वैश्विक तकनीकी राजनीति में नया अध्याय: पैक्स सिलिका गठबंधन में भारत की ऐतिहासिक एंट्री और चीन की घेराबंदी
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: इक्कीसवीं सदी की वैश्विक व्यवस्था अब सीमाओं और सेनाओं से अधिक चिप्स, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। इसी क्रम में दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम उठाते हुए भारत को ‘पैक्स सिलिका’ (Pax Silica) गठबंधन में शामिल होने का आधिकारिक न्योता दिया है। अमेरिकी विदेश उप सचिव (आर्थिक मामलों के) जैकब हेलबर्ग ने गुरुवार को इस बात की पुष्टि की कि भारत फरवरी 2026 में औपचारिक रूप से इस विशिष्ट समूह का हिस्सा बन जाएगा। यह घटनाक्रम न केवल भारत की बढ़ती तकनीकी साख का प्रमाण है, बल्कि यह चीन के बढ़ते तकनीकी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अमेरिका द्वारा बुनी गई सबसे बड़ी बिसात भी मानी जा रही है।
पैक्स सिलिका गठबंधन की कल्पना और इसकी स्थापना के पीछे एक गहरा भू-राजनीतिक संघर्ष छिपा है। दिसंबर 2025 में जब अमेरिका ने इस रणनीतिक पहल की शुरुआत की थी, तब इसका प्राथमिक उद्देश्य वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर की सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाना था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस तरह से ‘पैक्स अमेरिकाना’ ने वैश्विक शांति और व्यवस्था की कमान संभाली थी, उसी तर्ज पर ‘पैक्स सिलिका’ का उद्देश्य भविष्य की डिजिटल दुनिया की कमान उन लोकतांत्रिक देशों के हाथों में रखना है जो एक-दूसरे के प्रति भरोसेमंद और पारदर्शी हैं। अमेरिका अब अपनी संवेदनशील तकनीकी जरूरतों के लिए पूरी तरह से चीन पर निर्भर रहने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। वाशिंगटन का मानना है कि आधुनिक तकनीक और डेटा की सुरक्षा केवल उन देशों के बीच संभव है जो कानून के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करते हैं।
इस गठबंधन का ढांचा अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली है। वर्तमान में इसमें अमेरिका के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे तकनीकी दिग्गज पहले से ही शामिल हैं। हाल के महीनों में कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों को भी इसमें जगह दी गई है, जो इस बात का संकेत है कि यह गठबंधन केवल निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बड़े पैमाने पर निवेश और संसाधनों की उपलब्धता को भी जोड़ा जा रहा है। हालांकि, दिसंबर 2025 में इसकी स्थापना के समय भारत को इससे बाहर रखा जाना चर्चा और आलोचना का विषय बना था। विशेषज्ञों का मानना था कि भारत जैसी सॉफ्टवेयर महाशक्ति और विशाल मानव संसाधन वाले देश के बिना कोई भी वैश्विक तकनीकी गठबंधन अधूरा है। लेकिन अब, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की हालिया नई दिल्ली यात्रा के बाद सारे गतिरोध दूर हो गए हैं। राजदूत गोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि एक लचीली और सुरक्षित सिलिकॉन सप्लाई चेन का निर्माण भारत की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं है।
भारत का इस गठबंधन में शामिल होना एक ऐसी पहेली को पूरा करने जैसा है जिसे अमेरिका लंबे समय से सुलझाने की कोशिश कर रहा था। जैकब हेलबर्ग ने भारत की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शुरुआत में इस गठबंधन का पूरा ध्यान जापान और दक्षिण कोरिया जैसे हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों पर था, लेकिन बदलते समय ने यह साबित कर दिया है कि केवल मैन्युफैक्चरिंग ही पर्याप्त नहीं है। भारत के पास दो ऐसी चीजें हैं जो इसे इस समूह के लिए अपरिहार्य बनाती हैं: पहला, सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिज संसाधनों की उपलब्धता और दूसरा, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की वह विशाल फौज जो एआई के बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए जरूरी है। भारत के आने से दुनिया के पास हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों क्षेत्रों में चीन का एक विश्वसनीय विकल्प तैयार होगा।
पैक्स सिलिका की कार्यप्रणाली अन्य पारंपरिक गठबंधनों से काफी अलग और परिणाम-ोन्मुख होगी। इसके तहत विशेष ‘फंक्शनल वर्किंग ग्रुप’ बनाए जाएंगे, जो सदस्य देशों की विशिष्ट क्षमताओं का अधिकतम लाभ उठाएंगे। उदाहरण के तौर पर, यदि नीदरलैंड के पास दुनिया की सबसे उन्नत लिथोग्राफी मशीनें हैं और ताइवान के पास बेहतरीन फैब्रिकेशन क्षमता है, तो भारत सॉफ्टवेयर विकास और एआई गवर्नेंस के क्षेत्र में नेतृत्व करेगा। यह एक ऐसा साझा मंच होगा जहां हर देश अपनी विशेषज्ञता को दूसरे के साथ साझा करेगा ताकि एक ऐसा ‘ईकोसिस्टम’ बनाया जा सके जो बीजिंग के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो। यह गठबंधन केवल चर्चाओं का मंच नहीं होगा, बल्कि इसके पास निर्यात नियंत्रण, निवेश की कड़ी जांच और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए भारी सब्सिडी देने जैसे ठोस अधिकार होंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि भविष्य की कोई भी अत्याधुनिक तकनीक किसी ऐसे राष्ट्र के हाथ नहीं लगने दी जाएगी जो इसका उपयोग राजनीतिक दबाव या सुरक्षा खतरे के रूप में कर सके।
हेलबर्ग की यह चेतावनी काफी गंभीर है कि विरोधी देश वर्तमान में ग्लोबल सप्लाई चेन को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। जिस तरह से ऊर्जा संसाधनों का उपयोग अतीत में राजनीतिक सौदेबाजी के लिए किया गया, वैसे ही अब सेमीकंडक्टर और एआई को ढाल बनाया जा रहा है। ऐसे में भारत का इस समूह में आना वैश्विक व्यवस्था को संतुलित करने वाला कदम है। भारत के लिए भी यह अवसर किसी वरदान से कम नहीं है। पैक्स सिलिका का हिस्सा बनने से भारत में घरेलू सेमीकंडक्टर निर्माण (सेमीकॉन इंडिया मिशन) को अप्रत्याशित गति मिलेगी। वैश्विक दिग्गजों के साथ तकनीकी आदान-प्रदान और निवेश के रास्ते खुलने से भारत आने वाले दशक में खुद को एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित कर पाएगा।
अंततः, फरवरी 2026 भारत की विदेश और तकनीकी नीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होने वाला है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का इस रणनीतिक समूह में शामिल होना यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य की डिजिटल दुनिया न केवल तेज और उन्नत हो, बल्कि सुरक्षित और लोकतांत्रिक भी हो। यह गठबंधन चीन को यह कड़ा संदेश देने के लिए पर्याप्त है कि अब दुनिया तकनीकी एकाधिकार को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। भारत अब केवल एक बाजार नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक तकनीक की रूपरेखा तैयार करने वाला एक प्रमुख रणनीतिकार बनने जा रहा है।