भाजपा और एनसीपी दोनों ही दल अपनी मजबूत पकड़ का दावा करते हैं। महाराष्ट्र भाजपा के महासचिव राजेश पांडे ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि पार्टी ने एनसीपी और अन्य दलों द्वारा शहर भर में लगाए गए कथित ‘अवैध होर्डिंग्स’ के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की है। भाजपा का आरोप है कि चुनाव आचार संहिता के लागू होने के बावजूद शहर के विभिन्न हिस्सों में अनाधिकृत फ्लेक्स बैनर और पोस्टर लगाए गए हैं, जो नियमों का खुला उल्लंघन हैं। भाजपा का यह रुख इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आमतौर पर गठबंधन सहयोगी एक-दूसरे की शिकायतों को आपसी बातचीत से सुलझाते हैं, लेकिन यहां सीधे चुनाव आयोग का रुख करना बताता है कि कड़वाहट कितनी गहरी हो चुकी है।

‘शहर की सुंदरता’ बनाम ‘राजनीतिक होर्डिंग’: फडणवीस का रुख

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के उस बयान से तैयार हुई, जिसमें उन्होंने शहर के सौंदर्यीकरण पर जोर दिया था। रविवार को भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक के दौरान फडणवीस ने सख्त हिदायत दी थी कि पार्टी कार्यकर्ता अवैध होर्डिंग्स और फ्लेक्स लगाने से परहेज करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह की गतिविधियां न केवल शहर की सुंदरता को खराब करती हैं, बल्कि आम जनता के बीच भी नकारात्मक संदेश भेजती हैं। मुख्यमंत्री के इसी संदेश को आधार बनाकर पुणे भाजपा ने सोमवार को पूरे शहर को ‘बैनर-पोस्ट मुक्त’ बनाने का औपचारिक संकल्प लिया। राजेश पांडे के अनुसार, भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को सख्त निर्देश दिए हैं, लेकिन जब उन्होंने देखा कि एनसीपी के बैनर अभी भी शहर में लगे हुए हैं, तो उन्होंने इसे आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए कानूनी रास्ता अपनाया।

अजित पवार और फडणवीस के बीच जुबानी जंग

महायुति के भीतर यह तनाव केवल बैनरों तक सीमित नहीं है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व के बीच भी शब्दों के बाण चल रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एनसीपी प्रमुख और उपमुख्यमंत्री अजित पवार पर तीखा हमला बोला। फडणवीस की नाराजगी का कारण अजित पवार द्वारा पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा की आलोचना करना था। फडणवीस ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि हालांकि दोनों दल निकाय चुनाव अलग-अलग लड़ रहे हैं, लेकिन उनके बीच एक ‘सौहार्दपूर्ण’ मुकाबले (Friendly Fight) पर सहमति बनी थी। उन्होंने याद दिलाया कि भाजपा और एनसीपी ने काफी पहले ही यह तय कर लिया था कि पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे क्षेत्रों में वे सहयोगी के रूप में चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि दोनों ही दल यहां बेहद मजबूत स्थिति में हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि सहयोगी दल एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से कीचड़ उछालें।

‘मैत्रीपूर्ण मुकाबले’ की कड़वाहट और जमीनी हकीकत

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ‘मैत्रीपूर्ण मुकाबले’ का विचार अब पूरी तरह से टकराव में बदल चुका है। पुणे और पश्चिमी महाराष्ट्र अजित पवार का गढ़ माना जाता है, जबकि भाजपा पिछले एक दशक से यहां अपनी जड़ें गहरी कर चुकी है। ऐसे में निकाय चुनावों में सत्ता की चाबी किसके पास होगी, यह दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रहे हैं, जिससे गठबंधन का अनुशासन डगमगा रहा है। भाजपा का चुनाव आयोग जाना यह संकेत देता है कि वह पुणे में एनसीपी को कोई ‘वॉकओवर’ देने के मूड में नहीं है और वह नियमों के पालन के बहाने अपने सहयोगी पर दबाव बनाना चाहती है।

महायुति के भविष्य पर बढ़ते सवालिया निशान

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘महायुति’ (भाजपा, शिवसेना-शिंदे और एनसीपी-अजित) का गठन राज्य में एक स्थिर और मजबूत सरकार देने के वादे के साथ हुआ था। हालांकि, निकाय चुनावों ने इस एकता की दरारें उजागर कर दी हैं। जब गठबंधन के दो बड़े दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव आयोग जाते हैं, तो इससे विपक्ष को भी हमलावर होने का मौका मिलता है। जानकारों का मानना है कि यदि यह तकरार जल्द ही नहीं सुलझाई गई, तो इसका असर आने वाले अन्य चुनावों पर भी पड़ सकता है। मुख्यमंत्री फडणवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बीच का यह मतभेद केवल स्थानीय निकाय तक सीमित रहेगा या यह राज्य सरकार के कामकाज को भी प्रभावित करेगा, यह आने वाले कुछ हफ्तों में स्पष्ट होगा।

कूटनीतिक सुलह की कोशिशें या आर-पार की जंग?

फिलहाल, पुणे नगर निगम के अधिकारी और चुनाव आयोग भाजपा की शिकायत पर गौर कर रहे हैं। प्रशासन के लिए भी यह एक मुश्किल स्थिति है क्योंकि उन्हें एक ही सरकार में शामिल दो दलों के बीच निष्पक्ष निर्णय लेना है। वहीं, एनसीपी की ओर से अभी तक इस शिकायत पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन अजित पवार के आक्रामक तेवर बताते हैं कि वह भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। भाजपा की ‘क्लीन सिटी’ पहल और एनसीपी की ‘चुनावी सक्रियता’ के बीच फंसी पुणे की जनता अब यह देख रही है कि विकास के दावों के बीच यह बैनर युद्ध किस दिशा में मुड़ता है। क्या महायुति के शीर्ष नेता इस विवाद को शांत कर पाएंगे, या फिर निकाय चुनाव इस गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी साबित होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।

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