महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर: अंबरनाथ के सभी 12 निलंबित कांग्रेस पार्षद भाजपा में शामिल, कांग्रेस ने दी अयोग्य ठहराने की चेतावनी
अंबरनाथ/ठाणे: महाराष्ट्र के ठाणे जिले में स्थित अंबरनाथ नगर परिषद की राजनीति ने एक बेहद नाटकीय मोड़ ले लिया है। यहाँ कांग्रेस के सभी 12 निलंबित पार्षदों ने सामूहिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया है। बुधवार देर रात भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण की उपस्थिति में इन पार्षदों को पार्टी में शामिल किया गया। इस घटनाक्रम ने न केवल अंबरनाथ की स्थानीय सत्ता का समीकरण बदल दिया है, बल्कि प्रदेश स्तर पर भी राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस कदम को ‘लोकतंत्र की हत्या’ बताते हुए इन सभी पार्षदों की सदस्यता रद्द करवाने के लिए कानूनी लड़ाई छेड़ने का ऐलान किया है।
सत्ता के लिए वैचारिक मतभेद दरकिनार: अंबरनाथ का अनूठा गठबंधन
अंबरनाथ नगर परिषद के चुनाव नतीजों के बाद सत्ता की चाबी किसी भी एक दल के पास स्पष्ट रूप से नहीं थी। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना 27 सदस्यों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर थी। ऐसे में भाजपा ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए अपनी धुर विरोधी कांग्रेस और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के साथ स्थानीय स्तर पर गठबंधन कर लिया।
20 दिसंबर को हुए इस गठबंधन के बाद भाजपा की ताकत बढ़कर 31 सीटों तक पहुँच गई। इसी रणनीतिक बढ़त के चलते बुधवार को हुए अध्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा की तेजश्री करंजुले पाटिल ने जीत दर्ज की। उन्होंने मुख्यमंत्री शिंदे की शिवसेना की उम्मीदवार मनीषा वालेकर को शिकस्त दी। इस जीत ने साफ कर दिया कि स्थानीय स्तर पर भाजपा ने शिवसेना को पटखनी देने के लिए कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने से भी गुरेज नहीं किया।
कांग्रेस की कार्रवाई और सामूहिक दल-बदल
जैसे ही अंबरनाथ में कांग्रेस पार्षदों द्वारा भाजपा को समर्थन देने की खबर आलाकमान तक पहुँची, पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता का गंभीर मामला माना। कांग्रेस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए अपने सभी 12 निर्वाचित पार्षदों और अंबरनाथ ब्लॉक अध्यक्ष प्रदीप पाटिल को पार्टी से निलंबित कर दिया। कांग्रेस नेतृत्व का मानना था कि भाजपा के साथ गठबंधन करना पार्टी की मूल विचारधारा के खिलाफ है।
हालांकि, इस निलंबन का पार्षदों पर कोई असर नहीं पड़ा। बुधवार देर रात इन सभी 12 पार्षदों ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण के नेतृत्व में आधिकारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। भाजपा ने इस कदम का स्वागत करते हुए इसे विकास के लिए लिया गया निर्णय बताया। इस दल-बदल के बाद अब तकनीकी रूप से ये पार्षद कांग्रेस के नहीं बल्कि भाजपा के खेमे में माने जा रहे हैं, जिससे नगर परिषद में भाजपा की स्थिति और भी मजबूत हो गई है।
कांग्रेस का पलटवार: ‘असांविधानिक है यह कदम’
पार्षदों के भाजपा में शामिल होने के बाद महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने आक्रामक रुख अपना लिया है। गुरुवार, 08 जनवरी को पार्टी प्रवक्ता सचिन सावंत ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए इसे पूरी तरह से अवैध और असांविधानिक करार दिया। सावंत ने दावा किया कि ये सभी पार्षद कांग्रेस के चुनाव चिन्ह ‘हाथ’ पर जीतकर आए थे और जनता ने कांग्रेस की विचारधारा को वोट दिया था। ऐसे में जीतकर किसी दूसरी पार्टी में शामिल होना दल-बदल विरोधी कानून का खुला उल्लंघन है।
सचिन सावंत ने कहा, “किसी पार्टी के सिंबल पर चुने जाने के बाद अपना अलग समूह बनाना या किसी दूसरी पार्टी में विलय करना न केवल अनैतिक है, बल्कि संविधान की भावनाओं के भी खिलाफ है। कांग्रेस पार्टी इन सभी 12 पार्षदों की सदस्यता रद्द करवाने के लिए कानूनी कार्रवाई शुरू कर रही है। हम जल्द ही इन सभी को कानूनी नोटिस जारी करेंगे और जिलाधिकारी के समक्ष उन्हें अयोग्य ठहराने की याचिका दायर करेंगे।”
स्थानीय समीकरण और भविष्य की चुनौतियां
अंबरनाथ का यह घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति के उस बदलते स्वरूप को दर्शाता है जहाँ स्थानीय सत्ता के लिए दल अपनी विचारधारा की सीमाओं को लांघने के लिए तैयार हैं। भाजपा और कांग्रेस का यह गठबंधन न केवल शिवसेना (शिंदे गुट) के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह भविष्य में महायुति (भाजपा-शिवसेना-एनसीपी) के भीतर के अंतर्विरोधों को भी उजागर करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस इन पार्षदों को अयोग्य ठहराने में सफल रहती है, तो अंबरनाथ में दोबारा उपचुनाव की स्थिति बन सकती है। फिलहाल, भाजपा ने इन पार्षदों को अपने पाले में लेकर अंबरनाथ नगर परिषद पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। अब गेंद कानूनी प्रक्रिया और जिलाधिकारी के पाले में है कि क्या ये 12 पार्षद अपनी सदस्यता बचा पाते हैं या उन्हें दल-बदल की कीमत अपनी कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ेगी।