लोकतंत्र के मंदिर में ऐतिहासिक गतिरोध: 22 साल बाद बिना प्रधानमंत्री के भाषण के पारित हुआ धन्यवाद प्रस्ताव, विपक्ष के ‘नरेंद्र-सरेंडर’ नारों से गूंजी लोकसभा
नई दिल्ली: भारतीय संसदीय इतिहास में गुरुवार का दिन एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। देश की सबसे बड़ी पंचायत, लोकसभा में एक ऐसी अभूतपूर्व घटना घटी जिसने न केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की गहरी खाई को उजागर किया, बल्कि दो दशक पुरानी यादों को भी ताजा कर दिया। सदन में मचे भारी शोर-शराबे, तीखी नारेबाजी और तख्तियों की नुमाइश के बीच राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पारंपरिक भाषण के ही पारित कर दिया गया। संसदीय मर्यादाओं और परंपराओं के लिहाज से यह घटना इसलिए भी विशेष है क्योंकि साल 2004 के बाद यह पहली बार हुआ है जब प्रधानमंत्री ने इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर अपना जवाब सदन पटल पर नहीं रखा।
सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, विपक्षी दलों के तेवर बेहद आक्रामक नजर आए। बजट सत्र के सातवें दिन सदन में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का अंतिम चरण होना था, जिसमें प्रधानमंत्री का संबोधन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन जैसे ही प्रधानमंत्री बोलने के लिए खड़े होने वाले थे, विपक्षी खेमे से जोरदार नारेबाजी शुरू हो गई। देखते ही देखते कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके समेत तमाम विपक्षी दलों के सांसद सदन के बीचों-बीच यानी वेल में पहुंच गए। विपक्षी सदस्यों के हाथों में बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर थे, जो सदन की मर्यादा को चुनौती दे रहे थे। सबसे अधिक ध्यान कांग्रेस सदस्यों द्वारा लहराए गए उन पोस्टरों ने खींचा, जिन पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ ‘नरेंद्र-सरेंडर’ जैसे विवादित नारे लिखे थे।
हंगामे का यह सिलसिला केवल नारों तक सीमित नहीं रहा। समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने स्थानीय और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर हुई कथित तोड़-फोड़ का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। उनके हाथों में रानी अहिल्याबाई होलकर की तस्वीरों वाले बैनर थे, जिनके जरिए वे सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे थे। वहीं, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दलों और डीएमके के सांसदों ने भी वेल में आकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। विपक्ष की मांग थी कि उनकी चिंताओं पर पहले गौर किया जाए, जबकि सत्ता पक्ष का तर्क था कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसे बिना किसी बाधा के संपन्न किया जाना चाहिए।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बार-बार विपक्षी सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटने और गरिमा बनाए रखने की अपील की, लेकिन सदन में व्यवस्था पूरी तरह से भंग हो चुकी थी। जब स्थिति अनियंत्रित हो गई, तो अध्यक्ष ने विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। उन्होंने धन्यवाद प्रस्ताव पर विपक्षी सदस्यों द्वारा दिए गए तमाम संशोधनों को एक-एक कर वोटिंग के लिए रखा। हंगामे के शोर के बीच ये सभी संशोधन बहुमत के अभाव में खारिज हो गए। इसके तुरंत बाद, अध्यक्ष ने 28 जनवरी को राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों के संयुक्त सत्र में दिए गए अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा। सदन ने इसे बिना किसी चर्चा के ध्वनि मत से पारित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय सदन में ही मौजूद थे, लेकिन विपक्ष के लगातार व्यवधान और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच उन्होंने अपना भाषण नहीं दिया।
यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ मिसाल बन गया है। संवैधानिक विशेषज्ञों और संसदीय इतिहास के जानकारों के अनुसार, यह करीब 22 साल बाद हुआ है जब प्रधानमंत्री का जवाब आए बिना ही यह प्रस्ताव पास हुआ हो। लोकसभा के पूर्व महासचिव और प्रसिद्ध संवैधानिक विशेषज्ञ पी.डी.टी. आचार्य ने इस घटना को अत्यंत गंभीर और अभूतपूर्व बताया है। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि इससे पहले साल 2004 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के दौरान ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि 2004 और 2026 की स्थितियों में एक बड़ा बुनियादी अंतर है।
पी.डी.टी. आचार्य के अनुसार, 10 जून 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सदन में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने भाषण इसलिए नहीं दिया था क्योंकि सत्ता पक्ष और उस समय के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के बीच एक आपसी सहमति बन गई थी। उस समय मनमोहन सिंह ने स्वयं सदन को सूचित किया था कि दोनों पक्षों में यह तय हुआ है कि धन्यवाद प्रस्ताव को सीधे वोटिंग के लिए रखा जाए। लेकिन 2026 में जो हुआ, वह किसी सहमति का परिणाम नहीं बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद के पूरी तरह से टूट जाने और अभूतपूर्व टकराव का नतीजा है। यहाँ प्रधानमंत्री बोलना चाहते थे और सदन में उपस्थित थे, लेकिन विपक्ष के अड़ियल रुख और हंगामे ने उन्हें अवसर नहीं दिया।
इस घटना के बाद अब संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार के विजन का दस्तावेज होता है और उस पर प्रधानमंत्री का जवाब देना एक अनिवार्य परंपरा मानी जाती है। जब यह प्रक्रिया बिना जवाब के पूरी होती है, तो इसे लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ संकेत नहीं माना जाता। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इस पूरी घटना के लिए कांग्रेस और उसके सहयोगियों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि विपक्ष ने न केवल प्रधानमंत्री का अपमान किया है, बल्कि राष्ट्रपति और संसद की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि उनकी आवाज को दबाया जा रहा है और निलंबन जैसी कार्रवाइयों के विरोध में उनके पास विरोध के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।
सदन की कार्यवाही को स्थगित करने से पहले अध्यक्ष ओम बिरला की नाराजगी भी साफ दिखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेल में आकर तख्तियां दिखाना और प्रधानमंत्री के विरुद्ध आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करना किसी भी सांसद की शोभा नहीं देता। इस हंगामे ने न केवल बजट सत्र के विधायी कार्यों को प्रभावित किया है, बल्कि आगामी दिनों में सदन के संचालन पर भी संशय पैदा कर दिया है। 2004 का इतिहास 22 साल बाद जिस तरह से दोहराया गया, उसने यह साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में टकराव का स्तर अब उस बिंदु पर पहुंच गया है जहाँ संवैधानिक परंपराएं भी हंगामे की बलि चढ़ने लगी हैं।