बस्तर में लाल आतंक की कमर टूटी: दंतेवाड़ा में 63 नक्सलियों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण, 1 करोड़ से अधिक का था इनाम
दंतेवाड़ा/रायपुर: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने राज्य में आंतरिक सुरक्षा के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। दंतेवाड़ा जिले में शासन द्वारा चलाए जा रहे ‘लोन वर्राटू’ (घर वापस आइए) अभियान के तहत एक साथ 63 नक्सलियों ने अपने हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल होने का फैसला किया है। इस सामूहिक आत्मसमर्पण में 18 महिला नक्सली भी शामिल हैं, जो इस बात का संकेत है कि अब नक्सली विचारधारा के भीतर महिलाओं का मोहभंग हो रहा है। यह घटना छत्तीसगढ़ में दशकों से जारी नक्सलवाद के खिलाफ युद्ध में एक निर्णायक मोड़ मानी जा रही है।
ऐतिहासिक आत्मसमर्पण: संगठन को लगा बड़ा झटका
छत्तीसगढ़ पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए यह दिन एक बड़ी रणनीतिक जीत के रूप में दर्ज किया गया है। आत्मसमर्पण करने वाले इन 63 नक्सलियों में कई खूंखार चेहरे शामिल हैं, जिनकी सुरक्षा बलों को लंबे समय से तलाश थी। सबसे महत्वपूर्ण नाम पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी के सचिव मोहन कड़ती का है। मोहन कड़ती ने न केवल स्वयं हथियार छोड़े, बल्कि अपनी पत्नी के साथ पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन सभी आत्मसमर्पित नक्सलियों पर सामूहिक रूप से 1 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था। इतने बड़े स्तर पर और इतनी भारी इनामी राशि वाले कैडरों का एक साथ मुख्यधारा में आना नक्सली संगठन की संरचनात्मक हार को दर्शाता है। यह आत्मसमर्पण यह भी सिद्ध करता है कि नक्सलियों का कैडर अब अपनी नेतृत्व क्षमता और खोखली विचारधारा से टूट चुका है।
‘लोन वर्राटू’ अभियान: घर वापसी की एक नई किरण
दंतेवाड़ा जिला पुलिस द्वारा शुरू किया गया ‘लोन वर्राटू’ अभियान स्थानीय गोंडी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘घर वापस आइए’। इस अभियान का उद्देश्य उन भटके हुए युवाओं और ग्रामीणों को वापस समाज की मुख्यधारा में लाना है जो किसी कारणवश नक्सली संगठनों का हिस्सा बन गए थे। इस अभियान के तहत गांव-गांव में इनामी नक्सलियों के पोस्टर लगाए जाते हैं और उनके परिवारों के माध्यम से उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया जाता है।
ताजा आत्मसमर्पण की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें केवल छत्तीसगढ़ के स्थानीय नक्सली ही नहीं, बल्कि राज्य के बाहर के भी कुछ सक्रिय सदस्य शामिल हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि लोन वर्राटू अभियान की गूंज और छत्तीसगढ़ पुलिस की पुनर्वास नीति का प्रभाव अब भौगोलिक सीमाओं को पार कर रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी संगठन के सचिव स्तर का अधिकारी आत्मसमर्पण करता है, तो वह अपने साथ न केवल हथियार बल्कि संगठन के कई गोपनीय दस्तावेज और सूचनाएं भी लाता है, जो भविष्य के अभियानों में सुरक्षा बलों के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे।
महिला नक्सलियों का बढ़ता मोहभंग
इस सामूहिक आत्मसमर्पण में 18 महिला नक्सलियों की उपस्थिति एक गंभीर सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करती है। नक्सली संगठनों में अक्सर महिलाओं के शोषण और उनके साथ होने वाले भेदभाव की खबरें आती रही हैं। इन महिला कैडरों का एक साथ बाहर आना यह दर्शाता है कि अब वे हिंसा का रास्ता छोड़कर गरिमापूर्ण जीवन और विकास की ओर कदम बढ़ाना चाहती हैं। पुलिस प्रशासन ने इन महिलाओं के लिए विशेष पुनर्वास पैकेज की घोषणा की है ताकि वे समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकें और स्वावलंबी बन सकें।
सुरक्षा बलों का मनोवैज्ञानिक दबाव और रणनीति
दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक और बस्तर आईजी के नेतृत्व में सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन किया है। केवल हथियारों के बल पर लड़ने के बजाय, अब ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ (Psychological Warfare) पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। सुरक्षा बलों द्वारा जंगलों में सघन तलाशी अभियान चलाने के साथ-साथ संचार के माध्यमों से नक्सलियों को यह संदेश दिया जा रहा है कि विकास ही एकमात्र रास्ता है।
सुरक्षा बलों की लगातार सक्रियता ने नक्सलियों की सप्लाई चेन और उनके सुरक्षित ठिकानों को ध्वस्त कर दिया है। रसद की कमी और लगातार घेराबंदी के कारण नक्सली कैडरों के पास दो ही विकल्प बचे थे—या तो वे मुठभेड़ में मारे जाएं या आत्मसमर्पण कर दें। 63 नक्सलियों का यह निर्णय सुरक्षा बलों के उसी निरंतर दबाव का परिणाम है।
पुनर्वास नीति: बंदूक छोड़ कलम और हल थामने की ओर
छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रही है। आत्मसमर्पण करने वाले प्रत्येक नक्सली को तत्काल सहायता राशि प्रदान की जाती है। इसके अलावा, जिन नक्सलियों पर इनाम घोषित था, उन्हें उस इनाम की राशि भी उनके बेहतर भविष्य के लिए दी जाती है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि मोहन कड़ती जैसे बड़े नेताओं और अन्य 62 साथियों को कौशल विकास योजना (Skill Development) से जोड़ा जाएगा। उन्हें घर बनाने के लिए जमीन, बच्चों के लिए शिक्षा और स्वरोजगार के लिए ऋण जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। प्रशासन का मानना है कि जब आत्मसमर्पण करने वाले लोग एक खुशहाल जीवन जीते हैं, तो वे जंगल में बचे हुए अपने अन्य साथियों के लिए एक जीवंत उदाहरण बन जाते हैं।
बस्तर में शांति और विकास का नया अध्याय
इस सामूहिक आत्मसमर्पण के बाद दंतेवाड़ा और बस्तर संभाग के अन्य हिस्सों में सुरक्षा की स्थिति में बड़े सुधार की उम्मीद है। नक्सलवाद के कमजोर होने का सीधा अर्थ है विकास कार्यों में तेजी। अब उन अंदरूनी इलाकों में सड़कें, स्कूल, अस्पताल और बिजली पहुंच सकेगी जहां पहले नक्सलियों के डर से काम करना असंभव था।
क्षेत्र के ग्रामीणों में भी इस घटना के बाद उत्साह का माहौल है। नक्सली आतंक के कारण जो लोग अपने घरों से दूर रहने को मजबूर थे, वे अब वापस लौटने की उम्मीद कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह एक मील का पत्थर है, जो यह संदेश देता है कि हिंसा का अंत निकट है और शांति का सूर्योदय होने वाला है।