• January 20, 2026

RELOS Deal Approved: पुतिन की भारत यात्रा से पहले रूस का सबसे बड़ा फैसला, RELOS डील से Pakistan और China की बढ़ी टेंशन।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) की भारत (India) यात्रा से ठीक पहले, मॉस्को (Moscow) से एक बड़ी और निर्णायक रणनीतिक खबर आई है। रूस की संसद डूमा (Russian Duma) ने उस महत्वपूर्ण समझौते को अंतिम मंजूरी दे दी है जिसका इंतजार दोनों देशों को लंबे समय से था—यह है रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (RELOS)। यह मंजूरी तब मिली है जब राष्ट्रपति पुतिन भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन (India-Russia Annual Summit) में शामिल होने 4-5 दिसंबर को नई दिल्ली (New Delhi) आने वाले हैं। RELOS समझौता दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग करने की अनुमति देगा, जिससे हिंद महासागर (Indian Ocean) से लेकर आर्कटिक क्षेत्रों तक भारत की सैन्य पहुंच बढ़ेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता पाकिस्तान (Pakistan) और चीन (China) के लिए सामरिक समीकरणों (Strategic Equations) पर सीधा और गहरा प्रभाव डाल सकता है। तो चलिए जानते हैं पूरा मामला क्या है, विस्तार से…

भारत-रूस रक्षा साझेदारी का ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व

भारत (India) और रूस (Russia) के बीच दशकों से चला आ रहा संबंध विश्वास और स्थिरता पर आधारित है। शीत युद्ध के दौर से ही रक्षा, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष सहयोग में दोनों देश मजबूत रणनीतिक साझेदार रहे हैं। विशेष रूप से सैन्य सहयोग में रूस (Russia) भारत का सबसे स्थिर और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता (Supplier) रहा है। एस-400 मिसाइल सिस्टम (S-400 Missile System), ब्रह्मोस (BrahMos) जैसी संयुक्त परियोजनाएं और युद्धपोतों व विमानों की आपूर्ति इसकी प्रमुख मिसालें हैं। दोनों देशों की सेनाएं हर साल ‘इंद्रा’ (INDRA) नामक त्रि-सेवा युद्धाभ्यास (Tri-Service Exercise) करती हैं। RELOS समझौते (Agreement) की पृष्ठभूमि भी उसी निरंतर और गहरे रणनीतिक साझेदारी का परिणाम है, जो वर्तमान भू-राजनीतिक (Geo-Political) दबावों के बावजूद दोनों देशों के संबंधों को मज़बूती से बांधे रखती है।

लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौते (RELOS) को मिली अंतिम मंजूरी

रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट (RELOS) समझौते पर भारत (India) और रूस (Russia) ने 18 फरवरी 2025 को हस्ताक्षर किए थे, लेकिन अब रूसी संसद डूमा (Russian Duma) ने इसे अंतिम और आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह समझौता दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग में एक गेमचेंजर (Gamechanger) साबित होगा। RELOS अब दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों (Military Bases), बंदरगाहों (Ports), एयरबेस (Airbases) और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Logistics Infrastructure) का उपयोग करने की अनुमति देगा। इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय नौसेना (Indian Navy) अब रूसी आर्कटिक क्षेत्रों (Arctic Regions) सहित कई रणनीतिक स्थानों का उपयोग कर पाएगी, जबकि रूस को हिंद महासागर (Indian Ocean) में भारत (India) के महत्वपूर्ण ठिकानों का लाभ मिलेगा। यह कदम सैन्य अभियानों, मानवीय सहायता (Humanitarian Aid) और संयुक्त अभ्यासों (Joint Exercises) में अत्यधिक आसानी लाएगा।

पाकिस्तान-चीन के लिए चिंता का विषय और विश्वास का संदेश

रूसी डूमा (Russian Duma) के अध्यक्ष व्याचेस्लाव वोलोडिन (Vyacheslav Volodin) ने RELOS (RELOS) को दोनों देशों के रक्षा सहयोग (Defence Cooperation) में ‘अगला निर्णायक कदम’ बताया और कहा कि भारत-रूस संबंध “रणनीतिक, गहरे और अत्यंत महत्वपूर्ण” हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता पाकिस्तान (Pakistan) और चीन (China) के लिए एक गंभीर रणनीतिक चिंता (Strategic Concern) का विषय है। भारत को रूस के सैन्य ठिकानों के उपयोग की सुविधा मिलने से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र (Indo-Pacific Region) और उससे आगे उसकी सैन्य पहुंच (Military Reach) और निगरानी क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। यह कदम अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी एक मजबूत संदेश देता है कि भारत-रूस के पारस्परिक विश्वास और मजबूत रक्षा साझेदारी (Strong Defence Partnership) किसी भी भू-राजनीतिक दबाव में कमजोर नहीं होने वाली है, भले ही भारत अन्य देशों से रक्षा सौदे कर रहा हो।

व्लादिमीर पुतिन की यात्रा का केंद्रीय बिंदु और क्रियान्वयन

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) की 4-5 दिसंबर की भारत यात्रा (India Visit) के दौरान RELOS (RELOS) समझौते के क्रियान्वयन (Implementation) पर विस्तृत चर्चा होने की पूरी संभावना है। पुतिन (Vladimir Putin) 23वें वार्षिक भारत-रूस शिखर सम्मेलन (India-Russia Annual Summit) में भाग लेंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के साथ व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और सैन्य-तकनीकी सहयोग के नए आयामों पर बातचीत करेंगे। RELOS (RELOS) समझौता इस यात्रा का केंद्रीय बिंदु बन सकता है, क्योंकि इसके लागू होने से दोनों देशों की सेनाओं की संयुक्त क्षमता (Joint Capability) और क्षेत्रीय प्रभावशीलता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। रूसी पक्ष सैन्य-तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खोलने और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने के लिए उत्सुक है। आने वाले महीनों में यह समझौता एशिया (Asia) और आर्कटिक (Arctic) के रक्षा परिदृश्य में एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय लिखने वाला साबित हो सकता है।

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