श्रम सुधारों पर छिड़ा महासंग्राम: केरल सरकार ने केंद्र के ‘लेबर कोड’ को बताया कॉर्पोरेट का हथियार, मजदूर अधिकारों के लिए आर-पार की जंग का एलान
तिरुवनंतपुरम: भारत में श्रम कानूनों के आधुनिकीकरण और उन्हें सरल बनाने की केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना अब एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक टकराव की ओर बढ़ रही है। केरल की वामपंथी सरकार ने एक बार फिर केंद्र के प्रस्तावित चार नए ‘लेबर कोड’ (श्रम संहिताओं) के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह श्रमिक अधिकारों की बलि देकर किसी भी औद्योगिक विकास को स्वीकार नहीं करेगी। मंगलवार को केरल विधानसभा में श्रम मंत्री वी. शिवनकुट्टी ने केंद्र सरकार की नीतियों को स्पष्ट तौर पर ‘मजबूर विरोधी’ और ‘कॉर्पोरेट समर्थक’ करार दिया। राज्य सरकार के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिनों में केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों की यह लड़ाई और अधिक मुखर होने वाली है।
इस विवाद की गूँज केरल विधानसभा के मौजूदा सत्र के दौरान उस समय सुनाई दी, जब सीपीआई(एम) के विधायक पी. नंदकुमार ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए नए श्रम कानूनों से जुड़े खतरों को सदन के पटल पर रखा। विधायक नंदकुमार ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए ये नए नियम न केवल नौकरी की सुरक्षा को पूरी तरह से खत्म कर देते हैं, बल्कि न्यूनतम वेतन की शर्तों और श्रमिकों की कार्यदशाओं का भी उल्लंघन करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन संहिताओं के माध्यम से नियोक्ताओं को ‘हायर एंड फायर’ (नौकरी पर रखने और निकालने) की असीमित शक्तियां दी जा रही हैं, जो आधुनिक दासता की ओर एक कदम है।
विधायक के सवालों का जवाब देते हुए श्रम मंत्री वी. शिवनकुट्टी ने सदन को आश्वस्त किया कि केरल सरकार राज्य के गौरवशाली श्रमिक इतिहास और उनके अधिकारों से रत्ती भर भी समझौता नहीं करेगी। उन्होंने घोषणा की कि राज्य सरकार इन नए लेबर कोड को रद्द कराने के लिए केंद्र पर हर संभव दबाव बनाएगी। मंत्री ने कहा कि केरल का सामाजिक और आर्थिक ढांचा मजबूत श्रमिक अधिकारों पर टिका है, और केंद्र की नीतियां इस बुनियादी ढांचे को ढहाने की कोशिश कर रही हैं।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 29 प्रमुख श्रम कानूनों को समाहित कर चार व्यापक श्रम कोड—वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता—तैयार किए हैं। केंद्र का दावा है कि इससे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार सुगमता) बढ़ेगी और निवेश आकर्षित होगा। इसके विपरीत, मंत्री शिवनकुट्टी का तर्क है कि यह एकीकरण केवल कॉर्पोरेट घरानों के हितों की रक्षा के लिए किया गया है। उन्होंने कहा कि ये कानून अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के सम्मेलनों और मानकों के पूर्णतः विपरीत हैं, जिनका भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है।
पिछले महीने भी केरल सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए इन श्रम कोडों के अध्ययन के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्णय लिया था। यह समिति इस बात का आकलन कर रही है कि यदि ये कानून पूर्ण रूप से लागू होते हैं, तो केरल के पारंपरिक उद्योगों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। शिवनकुट्टी ने दावा किया कि जहां देश के अधिकांश राज्यों ने केंद्र के दबाव में आकर अपने स्थानीय कानूनों में इन संहिताओं के अनुरूप संशोधन कर लिए हैं, वहीं केरल ने यह दृढ़ संकल्प लिया है कि वह अपने विधानमंडल में कोई भी ऐसा ‘मजदूर विरोधी’ संशोधन पेश नहीं करेगा जो श्रमिकों की सुरक्षा को कमजोर करता हो।
राज्य सरकार का यह रुख न केवल वैचारिक है, बल्कि रणनीतिक भी है। केरल में ट्रेड यूनियनों की पकड़ बहुत मजबूत है और किसी भी श्रमिक विरोधी कदम का सीधा असर राज्य की राजनीति और कानून-व्यवस्था पर पड़ता है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि केरल विकास का ऐसा मॉडल पेश करना चाहता है जहां औद्योगिक विकास और श्रमिक कल्याण साथ-साथ चलें। उन्होंने केंद्र सरकार पर सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के सिद्धांतों को ताक पर रखकर राज्यों पर अपनी नीतियां थोपने का आरोप लगाया।
विधानसभा में हुई इस बहस के बाद यह तय माना जा रहा है कि केरल इस मुद्दे पर अन्य गैर-भाजपा शासित राज्यों को भी एकजुट करने का प्रयास करेगा। यदि केरल जैसा राज्य इन कानूनों को लागू करने से इनकार करता है, तो केंद्र सरकार के लिए अखिल भारतीय स्तर पर श्रम सुधारों को जमीन पर उतारना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। फिलहाल, तिरुवनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या केंद्र सरकार इन चिंताओं को दूर करने के लिए राज्यों के साथ कोई मध्यमार्ग निकालेगी या यह टकराव कानूनी लड़ाई का रूप लेगा।